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‘श्रेणी’ से ‘जाति’ तक: कैसे औपनिवेशिक नीतियों ने नष्ट किया भारत का स्वायत्त व्यावसायिक ढांचा

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
8 Min Read

नई दिल्ली।

क्या आप जानते हैं कि ब्रिटिश शासन से पहले भारत का आर्थिक ढांचा किस तरह काम करता था? अक्सर हम यह मानते हैं कि भारतीय समाज हमेशा से कठोर जातिगत खानों में बंटा हुआ था। लेकिन इतिहास के पन्ने और शिलालेख एक अलग कहानी बयां करते हैं।

अंग्रेजों के भारत आने से पहले, हमारे देश के बुनकर, धातु ढालने वाले और लोहार केवल किसी जाति के सदस्य नहीं थे; वे एक शक्तिशाली ‘श्रेणी’ (Craft Guild) का हिस्सा थे। ये श्रेणी व्यवस्था स्वायत्त, आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से अत्यंत मजबूत थी।

इन संघों के पास अपना साझा कोष (फंड) होता था, ये अपने नियम स्वयं तय करते थे, नए युवाओं को प्रशिक्षण देते थे और आपस के विवादों को बिना राजा के दरबार में गए खुद सुलझाते थे। लेकिन औपनिवेशिक कर प्रणालियों और जनगणना प्रणालियों ने इस स्वायत्त व्यवस्था को तोड़कर उस पर ‘जाति’ का स्थायी प्रशासनिक ठप्पा लगा दिया।

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ऐतिहासिक साक्ष्य: शिलालेखों और ग्रंथों में ‘श्रेणी’ का प्रमाण

भारत में श्रेणियों का इतिहास बहुत समृद्ध रहा है। इसके प्रमाण प्राचीन नगर नियोजन से लेकर शिलालेखों तक में स्पष्ट रूप से मिलते हैं:

  • अर्थशास्त्र और नगर नियोजन: कौटिल्य के अर्थशास्त्र में चारदीवारी वाले शहरों का जिक्र है, जहां सूती धागे, चमड़े के सामान, कवच और हथियार बनाने वाले कारीगरों के लिए अलग-अलग इलाके तय थे। यह बसावट जाति के आधार पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक और उत्पादन इकाइयों के रूप में थी।
  • मंदसौर का शिलालेख (472 ईस्वी): मध्य प्रदेश के मंदसौर में मिला शिलालेख बयां करता है कि कैसे गुजरात के ‘लाट’ (Lata) क्षेत्र से आए रेशम बुनकरों के एक गिल्ड ने अपने सामूहिक कोष से सूर्य मंदिर का निर्माण कराया और वर्षों बाद उसकी मरम्मत भी कराई। यह व्यवस्था राजा के हस्तक्षेप के बिना, आम working class द्वारा चलाई जाने वाली एक लोकतांत्रिक प्रणाली जैसी थी।

 

बुनकरों का स्वायत्तता काल: जब हुनर का संबंध जाति से नहीं था

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दक्षिण भारत के कोरोमंडल तट का रिकॉर्ड बताता है कि लगभग 1770 तक व्यापारियों के मुकाबले बुनकरों की मोलभाव करने की शक्ति (Bargaining Power) बहुत मजबूत थी:

  • करघों के मालिक: 1771 में चिंगलपुट सर्वेक्षण के अनुसार, 83.4% बुनकर अपने खुद के करघों के मालिक थे। वे महज मजदूर नहीं, बल्कि छोटे उद्यमी थे।
  • सच्ची कार्य कुशलता: बुनाई का काम कैकोलर, देवांगा, साले जैसे कई समुदायों द्वारा किया जाता था। वहीं बारामाहल क्षेत्र में सबसे बेहतरीन कपड़ा ‘मन्नीवार’ समुदाय बनाता था, जिन्हें सामाजिक रूप से अछूत माना जाता था। इससे साफ होता है कि हुनर और आर्थिक सफलता का आधार जातिगत पदानुक्रम नहीं, बल्कि उनकी ‘श्रेणी’ (गिल्ड) थी।

 

अंग्रेजों ने क्या बदला और क्यों?

औपनिवेशिक शासन को प्रशासन चलाने और अधिकतम कर वसूलने के लिए हर व्यक्ति की एक निश्चित पहचान और सूची चाहिए थी। इसके लिए अंग्रेजों ने तीन प्रमुख प्रणालियाँ लागू कीं:

[प्राचीन ‘श्रेणी’ व्यवस्था (गिल्ड)]

 └─► स्वायत्त संघ, साझा फंड, कार्य-आधारित लचीली पहचान

       │

       ▼ (ब्रिटिश नीतियाँ: 1793-1901)

       ├─► कर प्रणाली: स्थायी बंदोबस्त (1793) व रैयतवाड़ी (1820s)

       ├─► कानूनी संहिताकरण: Caste Disabilities Removal Act (1850)

       └─► प्रशासनिक जनगणना: 1871-72 और 1901 (एच. एच. रिस्ले)

       │

       ▼

[कठोर ‘जाति’ व्यवस्था]

