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भारत ने UN में रूस के एंटी-कोलोनियलिज़्म प्रस्ताव का किया समर्थन: जानें इसके मायने, इतिहास और वैश्विक प्रभाव

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
6 Min Read

नई दिल्ली।

15 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक विशेष समिति में जब 85 देशों ने रूस द्वारा लाए गए ‘एंटी–कोलोनियलिज़्म (नव–उपनिवेशवाद विरोधी)’ प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, तो इसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत का संकेत दिया। इस प्रस्ताव में एकतरफ़ा (Unilateral) व्यापारिक, वित्तीय और आर्थिक पाबंदियों को आधुनिक समय का उपनिवेशवाद करार दिया गया है।

भारत ने इस प्रस्ताव का खुलकर समर्थन किया। भारत का ‘हाँ’ में दिया गया यह वोट केवल एक सामान्य कूटनीतिक रुख नहीं है, बल्कि यह देश की रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy), विकासशील देशों (Global South) की आवाज़ बनने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में लंबे समय से लंबित सुधारों की मांग को एक मज़बूत मंच प्रदान करता है।

 

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भारत ने ‘हाँ’ में वोट क्यों दिया?

भारत के इस ऐतिहासिक वोट के पीछे तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों तरह के कूटनीतिक व आर्थिक कारण शामिल हैं:

अ. अमेरिका के साथ हालिया टैरिफ विवाद (2025-2026)

अगस्त 2025 में अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर कुल 50% तक का टैरिफ लगाया गया था। इसका मुख्य कारण भारत द्वारा रूस से रियायती दर पर कच्चे तेल की खरीद था। भारत ने इस कदम को पूरी तरह से अनुचित बताया और स्पष्ट किया कि 1.4 अरब से अधिक नागरिकों के लिए ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) सुनिश्चित करना राष्ट्रीय हित का सर्वोपरि फ़ैसला है।

यद्यपि फ़रवरी 2026 में दोनों देशों के बीच हुए अंतरिम व्यापार समझौते के तहत टैरिफ घटाकर 18% कर दिए गए, लेकिन इस घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया कि किस तरह बड़े और शक्तिशाली देश आर्थिक ताक़त का इस्तेमाल अन्य संप्रभु राष्ट्रों की विदेश नीति को प्रभावित करने के लिए करते हैं।

ब. रणनीतिक स्वायत्तता और संप्रभु समानता

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भारत का इतिहास हमेशा से गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) और संप्रभु समानता का समर्थक रहा है। भारत का स्पष्ट मानना है कि रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ किसी देश का अंधविरोध करना नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के अनुकूल स्वतंत्र फ़ैसले लेना है।

UN सुधारों और UNSC में स्थायी सीट की मांग

भारत के इस कूटनीतिक रुख का एक प्रमुख उद्देश्य वैश्विक संस्थाओं में व्यापक सुधार लाना है:

  • 1945 के पुराने ढांचे में बदलाव: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1945 में स्थापित संयुक्त राष्ट्र का मौजूदा ढांचा आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं, डीकोलोनाइज़ेशन और उभरती विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का सही प्रतिनिधित्व नहीं करता।
  • G4 और टेक्स्ट–बेस्ड नेगोशिएशन: भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान (G4) मिलकर UNSC की स्थायी और अस्थायी सीटों के विस्तार के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं। भारत ने औपचारिक बयानों की जगह ठोस टेक्स्ट-बेस्ड चर्चाओं पर ज़ोर दिया है।
  • ग्लोबल साउथ की आवाज़: भारत और अफ़्रीकी महाद्वीप को निर्णय लेने वाले वैश्विक मंचों पर उचित प्रतिनिधित्व न मिलना, उनके लिए राजनीतिक आज़ादी को अधूरा बनाता है।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ और चुनौतियाँ

  • रूस के प्रस्ताव पर मतभेद: इस प्रस्ताव के पक्ष में 85, विरोध में 49 और 23 देश अनुपस्थित रहे। पश्चिमी देशों का तर्क था कि यूक्रेन युद्ध के बीच रूस द्वारा यह प्रस्ताव लाना उसकी साख को प्रभावित करता है।
  • सुरक्षा परिषद में समर्थन व बाधाएँ: भारत की UNSC में स्थायी सदस्यता का अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस ने कई बार समर्थन किया है, जबकि चीन इसमें एक प्रमुख बाधा बना हुआ है।

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1: संयुक्त राष्ट्र में रूस का एंटी–कोलोनियलिज़्म प्रस्ताव क्या था?

उत्तर: यह प्रस्ताव एकतरफ़ा आर्थिक, वित्तीय और व्यापारिक प्रतिबंधों को ‘आधुनिक उपनिवेशवाद’ के रूप में चिन्हित करता है, जो किसी संप्रभु देश की स्वतंत्र नीतियों में बाधा डालते हैं।

Q2: भारत ने इस प्रस्ताव का समर्थन क्यों किया?

उत्तर: भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा, एकतरफ़ा आर्थिक दबावों के विरोध, अपनी ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखने और UN सुधारों की मांग को गति देने के लिए इस प्रस्ताव का समर्थन किया।

Q3: G4 समूह में कौन–कौन से देश शामिल हैं?

उत्तर: G4 समूह में भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान शामिल हैं, जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में विस्तार की मांग कर रहे हैं।

 

संबंधित लेख और संदर्भ लिंक

 

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख उपलब्ध समाचार एवं कूटनीतिक विश्लेषणों के आधार पर सामान्य जानकारी और शैक्षणिक दृष्टिकोण से तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मामलों पर निष्पक्ष विश्लेषण प्रदान करना है।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।