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पश्चिम बंगाल राजनीति: क्या अभिषेक बनर्जी के खिलाफ अपनों ने ही खोल दिया है मोर्चा? जानें पूरी इनसाइड स्टोरी

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
5 Min Read

कोलकाता । शनिवार, 30 मई 2026

पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक बेहद दिलचस्प और अप्रत्याशित मोड़ पर आ खड़ी हुई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी को लेकर राज्य के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल है। ४ मई को आए हालिया चुनाव नतीजों के बाद से अभिषेक बनर्जी की राजनीतिक और प्रशासनिक स्थिति में जो बदलाव आए हैं, उसने विपक्षी दलों के साथ-साथ खुद टीएमसी के भीतर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

अभिषेक बनर्जी ने हाल ही में मीडिया के सामने आकर जो बयान दिया है, वह उनके भीतर के गुस्से और राजनीतिक दबाव को साफ बयां करता है। उन्होंने सीधे तौर पर चुनौती देते हुए कहा है, “चाहे आप मेरा गला काट दें या जो चाहें करें, मुझे झुकाने के लिए आपको 10 बार सोचना पड़ेगा और 7 जन्म लेने पड़ेंगे। मैं गद्दार नहीं हूं।”

केंद्रीय एजेंसियों से राज्य की जांच के घेरे तक: बदल गए समीकरण

अभिषेक बनर्जी के इस बयान के पीछे की क्रोनोलॉजी को समझना बेहद जरूरी है। एक समय था जब अभिषेक बनर्जी केवल केंद्रीय जांच एजेंसियों जैसे प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के निशाने पर थे, जिसे टीएमसी हमेशा ‘बीजेपी की प्रतिशोध की राजनीति’ बताती थी। लेकिन अब पासा पलट चुका है।

अभिषेक बनर्जी ने खुद इस बात को स्वीकार करते हुए तंज कसा कि, “पहले सिर्फ ईडी और सीबीआई थीं, अब बंगाल पुलिस और कोलकाता पुलिस के साथ-साथ केएमसी (कोलकाता नगर निगम) भी शामिल हैं। पहले 2-3 जांच एजेंसियां ​​थीं, अब 5 हैं।” चौंकाने वाली बात यह है कि बंगाल पुलिस, कोलकाता पुलिस और सीआईडी (CID) सीधे तौर पर राज्य सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन आती हैं, जिसका नेतृत्व खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी करती हैं।

सुरक्षा में भारी कटौती और केएमसी का शिकंजा

अभिषेक बनर्जी की इस झुंझलाहट और आक्रामक तेवरों की दो मुख्य वजहें हैं, जो पिछले कुछ दिनों में घटित हुई हैं:

  • हाई-प्रोफाइल सुरक्षा वापस ली गई: चुनाव नतीजों की घोषणा के तुरंत बाद राज्य सरकार ने अभिषेक बनर्जी को मिली विशेष और बेहद कड़ी सुरक्षा व्यवस्था को वापस ले लिया है। अब उन्हें केवल एक सामान्य लोकसभा सदस्य (MP) के स्तर की सुरक्षा दी गई है। राज्य सरकार का अपनी ही पार्टी के ‘नंबर 2’ नेता की सुरक्षा कम करना किसी बड़े राजनीतिक संकेत से कम नहीं है।

  • 17 संपत्तियों पर केएमसी का नोटिस: कोलकाता नगर निगम (KMC) ने अभिषेक बनर्जी के मालिकाना हक या सह-मालिकाना हक वाली 17 संपत्तियों को नोटिस जारी किया है। केएमसी ने इन संपत्तियों की ‘एलिवेशन कॉपी’ (Elevation Copy) मांगी है ताकि यह जांच की जा सके कि क्या इन इमारतों के मूल ढांचे में बिना अनुमति के कोई अवैध निर्माण या बदलाव तो नहीं किया गया है।

अभिषेक का पलटवार: कालीघाट स्थित अपने आवास पर सीआईडी (CID) अधिकारी से खुद सामने आकर नोटिस लेने के बाद बनर्जी ने कहा कि एजेंसियां रास्ता भूल गई थीं, इसलिए उन्होंने खुद आगे बढ़कर नोटिस लिया। वे यह संदेश देना चाहते हैं कि वे भागने वाले नेता नहीं हैं।

राजनीतिक विश्लेषण

इस पूरे घटनाक्रम को केवल “बीजेपी बनाम अभिषेक बनर्जी” के चश्मे से देखना पूरी तरह सही नहीं होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पश्चिम बंगाल सरकार और टीएमसी के भीतर चल रही “ओल्ड गार्ड बनाम न्यू ब्रिगेड” (ममता बनर्जी के वफादार बनाम अभिषेक बनर्जी के समर्थक) की अंदरूनी लड़ाई का नतीजा हो सकता है। राज्य की अपनी एजेंसियों (CID और KMC) का सक्रिय होना यह दिखाता है कि पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी के बढ़ते कद को नियंत्रित करने की कोशिशें की जा रही हैं।

अभिषेक बनर्जी का खुद को “गद्दार नहीं हूं” कहना भी इसी ओर इशारा करता है कि वे पार्टी के भीतर अपनी वफादारी साबित कर रहे हैं, लेकिन साथ ही झुकने को भी तैयार नहीं हैं।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।