 └─► जन्मजात सरकारी पहचान, पदानुक्रमिक ठप्पा

  1. राजस्व प्रणालियाँ: बंगाल का स्थायी बंदोबस्त (1793) और मद्रास/बॉम्बे का रैयतवाड़ी बंदोबस्त (1820s) व्यक्तिगत रूप से करदाता तय करते थे। इसमें सामूहिक जिम्मेदारी उठाने वाले ‘गिल्ड’ के लिए कोई जगह नहीं बची।
  2. कानूनी और जनगणना ढांचा: 1850 के कास्ट डिसएबिलिटीज रिमूवल एक्ट और 1871-1872 की जनगणना में हर भारतीय को एक जातिगत खाने (Box) में रखना अनिवार्य कर दिया गया। 1901 में एच. एच. रिस्ले ने इन जातियों को “सामाजिक वरीयता” के आधार पर क्रमबद्ध कर दिया।
  3. क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट (1871): इस क्रूर कानून ने पूरे के पूरे व्यावसायिक समुदायों को जन्म से ही ‘अपराधी’ घोषित कर दिया, जिसके दंश से कई डी-नोटिफाइड (विमुक्त) समुदाय आज भी उबरने का प्रयास कर रहे हैं।

 

आर्थिक गिरावट: आंकड़ों की जुबानी

इस संस्थागत विनाश का नतीजा भारत के व्यापक वि-औद्योगीकरण के रूप में सामने आया:

  • वैश्विक उत्पादन: 1750 में वैश्विक औद्योगिक उत्पादन में भारत का हिस्सा 24.5% था, जो 1880 तक गिरकर केवल 2.8% रह गया।
  • कपड़ा व्यापार: 1730 के दशक में पश्चिम अफ्रीका के साथ व्यापार में भारतीय कपड़ों की हिस्सेदारी 38% थी, जो 1840 के दशक में सिमटकर 3% रह गई।
  • रोजगार विनाश: बिहार में 1809–1813 के दौरान औद्योगिक मजदूरों में सूत कातने वालों की संख्या लगभग 80% थी, जो 1901 तक लगभग पूरी तरह समाप्त हो गई।

 

पुनरोद्धार का रास्ता: पुरानी कार्यप्रणाली की बहाली

आज भारत में चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना के अनुसार 31.45 लाख हथकरघा परिवार हैं, जिनमें 72% से अधिक महिलाएं हैं। कारीगरों का हुनर आज भी जीवित है, बस उनके इर्द-गिर्द का संस्थागत ढांचा गायब हो गया था।

इसे पुनः खड़ा करने के लिए आधुनिक समय में कई प्रयास किए जा रहे हैं:

  • पीएम विश्वकर्मा योजना: 18 पारंपरिक व्यवसायों को वित्तीय सहायता, टूलकिट और प्रशिक्षण प्रदान कर उन्हें नए युग के अनुकूल बनाना।
  • सीड (SEED) योजना: औपनिवेशिक कानूनों से प्रभावित विमुक्त और खानाबदोश समुदायों का सशक्तिकरण।
  • जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI Tag): जैसे ‘बिदरीवेयर’ का GI टैग; यह अधिकार किसी व्यक्तिगत कंपनी का न होकर पूरे कारीगर समुदाय का होता है—जो प्राचीन ‘श्रेणी’ मॉडल का ही एक आधुनिक रूप है।

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1: ‘श्रेणी’ (Shreni) क्या थी?

उत्तर: प्राचीन और मध्यकालीन भारत में श्रेणी शिल्पकारों और व्यापारियों का एक स्वायत्त संघ (Craft Guild) थी। इसके पास अपना कोष होता था, यह काम के मानक तय करती थी और सदस्यों के विवाद खुद सुलझाती थी।

Q2: अंग्रेजों की राजस्व नीति ने श्रेणियों को कैसे प्रभावित किया?

उत्तर: स्थायी बंदोबस्त और रैयतवाड़ी जैसी राजस्व प्रणालियों में व्यक्तिगत रूप से कर तय किया जाता था। इसने सामूहिक रूप से मोलभाव करने वाली ‘श्रेणी’ व्यवस्था की उपयोगिता को खत्म कर दिया।

Q3: क्या प्राचीन भारत में पेशा पूरी तरह जाति से तय होता था?

उत्तर: ऐतिहासिक साक्ष्य (जैसे मंदसौर शिलालेख व 1822 का शिक्षा सर्वेक्षण) दर्शाते हैं कि पूर्व-औपनिवेशिक काल में हुनर और व्यापार लचीले थे। अंग्रेजों के जनगणना और संहिताकरण के बाद जातिगत पहचान अत्यधिक कठोर हो गई।

 

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख ऐतिहासिक दस्तावेजों, शोध पत्रिकाओं, औपनिवेशिक अभिलेखागारों और सरकारी जनगणना आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य ऐतिहासिक और आर्थिक घटनाक्रमों का निष्पक्ष व सूचनात्मक विवरण प्रस्तुत करना है।

 

प्रासंगिक लिंक्स और संदर्भ (Relevant Links)

संबंधित राष्ट्रीय, सामाजिक, सांस्कृतिक और औपनिवेशिक आर्थिक विश्लेषण से जुड़ी विस्तृत रिपोर्ट पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक्स पर विजिट करें:

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।