लोड हो रहा है...

DPDP Act को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: क्या खतरे में है डिजिटल निजता और प्रेस की स्वतंत्रता?

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
7 Min Read

नई दिल्ली।

डिजिटल न्यूज़ मीडिया और प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े एक अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 और उससे जुड़े नियमों (DPDP Rules, 2025) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

यह याचिका Digital News Publishers Association (DNPA) की ओर से दायर की गई है, जिसमें देश के 21 प्रमुख डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स शामिल हैं।

 

- Advertisement -

मुख्य न्यायाधीश की पीठ में सुनवाई

मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ कर रही है, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं। शीर्ष अदालत ने इस विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को निर्धारित की है।

 

21 न्यूज़ पब्लिशर्स ने क्यों दी DPDP Act को चुनौती?

DNPA और डिजिटल मीडिया पब्लिशर्स का मुख्य तर्क यह है कि DPDP Act और इसके तहत बने DPDP Rules, 2025 में पत्रकारिता (Journalism) और जनहित की न्यूज़ रिपोर्टिंग के लिए कोई स्पष्ट छूट प्रदान नहीं की गई है। इसके प्रमुख दुष्परिणाम निम्न हो सकते हैं:

- Advertisement -
  1. खोजी पत्रकारिता पर प्रभाव: बिना पूर्व सहमति के व्यक्तिगत डेटा का इस्तेमाल न करने का नियम खोजी रिपोर्टिंग (Investigative Journalism) को व्यावहारिक रूप से असंभव बना देगा।
  2. गोपनीय स्रोतों का खतरा: पत्रकारों के पास जानकारी देने वाले व्हिसलब्लोअर्स और गोपनीय स्रोतों (Confidential Sources) की पहचान उजागर होने या असुरक्षित होने का जोखिम बढ़ेगा।
  3. सहमति संबंधी शर्तें: समाचार रिपोर्ट या जांच के दौरान किसी व्यक्ति विशेष की जानकारी जुटाने के लिए उसकी पूर्व अनुमति लेना पत्रकारिता के मूलभूत सिद्धांतों के विपरीत है।

 

पत्रकारिता में ‘पूर्व सेंसरशिप’ (Pre-Censorship) का डर

सुनवाई के दौरान DNPA की तरफ से पेश हुईं वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दिवान ने दलील दी कि यदि पत्रकारों को किसी आरोपी, भ्रष्ट अधिकारी या जांच के दायरे में आए व्यक्ति की रिपोर्टिंग से पहले उसी की अनुमति लेनी पड़े, तो कोई भी खोजी रिपोर्ट प्रकाशित नहीं हो पाएगी।

याचिका में यह आशंका व्यक्त की गई है कि जांच का विषय बनने वाले व्यक्ति को पूर्व सूचना देने से:

  • सबूतों के साथ छेड़छाड़ हो सकती है।
  • गवाहों पर दबाव बनाया जा सकता है।
  • सार्वजनिक हित की निष्पक्ष जांच बाधित हो सकती है।

 

सुप्रीम कोर्ट का रुख: निजता और स्वतंत्रता में संतुलन

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल विवादित कानूनी प्रावधानों पर अंतरिम रोक (Ex-parte Stay) लगाने से स्पष्ट इनकार कर दिया है। पीठ का कहना है कि केंद्र सरकार का पक्ष सुने बिना कोई एकतरफा आदेश देना उचित नहीं होगा।

कोर्ट का मुख्य अवलोकन: नागरिक के निजता के मौलिक अधिकार (K.S. Puttaswamy Judgment) और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्रेस की स्वतंत्रता के बीच एक मजबूत संवैधानिक संतुलन (Constitutional Balance) बनाना अनिवार्य है।

पीठ ने मीडिया निकायों से यह भी आग्रह किया है कि वे केवल आशंका व्यक्त करने के बजाय एक विशेषज्ञ की भूमिका निभाते हुए ऐसे व्यावहारिक उपाय और सुझाव प्रस्तुत करें, जिससे डेटा के दुरुपयोग को भी रोका जा सके और स्वतंत्र पत्रकारिता भी सुरक्षित रहे।

 

DPDP Act से जुड़े विवाद के प्रमुख बिंदु

विवादित मुद्दापत्रकारिता व जनता पर प्रभाव
पत्रकारिता छूट का अभावखोजी पत्रकारिता और व्हिसलब्लोइंग पर कानूनी संकट
गोपनीय स्रोतों का प्रकटीकरणस्रोतों की सुरक्षा खत्म होने से सूचना का प्रवाह रुकना
डेटा हटाने की मांग (Right to Erasure)रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद विषय द्वारा डेटा हटाने का दबाव
RTI Act की धारा 8(1)(j) में संशोधनसरकारी पारदर्शिता में कमी और सूचना के अधिकार पर असर

 

RTI Act 2005 पर पड़ रहा प्रभाव

DPDP Act के लागू होने से सूचना का अधिकार कानून (RTI Act) की धारा 8(1)(j) में भी संशोधन हुआ है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पुराने प्रावधानों में लोकहित (Public Interest) को सर्वोपरि रखा गया था, जबकि नए कानूनी ढांचे में व्यक्तिगत जानकारी के नाम पर जनहित से जुड़ी जानकारियों को दबाया जा सकता है।

 

निष्कर्ष (Summary)

सुप्रीम कोर्ट ने DPDP एक्ट को रद्द नहीं किया है और न ही इस पर कोई अंतरिम स्टे लगाया है। मामला अब केंद्र सरकार के जवाब और 17 नवंबर 2026 को होने वाली अगली सुनवाई पर टिका है। यह फैसला भविष्य में भारत के डिजिटल परिदृश्य में नागरिकों की निजता और निष्पक्ष पत्रकारिता का खाका तय करेगा।

 

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

Q1. DPDP Act क्या है? Ans: डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 भारत में नागरिकों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और उसकी प्रोसेसिंग को विनियमित करने के लिए बनाया गया कानून है।

Q2. DNPA ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका क्यों दाखिल की? Ans: DNPA का तर्क है कि इस कानून में पत्रकारिता के लिए कोई विशेष छूट नहीं दी गई है, जिससे खोजी पत्रकारिता और प्रेस की स्वतंत्रता प्रभावित होगी।

Q3. क्या सुप्रीम कोर्ट ने DPDP Act पर स्टे लगाया है? Ans: नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी प्रावधान पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया है और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

Q4. मामले की अगली सुनवाई कब है? Ans: इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को होगी।

 

Disclaimer

यह लेख उपलब्ध अदालती कार्यवाहियों, जनहित याचिकाओं और सार्वजनिक कानूनी दस्तावेजों पर आधारित एक विश्लेषणात्मक समाचार रिपोर्ट है। इसका उद्देश्य किसी भी विचाराधीन कानूनी मामले (Sub-judice matter) पर अंतिम निर्णय देना नहीं है।

 

संबंधित लिंक्स (Related Links)

विस्तृत खबरों के लिए मातृभूमि समाचार पर जाएँ।

Related Post

Share This Article
Follow:
लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।