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पीरियड लीव: कर्नाटक की महिलाओं ने ही क्यों दी सरकार को कोर्ट में चुनौती? समानता बनाम सुरक्षा की बड़ी जंग

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
4 Min Read

बेंगलुरु | शुक्रवार, 27 मार्च 2026

कर्नाटक सरकार द्वारा महिला कर्मचारियों के लिए घोषित ‘मासिक धर्म अवकाश’ (Menstrual Leave) की नीति अब कानूनी पचड़ों में फंस गई है। दिलचस्प बात यह है कि इस नीति का विरोध पुरुष नहीं, बल्कि खुद कॉर्पोरेट जगत की कद्दावर महिलाएं कर रही हैं। बेंगलुरु की विभिन्न निजी कंपनियों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत 15 महिला मैनेजरों ने कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

? क्या है मामला और क्यों भड़की चिंगारी?

20 नवंबर 2025 को कर्नाटक सरकार ने एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए निजी और सरकारी क्षेत्रों में महिला कर्मचारियों के लिए हर महीने एक दिन का सवेतन (Paid) मासिक धर्म अवकाश अनिवार्य कर दिया था। सरकार का तर्क था कि यह महिलाओं के स्वास्थ्य और कार्यक्षमता को बेहतर बनाने के लिए एक मानवीय कदम है।

हालांकि, 23 मार्च 2026 को दायर इस याचिका ने सरकार के इन दावों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह “भलाई” दरअसल महिलाओं के करियर के लिए “खाई” साबित हो सकती है।

⚖️ कोर्ट में दलीलें: “हमें सहानुभूति नहीं, समानता चाहिए”

जस्टिस अनंत रामनाथ हेगड़े की बेंच के सामने याचिकाकर्ताओं ने जो तर्क रखे हैं, वे कार्यस्थल पर लैंगिक समानता की एक नई परिभाषा पेश करते हैं:

  • हायरिंग में भेदभाव का डर: महिलाओं का तर्क है कि अतिरिक्त पेड लीव के कारण कंपनियां महिलाओं को नौकरी देने में हिचकिचाएंगी, जिससे ‘जेंडर गैप’ और बढ़ेगा।

  • समानता के सिद्धांत का उल्लंघन: याचिका के अनुसार, यह नीति संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है क्योंकि यह केवल लिंग के आधार पर कार्यस्थल पर अलग नियम बनाती है।

  • रूढ़िवादिता को बढ़ावा: महिलाओं का कहना है कि यह आदेश उन्हें “जैविक रूप से कमजोर” प्रदर्शित करता है, जो वर्षों की मेहनत से बनाई गई उनकी ‘सक्षम पेशेवर’ वाली छवि को नुकसान पहुँचाता है।

“यह पितृसत्तात्मक सोच को बढ़ावा देने जैसा है। हम चाहते हैं कि हमें हमारी काबिलियत पर परखा जाए, न कि हमारी जैविक प्रक्रियाओं के आधार पर हमें विशेष रियायतें देकर अलग-थलग किया जाए।” — याचिका का एक अंश

? विशेषज्ञों की राय: क्या यह ‘जेंडर सेंसिटिव’ है या ‘प्रतिगामी’?

इस मामले ने विशेषज्ञों को दो धड़ों में बांट दिया है।

  1. समर्थक गुट: इनका कहना है कि जैसे मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) को अब अधिकार माना जाता है, वैसे ही पीरियड लीव भी स्वास्थ्य का अधिकार है। बिहार और केरल जैसे राज्यों ने पहले ही इस दिशा में मिसाल पेश की है।

  2. विरोधी गुट: कॉर्पोरेट विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे स्टार्टअप्स और मध्यम उद्योगों (SMEs) के लिए यह आर्थिक बोझ बन सकता है, जिससे वे पुरुष उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने लगेंगे।

?️ हाईकोर्ट की कार्यवाही और आगे की राह

कर्नाटक हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई उन याचिकाओं के साथ क्लब कर दी गई है, जो विभिन्न नियोक्ता संगठनों (Employers’ Associations) द्वारा पहले ही दायर की जा चुकी हैं।

अदालत को अब यह तय करना है कि क्या राज्य सरकार का यह आदेश अनुच्छेद 15(3) (जो महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान की अनुमति देता है) के दायरे में आता है या यह वाकई महिलाओं के रोजगार अवसरों के लिए खतरा है।

? निष्कर्ष

यह मामला केवल एक दिन की छुट्टी का नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि भविष्य के वर्कप्लेस में ‘समानता’ का स्वरूप क्या होगा। क्या कार्यस्थल को शारीरिक भिन्नताओं को स्वीकार करना चाहिए, या बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए समान नियम होने चाहिए?

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।