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सनातन हिंदू धर्म के अनुयायियों को भी मिलें समान अधिकार

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– प्रहलाद सबनानी

भारत में आज भी अरब के आक्रांता इसलिए याद किए जाते हैं कि उन्होंने बहुत बड़ी मात्रा में हिंदू मंदिरों को तोड़ा और या तो तोड़े गए इन मंदिरों की जगह मस्जिदें बना दीं अथवा इन मंदिर को तोड़कर छोड़ दिया गया। न केवल हिंदुओं के आस्था स्थलों को ध्वस्त किया गया बल्कि बहुत बड़ी संख्या में हिंदुओं का जबरन धर्म परिवर्तन भी करवाया गया और जिन हिंदुओं ने धर्म परिवर्तन नहीं किया उन्हें मार दिया गया। अरब के आक्रांताओं के बाद अंग्रेजों ने भी अपने शासनकाल में हिंदू धर्मावलंबियों पर कई प्रकार के अत्याचार किए।

अंग्रेजों ने तो बाकायदा यह समझ लिया था कि भारत में सनातन धर्म को नष्ट किए बिना इस देश पर राज नहीं किया जा सकता। अतः उन्होंने सनातन संस्कृति को खत्म करने की पूरी कोशिश की। इसी तर्ज पर मैकाले सिद्धांत भारत में लागू किया गया जिसके अंतर्गत भारत की सांस्कृतिक मनीषा को सफलतापूर्वक खत्म किए जाने के प्रयास किए गए। भारतीयों के मन में सनातन संस्कृति के प्रति इस प्रकार का भाव पैदा किया गया कि जिससे उन्हें अपना हिंदू धर्म ही पिछड़ा हुआ दिखने लगा और भारत में केवल क्लर्क पैदा किए जाने लगे, जो कुछ भी सोच न सके एवं केवल अंग्रेजों द्वारा प्रतिपादित नियमों का पालन करते रहें। इस प्रकार अंग्रेजों ने हमारे ऊपर लगभग 200 वर्षों तक शासन किया।

अरब के आक्रांताओं एवं अंग्रेजों ने तो भारतीय संस्कृति को तहस नहस करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी परंतु दुर्भाग्य से वर्ष 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी हिंदुओं पर एक तरह से इसी प्रकार के अत्याचार जारी रहे। दरअसल, उस समय पर संविधान में दो ऐसी धाराएं (अनुच्छेद 28 एवं अनुच्छेद 30) जोड़ी गईं जिसका सीधा असर सनातन हिंदू संस्कृति के अनुयायियों पर विपरीत रूप से पड़ा। अनुच्छेद 28 के अनुसार, किसी भी सरकारी शिक्षण संस्थान द्वारा धार्मिक शिक्षा देने पर रोक लगा दी गई। परंतु अनुच्छेद 30 में यह कहा गया कि अल्पसंख्यकों को यह अधिकार रहेगा कि वे अपने शिक्षण संस्थान स्थापित करें एवं उनका संचालन करें। सरकार भी इन संस्थानों को अनुदान एवं अन्य आवश्यक मदद उपलब्ध कराएगी।

इन शिक्षण संस्थानों में धर्म की शिक्षा देने की अनुमति भी प्रदान कर दी गई। मुसलमान, ईसाई, सिक्ख, बौध एवं जैन धर्म के अनुयायियों को अल्पसख्यकों की श्रेणी में रखा गया। इस प्रकार अनुच्छेद 30 केवल सनातन हिंदू धर्म को मानने वाले अनुयायियों पर प्रतिबंध लगाता है कि उनके शिक्षण संस्थानों में हिंदू धर्म की शिक्षा नहीं दी जा सकती है। यह अपने आप में पूरे विश्व में एक मात्र उदाहरण है कि बहुसंख्यक समुदाय को अपने धर्म की शिक्षा देने से कानूनी रूप से रोका गया है। बाकायदा संविधान की आड़ लेकर सरकार यह कह रही है कि कुछ संस्थान धार्मिक शिक्षा दे सकते हैं और कुछ अन्य संस्थान धार्मिक शिक्षा नहीं दे सकते हैं। अर्थात, सनातन हिंदू धर्म को मानने वाले लोग अपने शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा नहीं दे सकते जबकि मदरसों में इस्लाम की शिक्षा दी जा सकती है और हदीस पढ़ाई जा सकती है। इसी प्रकार, ईसाईयों द्वारा संचालित स्कूलों में ईसाई धर्म की शिक्षा दी जा सकती है एवं अन्य अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित स्कूलों में भी अन्य धर्मों की शिक्षा दी जा सकती हैं परंतु केवल सनातन हिंदू धर्म की शिक्षा स्कूलों में नहीं दी जा सकती है।

इस प्रकार, पिछले 75 वर्षों के दौरान इस्लाम मजहब को मानने वाले, ईसाईयत को मानने वाले, सिक्ख धर्म को मानने वाले, बौध धर्म और जैन धर्म को मानने वाले अनुयायी अपने अपने धर्म की शिक्षा पाते रहे परंतु सनातन हिंदू धर्म को मानने वाले हिंदू अपने धर्म की शिक्षा से वंचित रहे। और इसलिए, अन्य धर्मों के अनुयायियों के बच्चों को उनके धर्म के सम्बंध में स्पष्ट जानकारी है परंतु केवल सनातन धर्म के अनुयायियों के बच्चों को अपने धर्म के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं है। पुरातन भारत में हिंदू धर्म के अनुयायी अपने बच्चों को गुरूकुल में भेजा करते थे ताकि वे सनातन हिंदू धर्म की शिक्षा गृहण कर सकें। परंतु, इस खंडकाल में गुरूकुल ही बंद कर दिए गए।

