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सुप्रीम कोर्ट ने कविता मामले में इमरान प्रतापगढ़ी पर दर्ज एफआईआर की रद्द

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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अहमदाबाद. कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. शीर्ष अदालत ने सोशल मीडिया पर कविता पोस्ट करने के मामले में उनके खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया. कविता संबंधी आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौलिक अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए. पुलिस बुनियादी सुरक्षा की रक्षा करे. जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने यह फैसला सुनाया.

अभिव्यक्ति की आजादी पर शीर्ष अदालत ने कहा कि कविता, कला और व्यंग जीवन को सार्थक बनाते हैं. कला के माध्यम से अभिव्यक्ति की आजादी जरूरी है. विचारों का सम्मान होना चाहिए. इमरान प्रतापगढ़ी ने FIR रद्द करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की थी. गुजरात पुलिस ने इमरान प्रतापगढ़ी पर FIR दर्ज की थी. सोशल मीडिया पर पोस्ट कविता को लेकर एफआईआर दर्ज की गई थी.

कला के जरिए अभिव्यक्ति की आजादी जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि संविधान के अनुसार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगाया जा सकता है, लेकिन उचित प्रतिबंध नागरिकों के अधिकारों को कुचलने के लिए अनुचित और काल्पनिक नहीं होना चाहिए. कविता, नाटक, संगीत, व्यंग्य सहित कला के विभिन्न रूप मानव जीवन को अधिक सार्थक बनाते हैं और लोगों को इसके माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए.

जस्टिस एएस ओका ने क्या कहा?

जस्टिस एएस ओका ने कहा कि कोई अपराध नहीं हुआ. जब आरोप लिखित रूप में हो तो पुलिस अधिकारी को इसे पढ़ना चाहिए, जब अपराध बोले गए या बोले गए शब्दों के बारे में हो तो पुलिस को यह ध्यान रखना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बिना ऐसा करना असंभव है. भले ही बड़ी संख्या में लोग इसे नापसंद करते हों. इसे संरक्षित करने की आवश्यकता है. जजों को बोले गए या लिखे गए शब्द पसंद नहीं आ सकते हैं, फिर भी हमें इसे संरक्षित करने और संवैधानिक सुरक्षा का सम्मान करने की आवश्यकता है. न्यायालयों को संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए सबसे आगे रहना चाहिए.

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जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने क्या कहा?

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि नागरिक होने के नाते पुलिस अधिकारी अधिकारों की रक्षा करने के लिए बाध्य हैं. जब धारा 196 बीएनएसएस के तहत अपराध होता है तो इसे कमजोर दिमाग या उन लोगों के मानकों के अनुसार नहीं आंका जा सकता है जो हमेशा हर आलोचना को अपने ऊपर हमला मानते हैं. इसे साहसी दिमाग के आधार पर आंका जाना चाहिए. हमने माना है कि जब किसी अपराध का आरोप बोले गए या बोले गए शब्दों के आधार पर लगाया जाता है, तो मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए बीएनएसएस की धारा 173(3) का सहारा लेना पड़ता है.

साभार : टीवी9 भारतवर्ष

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।