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कलंक से शक्ति की ओर: 1871 के दमनकारी कानून का इतिहास और विमुक्त जनजातियों (DNT) का पुनरुद्धार

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
7 Min Read

नई दिल्ली|

ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन ने 1871 में आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act – CTA) लागू करके भारतीय समाज में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले समुदायों को ‘जन्मजात अपराधी’ घोषित कर दिया था। अंग्रेजों ने अपनी सत्ता को सुरक्षित करने और देशी प्रतिरोध को कुचलने के लिए पारंपरिक पशुपालकों, घुमंतू व्यापारियों, कारीगरों और वनवासियों को जानबूझकर हाशिए पर धकेल दिया।

प्राचीन काल से ही बंजारा, येरुकुला, कोरावार, सांसी, मीणा और गाड़िया लोहार जैसे खानाबदोश समुदायों ने भारत के विस्तृत सड़क नेटवर्क और बार्टर (वस्तु-विनिमय) प्रणालियों का संचालन किया। ये समुदाय न केवल नमक, अनाज और औषधियों का परिवहन करते थे, बल्कि प्राचीन व्यापार मार्गों, तीर्थस्थलों और स्थानीय संस्कृति की रक्षा भी करते थे।

इनमें से कई समुदायों का संबंध राजपूत योद्धाओं और क्षेत्रीय रक्षकों की परंपरा से रहा है, जिन्होंने मध्यकालीन आक्रमणकारियों और ईस्ट इंडिया कंपनी का पुरजोर विरोध किया।

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औपनिवेशिक दुष्प्रचार और विक्टोरियन अपराधशास्त्र का काला सच

ब्रिटिश सत्ता ने स्वतंत्र रूप से घूमने वाले इन समुदायों की गतिशीलता को अपने प्रशासनिक नियंत्रण और कर संग्रह प्रणाली के लिए एक बड़ा खतरा माना।

  1. ठगी अभियान (1835): लॉर्ड विलियम बेंटिक और विलियम हेनरी स्लीमन द्वारा गठित ‘ठगी और डकैती विभाग’ ने स्थानीय राजाओं की सहायता करने वाले योद्धा व कारीगर समुदायों को ‘पेशेवर ठग’ का टैग देकर सामूहिक सजा का एक प्रशासनिक टेम्पलेट तैयार किया।
  2. बायोलॉजिकल डिटरमिनिज़्म: टी.वी. स्टीफंस और सेसारे लोम्ब्रोसो जैसे यूरोपीय विचारकों के पॉजिटिविस्ट क्रिमिनोलॉजी सिद्धांतों का गलत इस्तेमाल कर विक्टोरियन पॉज़िटिविज़्म के आधार पर जाति व्यवस्था को “खानदानी अपराध” से जोड़ दिया गया।
  3. सेंसस कोडिफिकेशन (1931): हर्बर्ट होप रिस्ले के एंथ्रोपोमेट्रिक वर्गीकरण मॉडल ने 1931 की जनगणना के अध्याय XII (“क्रिमिनल एंड वांडरिंग ट्राइब्स”) में 200 से अधिक समुदायों (अकेले मद्रास प्रेसीडेंसी में 237 जातियों) को आधिकारिक रूप से आपराधिक सूची में दर्ज कर दिया।

 

आर्थिक घेराबंदी, मिशनरी शोषण और विमुक्ति के बाद का संघर्ष

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वन कानूनों (Indian Forest Acts) और नमक/परिवहन पर सरकारी व निजी मोनोपॉली के कारण इन समुदायों की पारंपरिक आजीविका पूरी तरह नष्ट हो गई। काम-धंधा छिन जाने पर जब इन्होंने जीवन-यापन की कोशिश की, तो इन्हें ‘आवारागर्दी’ और ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ के तहत गिरफ्तार कर साल्वेशन आर्मी जैसी मिशनरी संस्थाओं के जरिए श्रम शिविरों (Reformatory Settlements) में कंटीले तारों के पीछे कैद कर दिया गया।

 

स्वतंत्रता के बाद की स्थिति (DNT का दर्जा)

