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गांधी का ‘हिंद स्वराज’ बनाम सावरकर का ‘हिंदुत्व’: भारत की मुक्ति, राष्ट्र और पहचान की दो वैचारिक धाराएँ

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महात्मा गांधी हिंद स्वराज और वीर सावरकर हिंदुत्व

भारत की स्वतंत्रता संग्राम की वैचारिक भूमि पर दो शक्तिशाली विचारधाराएँ उभरीं— महात्मा गांधी का ‘हिंद स्वराज’ (1909) और वीर सावरकर का ‘हिंदुत्व’ (1923)। दोनों ही भारत की मुक्ति, अस्मिता (Identity) और राष्ट्र-निर्माण की बात करते हैं, लेकिन उनके रास्ते, साधन और परिभाषाएँ मूलतः भिन्न हैं। जहाँ गांधी भारत की आत्मा को नैतिकता, अहिंसा और आत्म-नियंत्रण से गढ़ना चाहते थे, वहीं सावरकर भारत को शक्ति, संगठन और सांस्कृतिक एकता से निर्मित राष्ट्र के रूप में देखते थे।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • ‘हिंद स्वराज’ — 1909 में लंदन से दक्षिण अफ्रीका जाते समय गांधी द्वारा लिखित
  • ‘हिंदुत्व: हू इज़ ए हिंदू?’ — 1923 में विनायक दामोदर सावरकर द्वारा लिखित

दोनों ग्रंथ औपनिवेशिक भारत के संकट, पहचान संकट और स्वतंत्रता की अवधारणा की प्रतिक्रिया हैं।

तुलनात्मक वैचारिक ढांचा

1. राष्ट्र की परिभाषा

गांधी का दृष्टिकोण
भारत = एक साझा नैतिक घर
जहाँ सभी धर्मों, जातियों और समुदायों के लोग समान नागरिक हैं।
राष्ट्र का आधार नैतिकता और मानवता है, न कि धार्मिक पहचान।

सावरकर का दृष्टिकोण
भारत = सांस्कृतिक राष्ट्र
जहाँ राष्ट्र की पहचान तीन तत्वों से बनती है:

  • पितृभूमि (Fatherland)
  • पुण्यभूमि (Holy land)
  • सांस्कृतिक निरंतरता

यह राष्ट्र की सभ्यतागत पहचान को केंद्र में रखता है।

2. ‘स्वराज’ बनाम ‘हिंदू राष्ट्र’

गांधी का स्वराज

  • केवल अंग्रेजों से मुक्ति नहीं
  • आत्म-शासन (Self-rule)
  • आत्म-नियंत्रण
  • नैतिक अनुशासन
  • ग्राम स्वराज और विकेंद्रीकरण

सावरकर का हिंदुत्व

  • राजनीतिक + सांस्कृतिक पहचान
  • संगठित हिंदू समाज
  • सामूहिक चेतना
  • राष्ट्रीय शक्ति
  • सैन्य और रणनीतिक सोच

3. साध्य और साधन का प्रश्न (Means vs Ends)

गांधी

साधन ही साध्य होते हैं
अहिंसा, सत्य और नैतिकता अनिवार्य मूल्य हैं।
हिंसा से प्राप्त स्वतंत्रता नैतिक रूप से अस्वीकार्य है।

सावरकर

राष्ट्र की सुरक्षा सर्वोपरि
यदि राष्ट्र की रक्षा के लिए हिंसा आवश्यक हो, तो वह वैचारिक रूप से अनुचित नहीं मानी जाती।
यह यथार्थवादी (Realist) राजनीतिक दृष्टिकोण है।

4. धर्म की भूमिका

गांधी

  • सर्व धर्म समभाव
  • धर्म = नैतिक अनुशासन
  • धर्म निजी आस्था है, राज्य का आधार नहीं

सावरकर

  • स्वयं नास्तिक प्रवृत्ति
  • धर्म = संगठनात्मक शक्ति
  • हिंदू धर्म एक सांस्कृतिक बंधन के रूप में

5. व्यक्ति बनाम राष्ट्र

गांधी

व्यक्ति → समाज → राष्ट्र
व्यक्ति के नैतिक उत्थान से राष्ट्र निर्माण

सावरकर

राष्ट्र → समाज → व्यक्ति
राष्ट्र की शक्ति से समाज और व्यक्ति सुरक्षित

सावरकर की सोच आज

  • राष्ट्रीय सुरक्षा
  • सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
  • पहचान राजनीति
  • सामरिक चेतना
  • एकीकृत राष्ट्रीय पहचान

गांधी और सावरकर का विचार-संघर्ष वास्तव में दो भारतों की कल्पना है:

गांधी का भारत
👉 नैतिक भारत
👉 बहुलतावादी भारत
👉 आत्म-नियंत्रण पर आधारित भारत
👉 अहिंसक लोकतांत्रिक भारत

सावरकर का भारत
👉 संगठित भारत
👉 सांस्कृतिक रूप से एकीकृत भारत
👉 शक्तिशाली भारत
👉 सामरिक रूप से सुरक्षित भारत

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