सनातन हिंदू संस्कृति पर अत्याचार करने के मामले में अंग्रेजी शासक यहां पर ही नहीं रुके उन्होंने वर्ष 1863 में एक कानून बनाया जिसके अनुसार हिंदू मठ एवं मंदिरों के संचालन का अधिकार अपने हाथ में ले लिया। दरअसल उनके इस निर्णय के पीछे उनकी चल यह थी कि वे दक्षिण भारत के मंदिरों की सम्पत्ति पर कब्जा जमा सकें और उन्हें इन मंदिरों के माध्यम से नियमित आय होती रहे। चूंकि अरब आक्रांता दक्षिण भारत के मठ मंदिरों की लूट खसोट करने में कामयाब नहीं हो पाए थे अतः अंग्रेजों ने अपने शासन काल में पिछले दरवाजे से इन मंदिरों को लूटने के लिए उक्त कानून बनाया।

इस कानून बनाने का कारण यह दिया गया कि हिंदू धर्म को मानने वाले अनुयायी इन मंदिरों का संचालन नहीं कर सकते हैं। यहां सोचने वाली बात यह भी है कि अन्य धर्मों को मानने वाले अल्पसंख्यक अनुयायी अपने धार्मिक स्थलों का प्रबंधन कर सकते हैं परंतु केवल हिंदू धर्म को मानने वाले अनुयायी ही अपने मंदिरों का प्रबंधन नहीं कर सकते हैं, यह थी अंग्रेजों की हिंदू धर्म को नुक्सान पहुंचाने की एक और चाल। इस प्रकार भारत के मठ एवं मंदिरों की आय अंग्रेज सरकार लेती रही और इन मंदिरों की सम्पत्तियों पर भी अंग्रेजों ने अपना कब्जा जमा लिया। दुःख का विषय यह है कि उक्त कानून भारत में आज भी लागू है और आज भी लगभग 4 लाख मठ और मंदिर सरकार के नियंत्रण में हैं।

एक अन्य अनुमान के अनुसार उक्त वर्णित कानून के लागू रहने के चलते आज हिंदू मठ एवं मंदिरों की लगभग 4 लाख एकड़ जमीन भी सरकार के कब्जे में है। जबकि दूसरी ओर इस खंडकाल में वक़्फ बोर्ड एवं ईसाई मशीनरियों को अतिरिक्त जमीन का हस्तांतरण लगातार किया जाता रहा है। इसके परिणामस्वरूप आज स्थिति यह हो गई है कि रक्षा मंत्रालय एवं रेल्वे मंत्रालय के बाद सबसे अधिक जमीन वक़्फ बोर्ड के पास जमा हो गई है। कुछ लोगों का यह भी अभिमत है कि चर्च के पास वक़्फ बोर्ड से अधिक जमीन जमा है। कुल मिलाकर इन दोनों संस्थानों की आपस में प्रतिस्पर्धा चल रही है कि अधिक जमीन वक़्फ बोर्ड के पास है अथवा चर्च के पास।

इस सबका परिणाम यह हुआ है कि आज वक़्फ बोर्ड और चर्च दोनों की कुल जमीन मिलाकर रक्षा मंत्रालय और रेल्वे मंत्रालय से अधिक हो गई है। यह सब कुछ स्वतंत्र भारत में हुआ है और इस ओर किसी का शायद ध्यान ही नहीं गया है। ऐसा भी कहा जाता है कि आज सबसे मूल्यवान जमीन चर्च के पास है। जबकि हिंदुओं के मठ मंदिरों के पास जो जमीन थी वह भी सरकार ने ले ली है। इसलिए अब देश में यह मांग लगातार उठ रही है कि सरकार या तो अनुच्छेद 28 और 30 को खत्म करे एवं इसके स्थान पर एक नया कानून बनाए जिसके नियम समस्त धर्मों के अनुयायियों के संस्थानों पर समान रूप से लागू हो। दूसरे, सरकार मठ और मंदिरों को अपने नियंत्रण से बाहर करे और इसका नियंत्रण सनातन हिंदू धर्म के अनुयायियों को सौंप दिया जाय।

इसके लिए हिंदू धर्म के अनुयायियों द्वारा संचालित ट्रस्ट की स्थापना का प्रावधान भी किया जा सकता है जो कि इन मठ और मंदिरों का संचालन करे तथा इन मठ और मंदिरों के माध्यम से ही शिक्षण संस्थानों एवं अस्पतालों का निर्माण करे, जो समाज के कमजोर वर्गों का भला करे। विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के बीच भेद भाव अब बंद होना चाहिए। हिंदू धर्म को मानने वाले अनुयायियों की युवा पीढ़ी को आज सनातन हिंदू धर्म के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है। इसलिए हिंदुओं को भी शिक्षा के केंद्र स्थापित करने की अनुमति दी जानी चाहिए जहां पर सनातन हिंदू धर्म की शिक्षा दी जा सके। आज कई अन्य देशों में गीता, वेद, पुराण, उपनिषद एवं योग की शिक्षा सफलतापूर्वक दी जा रही है तो केवल भारत के हिंदू धर्म के अनुयायियों को ही क्यों रोका जा रहा है।

पुरातन भारत में तो लाखों की संख्या में गुरूकुल थे, जहां सनातन हिंदू धर्म की शिक्षा दीक्षा दी जाती थी। देश की स्वतंत्रता के समय भी भारत में कुछ गुरूकुल बचे थे परंतु उन्हें भी बंद कर दिया गया है। (उक्त लेख, दिनांक 02.09.22 को आपका अखबार के प्रसारित एपिसोड पर आधारित है।)

लेखक वरिष्ठ समाजसेवी हैं.

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