  • विमुक्ति दिवस (31 अगस्त 1952): अनंतशयनम अय्यंगर समिति (1949) की सिफारिशों पर 1952 में इस कानून को रद्द कर समुदायों को ‘विमुक्त’ (Denotified) घोषित किया गया।
  • आदतन अपराधी कानून (Habitual Offenders Act): कानून निरस्त होने के बाद भी राज्यों के ‘आदतन अपराधी कानूनों’ ने पुलिस निगरानी और सामाजिक बहिष्कार को जारी रखा।
  • वर्गीकरण का संकट: 1965 की लोकुर समिति के भौगोलिक अलगाव जैसे सख्त मानकों के कारण कई खानाबदोश समूह ST श्रेणी में जगह नहीं पा सके। परिणाम स्वरूप, एक ही समुदाय अलग-अलग राज्यों में SC, ST, OBC या किसी भी श्रेणी में शामिल नहीं हो सका।

 

प्रमुख सरकारी आयोगों के आंकड़े और निष्कर्ष

आयोग / समितिवर्षप्रमुख निष्कर्ष एवं सिफारिशें
अय्यंगर समिति19491871 के आपराधिक जनजाति अधिनियम को समाप्त करने की सीधी सिफारिश की।
रेन्के आयोग2006–2008DNT, खानाबदोश और अर्ध-खानाबदोश आबादी को लगभग 10.74 करोड़ (6 करोड़ DNT) बताया। 90% के पास भूमि स्वामित्व का अभाव पाया गया।
इदाते आयोग20181,262 DNT/खानाबदोश समुदायों की पहचान की; पाया कि 269 समुदाय किसी भी SC/ST/OBC सूची में नहीं हैं। आगामी जनगणना में अलग गिनती का सुझाव दिया।

 

आगे की राह: अंत्योदय से सभ्यतागत गरिमा की ओर

विमुक्त और खानाबदोश समुदायों के इस औपनिवेशिक घाव को भरना केवल नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि एक ‘राष्ट्र धर्म’ है।

  1. सटीक जनगणना: 2027 की राष्ट्रीय जनगणना में सभी विमुक्त, खानाबदोश और अर्ध-खानाबदोश समुदायों की एक अलग और पारदर्शी गिनती की जानी चाहिए।
  2. समान वर्गीकरण नीति: राज्य-स्तरीय विसंगतियों को दूर करके पूरे देश में समान जनकल्याणकारी अधिकार और पहचान पत्र सुनिश्चित किए जाएं।
  3. आजीविका व भूमि आवंटन: भूमिहीन परिवारों को स्थायी आवास, पहचान पत्र और कौशल विकास योजनाओं (जैसे SEED योजना का सुदृढ़ीकरण) से जोड़ा जाए।

 

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQ)

Q1: ‘विमुक्त जनजातियाँ’ (Denotified Tribes – DNT) किसे कहा जाता है?

उत्तर: वे समुदाय जिन्हें ब्रिटिश शासन ने 1871 के आपराधिक जनजाति अधिनियम (CTA) के तहत ‘जन्मजात अपराधी’ घोषित कर दिया था और जिन्हें स्वतंत्रता के बाद 31 अगस्त 1952 को उस दमनकारी सूची से मुक्त (De-notify) किया गया, उन्हें विमुक्त जनजातियाँ कहा जाता है।

Q2: विमुक्ति दिवस (De-notification Day) कब मनाया जाता है?

उत्तर: प्रतिवर्ष 31 अगस्त को विमुक्ति दिवस के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन 1952 में ब्रिटिश काल का काला कानून औपचारिक रूप से निरस्त हुआ था।

Q3: इदाते आयोग (2018) की मुख्य सिफारिश क्या थी?

उत्तर: इदाते आयोग ने 1,262 DNT समुदायों की पहचान की और पाया कि 269 समुदाय किसी भी आरक्षित श्रेणी में नहीं आते हैं। आयोग ने अगली जनगणना में इन समुदायों की प्रत्यक्ष गणना कराने की सिफारिश की।

 

⚠️ अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख ऐतिहासिक अभिलेखों, विभिन्न राष्ट्रीय आयोगों (जैसे अय्यंगर, रेन्के एवं इदाते आयोग) की रिपोर्टों तथा औपनिवेशिक कालीन सामाजिक–आर्थिक अध्ययनों के विश्लेषणात्मक संदर्भों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी समुदाय की भावना को आहत करना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों और सामाजिक सुधार के संवैधानिक प्रयासों को उजागर करना है।

 

🌐 संबंधित लिंक एवं संदर्भ

  • मातृभूमि समाचार की आधिकारिक वेबसाइट और अन्य समसामयिक विषयों के लिए देखें: Matribhumi Samachar

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।