लखनऊ|
स्वतंत्रता के बाद शुरुआती चार दशकों तक उत्तर प्रदेश, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राजनीतिक शक्ति का मुख्य केंद्र रहा। यह राज्य न केवल देश को प्रधानमंत्री देने का माध्यम बना, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के एजेंडे को भी दिशा देता था।
- 1951-52 का विशाल जनादेश: आजादी के बाद पहले विधानसभा चुनाव (1951-52) में कांग्रेस ने राज्य की 430 में से रिकॉर्ड 388 सीटें हासिल कर एकतरफा बहुमत स्थापित किया।
- लगातार चुनावी सफलताएं: इसके बाद 1957 में 286 सीटें, 1962 में 249, 1967 में 199, 1969 में 211 और 1974 में 215 सीटें जीतकर कांग्रेस ने राज्य में अपना वर्चस्व कायम रखा।
- नेहरू–गांधी परिवार का गढ़: देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू (फूलपुर), फिरोज़ गांधी (रायबरेली), इंदिरा गांधी (रायबरेली), राजीव गांधी और बाद में सोनिया व राहुल गांधी (अमेठी/रायबरेली) ने इस राज्य से राष्ट्रीय राजनीति का प्रतिनिधित्व किया।
सवर्ण–दलित–मुस्लिम समीकरण: कांग्रेस का अचूक वोट बैंक
कांग्रेस की इस अटूट सफलता के पीछे एक विस्तृत सामाजिक गठबंधन था, जिसमें ब्राह्मण और अन्य सवर्ण जातियां, मुस्लिम समुदाय और दलित वर्ग एक ही राजनीतिक मंच पर एकजुट थे।
- सवर्ण नेतृत्व: पार्टी संगठन और स्थानीय प्रशासन पर मुख्य रूप से सवर्ण वर्ग का वर्चस्व था।
- दलित–मुस्लिम समर्थन: मुस्लिम और दलित मतदाता कांग्रेस को एक समावेशी और धर्मनिरपेक्ष विकल्प के रूप में देखते थे।
- मजबूत स्थानीय कैडर: बूथ स्तर तक फैले कार्यकर्ताओं के नेटवर्क ने इस विविध सामाजिक गठबंधन को दशकों तक संभाले रखा।
1989 का ऐतिहासिक मोड़: मंडल, मंदिर और बहुजन राजनीति
1980 के दशक के अंत में भारतीय राजनीति में आए तीन बड़े बदलावों ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के सामाजिक गठबंधन को पूरी तरह बिखेर दिया:
| आंदोलन / राजनीतिक कारक | प्रभावित वर्ग | नया राजनीतिक केंद्र |
| मंडल आयोग और आरक्षण | अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) | समाजवादी पार्टी (SP) एवं क्षेत्रीय दल |
| राम जन्मभूमि और मंदिर आंदोलन | सवर्ण एवं हिंदू समाज | भारतीय जनता पार्टी (BJP) |
| बहुजन आंदोलन (कांशीराम/मायावती) | दलित मतदाता | बहुजन समाज पार्टी (BSP) |
1985 में 269 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 1989 में 94 सीटों पर आ गिरी और मुलायम सिंह यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने। इसके बाद बाबरी मस्जिद ढहाए जाने (1992) के बाद मुस्लिम मतदाता भी पूरी तरह से समाजवादी पार्टी के साथ चले गए।
पतन की क्रमिक यात्रा: 94 से 2 सीटों तक का सफर
1989 के बाद कांग्रेस का जनाधार वर्ष-दर-वर्ष गिरता चला गया।
[1989] 94 सीटें —> [1991] 46 सीटें —> [1993] 28 सीटें —> [1996] 33 सीटे
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[2022] 02 सीटें <— [2017] 07 सीटें <— [2012] 28 सीटें <— [2002] 25 सीटें
2022 के विधानसभा चुनावों में स्थिति इतनी दयनीय हो गई कि लगभग सभी सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद कांग्रेस केवल 2 सीटें जीत पाई और उसका वोट शेयर गिरकर 2.33% के सर्वकालिक निचले स्तर पर आ गया।
2027 चुनाव का परिदृश्य: ‘जूनियर पार्टनर’ की भूमिका
2024 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी (37 सीटें) और कांग्रेस (6 सीटें) ने मिलकर भाजपा को कड़ी टक्कर दी और 80 में से कुल 43 सीटें जीतीं।
हालांकि, 2027 के आगामी विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस को समाजवादी पार्टी से सीटों की “सम्मानजनक हिस्सेदारी” मांगनी पड़ रही है। जिस पार्टी ने कभी यूपी पर एकछत्र राज किया था, वह अब उस क्षेत्रीय दल के साथ सीटों की बातचीत में एक जूनियर पार्टनर की तरह खड़ी है, जिसका जन्म खुद कांग्रेस के कमजोर होने के बाद हुआ था।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने अंतिम बार सरकार कब बनाई थी?
उत्तर: कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में आखिरी बार 1985 में सरकार बनाई थी। 1989 के चुनाव के बाद से पार्टी राज्य की सत्ता से बाहर है।
Q2. 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कितनी सीटें मिली थीं?
उत्तर: 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 403 में से केवल 2 सीटें मिली थीं और उसका वोट शेयर 2.33% रहा था।
Q3. कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक का बिखराव क्यों हुआ?
उत्तर: 1980 के दशक के अंत में मंडल आंदोलन (OBC लामबंदी), राम मंदिर आंदोलन (सवर्णों का भाजपा की ओर झुकाव) और बसपा के उदय (दलित लामबंदी) के कारण कांग्रेस का सवर्ण-दलित-मुस्लिम गठबंधन बिखर गया।
Disclaimer (अस्वीकरण)
यह लेख ऐतिहासिक आंकड़ों, राजनीतिक रुझानों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध चुनावी विश्लेषणों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल राजनीतिक इतिहास और घटनाओं की निष्पक्ष जानकारी प्रदान करना है।
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