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पारिवारिक रीति-रिवाजों से लेकर त्योहार की खास परंपराओं तक: सोनी सब के सितारे साझा करते हैं अपनी दशहरा परंपराएं

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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मुंबई, अक्टूबर 2026: दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव है, जो परिवारों को अपनी प्रिय परंपराओं, उत्सव की रस्मों और साथ बिताए गए खास पलों के माध्यम से एक साथ लाता है। वैसे तो हर घर में इस पर्व को मनाने का अपना अलग तरीका होता है, लेकिन पीढ़ियों से चली आ रही छोटी‑छोटी परंपराएँ ही इस त्योहार को खास बनाती हैं। इस दशहरा, सोनी सब के कलाकार गुलकी जोशी, टोरल रसपुत्रा, जितेन लालवानी, मुकुल हरीश और अक्षया हिंदलकर अपने पारिवारिक उत्सवों की झलकियाँ साझा कर रहे हैं और उन परंपराओं, यादों तथा व्यक्तिगत रस्मों के बारे में बता रहे हैं, जो इस त्योहार को उनके लिए विशेष बनाती हैं।

टोरल रसपुत्रा, जो हस्तिनापुर के वीर में कुंती का किरदार निभा रही हैं, ने साझा किया, “मेरे लिए दशहरे की एक बेहद खास परंपरा घर पर छोटी‑सी पूजा करना और बड़ों का आशीर्वाद लेना है। यह मेरे लिए अपनी जड़ों से जुड़े रहने और उन मूल्यों को याद करने का एक तरीका है, जिनके साथ हम बड़े हुए हैं। बुराई पर अच्छाई की जीत का इस त्योहार का संदेश मेरे लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि सही काम करने के लिए साहस और दृढ़ विश्वास की आवश्यकता होती है। ये ऐसे मूल्य हैं जिन्हें हमें आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाते रहना चाहिए।”

जितेन लालवानी, जो हस्तिनापुर के वीर में द्रोणाचार्य का किरदार निभा रहे हैं, ने साझा किया, “दशहरा मुझे हमेशा कानपुर में बिताए अपने बचपन की याद दिलाता है, खासकर नवीन मार्केट में होने वाले भव्य रावण दहन को देखने का उत्साह। मेरे चाचा की वहाँ एक दुकान थी, इसलिए हम उनकी इमारत की छत से आतिशबाज़ी और रावण दहन का पूरा नज़ारा देखा करते थे। वह अनुभव सचमुच जादुई लगता था और उसकी यादें आज भी मेरे साथ हैं। मुंबई में दशहरे का उत्सव भले ही अलग महसूस होता हो, लेकिन बचपन के वे जश्न आज भी मेरी यादों में बसे हुए हैं। मेरे लिए त्योहार उन यादों से जुड़े होते हैं जो हम अपने परिवार और उन जगहों के साथ बनाते हैं जहाँ हम बड़े होते हैं, और यही बात उन्हें इतना खास बनाती है।”

गुलकी जोशी, जो यादें में डॉ. सृष्टि का किरदार निभा रही हैं, कहती हैं, “मेरे लिए दशहरा उन छोटी‑छोटी परंपराओं का नाम है जो पूरे परिवार को एक साथ लेकर आती हैं। एक परंपरा जो मुझे विशेष रूप से पसंद है, वह है पूजा के बाद पूरे परिवार का एक साथ बैठकर विशेष भोजन करना। यह सभी को अपनी व्यस्त दिनचर्या से थोड़ा समय निकालकर एक‑दूसरे के साथ बातचीत करने और समय बिताने का अवसर देता है। मुझे लगता है कि यही सरल पल त्योहारों को यादगार बनाते हैं। दशहरा हमें नकारात्मकता को पीछे छोड़कर जीवन को एक नई और सकारात्मक सोच के साथ अपनाने की भी प्रेरणा देता है।”

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मुकुल हरीश, जो पुष्पा इम्पॉसिबल में टाइगर का किरदार निभा रहे हैं, ने साझा किया, “दशहरा मेरे लिए हमेशा परंपराओं, परिवार के साथ बिताए गए समय और स्वादिष्ट व्यंजनों का खूबसूरत संगम रहा है। इस दिन की मेरी सबसे पसंदीदा परंपराओं में से एक है फाफड़ा‑जलेबी के साथ उत्सव की शुरुआत करना। हम अपने वाहनों की पूजा भी करते हैं और आने वाले वर्ष के लिए सुरक्षा, समृद्धि और सौभाग्य का आशीर्वाद मांगते हैं। मेरे लिए यह त्योहार इस बात की याद दिलाता है कि परिस्थितियाँ कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, अंत में अच्छाई की जीत हमेशा बुराई पर होती है। आखिरकार, यही छोटी‑छोटी परंपराएँ, त्योहार के स्वादिष्ट व्यंजन और परिवार के साथ बिताया गया समय दशहरे को इतना खास बनाते हैं।”

अक्षया हिंदलकर, जो पुष्पा इम्पॉसिबल में राशि का किरदार निभा रही हैं, ने साझा किया, “एक मराठी परिवार से होने के नाते, मेरी पसंदीदा दशहरा परंपराओं में से एक है आपटा के पत्तों का सोने के प्रतीक के रूप में आदान‑प्रदान करना, जहाँ सभी एक‑दूसरे को ‘सोना घ्या, सोन्यासारखे रहा!’ कहकर शुभकामनाएँ देते हैं। यह एक बेहद खूबसूरत परंपरा है, जो लोगों को एक साथ जोड़ती है। और निश्चित रूप से, परिवार के साथ त्योहार के स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद लिए बिना कोई भी उत्सव पूरा नहीं होता। जैसे‑जैसे हम बड़े होते हैं और काम में व्यस्त हो जाते हैं, हमें एहसास होता है कि ये पल कितने खास होते हैं। मुझे लगता है कि किसी भी परंपरा की सबसे खूबसूरत बात उससे जुड़ी यादें और वे लोग होते हैं, जिनके साथ हम उन्हें साझा करते हैं।”

सोनी सब पर यादें, हस्तिनापुर के वीर और पुष्पा इम्पॉसिबल देखना न भूलें।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।