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पीएम मोदी करेंगे 28वें राष्ट्रमंडल अध्यक्ष सम्मेलन (CSPOC) का उद्घाटन: जानें संसद में AI का भविष्य

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
4 Min Read

नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज (15 जनवरी, 2026) नई दिल्ली के संविधान सदन (पुराना संसद भवन) में 28वें राष्ट्रमंडल अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन (CSPOC) का उद्घाटन कर रहे हैं। इस सम्मेलन में 42 राष्ट्रमंडल देशों और 4 अर्ध-स्वायत्त संसदों के 61 से अधिक स्पीकर्स और पीठासीन अधिकारी हिस्सा ले रहे हैं।

यह सम्मेलन न केवल संसदीय कूटनीति का एक बड़ा मंच है, बल्कि डिजिटल युग में लोकतंत्र के भविष्य पर विचार-विमर्श का केंद्र भी है।

संसदीय लोकतंत्र और एआई (AI) का संगम

इस बार के सम्मेलन का मुख्य आकर्षण ‘संसद में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ का उपयोग है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के नेतृत्व में आयोजित इस चर्चा में निम्नलिखित बिंदुओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है:

1. विधायी दक्षता में सुधार

AI के माध्यम से संसदीय दस्तावेजों, पुराने बहसों के रिकॉर्ड और एजेंडे को पल भर में प्रोसेस किया जा सकता है। भारत पहले से ही AI का उपयोग करके संसदीय दस्तावेजों का 22 भारतीय भाषाओं में त्वरित अनुवाद करने की दिशा में काम कर रहा है, जिससे सांसदों को उनकी मातृभाषा में जानकारी आसानी से मिल सकेगी।

2. डेटा-संचालित निर्णय लेना

AI की मदद से नीति निर्माण (Policy Making) के दौरान व्यापक डेटा का विश्लेषण किया जा सकता है। यह सांसदों को जलवायु परिवर्तन, साइबर अपराध और आतंकवाद जैसे जटिल वैश्विक मुद्दों पर अधिक सटीक और शोध-आधारित निर्णय लेने में सहायता करता है।

3. नवाचार बनाम निगरानी (Balance between Innovation and Oversight)

सम्मेलन में इस बात पर गहन चर्चा हो रही है कि AI के लाभों का लाभ उठाते हुए इसके संभावित खतरों, जैसे कि डेटा प्राइवेसी और गलत सूचना (Misinformation), से कैसे बचा जाए। लोकतांत्रिक संस्थाओं को सशक्त बनाने के लिए तकनीक का उपयोग तो हो, लेकिन वह पारदर्शिता और निष्पक्षता की सीमाओं के भीतर हो।

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डिजिटल लोकतंत्र के अन्य महत्वपूर्ण विषय

संसदीय कामकाज को आधुनिक बनाने के लिए सम्मेलन में अन्य मुद्दों पर भी सत्र आयोजित किए गए हैं:

  • सोशल मीडिया का प्रभाव: सांसदों की कार्यशैली और सार्वजनिक विमर्श पर सोशल मीडिया के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों पर चर्चा।

  • मतदान से परे नागरिक भागीदारी: चुनाव के अलावा भी आम जनता को डिजिटल माध्यमों से संसद की गतिविधियों से कैसे जोड़ा जाए, इस पर रणनीतियां बनाई जा रही हैं।

  • पेपरलेस वर्किंग: यह पूरा सम्मेलन डिजिटल आधारित है, जिसमें कागज का शून्य उपयोग किया जा रहा है, जो ‘ग्रीन पार्लियामेंट’ की दिशा में एक बड़ा कदम है।

सम्मेलन का महत्व

भारत में यह सम्मेलन 16 साल बाद (पिछली बार 2010 में) आयोजित हो रहा है। यह आयोजन भारत को ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ के रूप में अपनी वैश्विक छवि मजबूत करने और राष्ट्रमंडल देशों के बीच संस्थागत सहयोग बढ़ाने का एक सुनहरा अवसर प्रदान करता है।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।