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दो घड़ी बैठा करो बुजुर्गों के पास भी !

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 डॉ० घनश्याम बादल

सन 2006 से 15 जून को हर साल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता’ दिवस मनाया जाता है। इसका मूल उद्देश्य  बुजुर्गों के प्रति बढ़ रहे दुर्व्यवहार के प्रति लोगों में जागरुकता पैदा करना है जिससे वरिष्ठ नागरिकों के साथ किए जाने वाले दुर्व्यवहार में कमी हो सके।

दुनिया भर में हालत :

बुजुर्गों के लिए काम करने वाली संस्था ‘एजवेल रिसर्च एंड एडवोकेसी सेंटर’ के अनुसार 52.4 प्रतिशत वृद्धजनों का उत्पीड़न होता है और उनके साथ गाली गलौच तथा अभद्रता की जाती है। जिन बुजुगों को सर्वेक्षण में शामिल किया गया है उनमें 56 प्रतिशत 60 से 70 के बीच की उम्र के हैं जबकि 30.2 प्रतिशत 71 से 80 तथा 13.7 फीसदी 81 से ज्यादा उम्र के हैं।

भारत में बुजुर्गों का सम्मान :

जहां तक भारत का प्रश्न है  हमारी बुजुर्गों का सम्मान करने की पुरातन संस्कृति है। लेकिन पिछले कुछ दशकों से इस संस्कृति में भी भारी बदलाव देखने को मिल रहा है । एक समय था जब पश्चिमी देशों में बच्चों के लिए क्रेच और बुजुर्गों के लिए ‘ओल्ड होम्स’ बढ़ते जा रहे थे लेकिन हमारे देश में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी और इस व्यवस्था की जरूरत इसलिए भी नहीं थी क्योंकि भारतीय माता पिता अपने बच्चों से स्नेह और अपने बुजुर्गों का सम्मान करते थे।

बच्चों ने ठुकराया :

अगर आज देशभर में हजारों की संख्या में वृद्ध आश्रम खुल गए हैं ,इनमें काफी बड़ी संख्या में बुजुर्ग रह भी रहे हैं।  स्पष्ट सी बात है कि यें वें बुजुर्ग हैं जिन्हें या तो अपना घर और बच्चे रास नहीं आए या फिर उनके बच्चों ने उन्हें ठुकरा दिया अथवा वें इन बुजुर्गों को अपने  जीवन में बाधा मानने लगे थे ।

एकल परिवार प्रथा :

इसमें दो राय नहीं है कि हम संयुक्त परिवार प्रथा से एकल परिवार प्रथा में आ गए हैं । महानगरीय संस्कृति में तो अब संयुक्त परिवार बहुत ही कम देखने को मिलते हैं। आज के अर्थ प्रधान युग में परिवार के समस्त सदस्य कमाने के लिए नौकरी या दूसरे उद्यमों में इस तरह लग गए हैं कि उनके लिए बुजुर्गों की देखभाल करना एक मुश्किल काम हो गया है जिसके चलते हुए वृद्ध लोगों को वृद्ध आश्रम में भेजने की प्रवृत्ति में भारी वृद्धि हुई मगर असली बात तो यह है कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में आते -आते विचार,चिंतन, खान-पान रहन-सहन के तौर तरीके सब बदल जाते हैं और बुजुर्ग घर के बच्चों एवं युवाओं को इन मुद्दों पर टोकते रहते हैं और उनकी यह टोका – टोकी आज के युवा दंपत्ति और उनके बच्चे बहुत कम ही सहन कर पाते हैं जिसके परिणाम स्वरूप या तो बुजुर्गों की अनदेखी शुरू हो जाती है अथवा उन्हें पुरातन पंथी कहकर हाशिए पर डाल दिया जाता है ।  बस, यही से बुजुर्गों से दुर्व्यवहार एवं उनकी उपेक्षा का एक अंतहीन सिलसिले के रूप में शुरू हो जाता है।

पारिवारिक स्तर पर  दुर्व्यवहार :

यदि आंकड़ों पर निगाह डालें तो आज 80 बरस से ज्यादा उम्र के लगभग 70% बुजुर्गों के साथ पारिवारिक स्तर पर  दुर्व्यवहार किया जाता है। जबकि 60 से 70 वर्ष के बुजुर्गों में भी यह दुर्व्यवहार का प्रतिशत लगभग 35 से 40% है जो बहुत ही दुखद है।

कैसेकैसे दुर्व्यवहार :

यदि बुजुर्गों से दुर्व्यवहार का विश्लेषण किया जाए तो यह दुर्व्यवहार वाचिक यानी बोलकर, मानसिक ,शारीरिक एवं भावनात्मक तथा आर्थिक स्तर पर किया जाता है । बुजुर्गों से ऊंची आवाज में बात करना, उन्हें फटकारना, उनकी बातों का मजाक उड़ाना, बात-  बात में उनकी कमियां निकालना,  उन पर तानाकसी करना, उनकी शारीरिक अक्षमता का फायदा उठाकर  मारपीट करना ,उनके जमा किए हुए पैसों या पूंजी का उनकी अनुमति के बगैर ही अपनी इच्छा से उपयोग करना, उन्हें पेंशन व फंड आदि देने के लिए विवश करना, उन्हें यह अहसास कराना कि वें किसी काम के नहीं रहे हैं जैसी अनेक बातें शामिल हैं । यदि हम अपने आसपास निगाह डालें इस प्रकार की घटनाएं आमतौर पर होते हुए देख सकते हैं ।

मेहमानों के सामने भी अपमान:

प्राय:  देखने में आता है कि जिस मकान को बुजुर्ग अपनी जीवन भर की कमाई से बनाते हैं उसी मकान में उनके वृद्ध होने पर उनके रहने का कमरा शायद सबसे छोटा एवं ऐसा कमरा होता है जो बहुत सुविधाजनक नहीं होता।  यदि बहू बेटा किसी बड़े पद पर हो और उनके माता-पिता या दादा -दादी ऐसे पदों पर न रहे हों तो प्राय: घर में आने वाले ऊंचे ओहदे एवं रसूख वाले लोगों से उन्हें मिलने भी नहीं दिया जाता है । यदि वें  स्वयं मिलने या बात करने आ भी जाते हैं तो कई बार तो मेहमानों के सामने ही अन्यथा उनके जाते ही इन बुजुर्गों का अपमान शुरू हो जाता है जो कई बार तो कई कई दिनों या हफ्तों तक चलता  है और यह उनका मनोबल तोड़ देता है।

अभद्रता से बातचीत :

अब चूंकि बुजुर्ग शारीरिक व मानसिक रूप से इतने सबल नहीं रह जाते हैं जितने में युवावस्था में थे । तो न केवल परिवार अपितु बाहर भी उनके साथ दुर्व्यवहार करना आम बात है । उदाहरण के लिए बस या रेलवे के टिकट लेने में, टेलीफोन, बिजली व पानी आदि के बिल जमा करवाने में ,बाजार से फल , सब्जी आदि खरीदते समय उनके साथ धोखाधड़ी एवं अभद्र तरीके से बातचीत करना उन पर अभद्र कमेंट करना बहुत आम हो गया है।

बुजुर्ग भी उत्तरदायी:

ऐसा नहीं कि पारिवारिक स्तर पर दुर्व्यवहार के पीछे केवल युवा पीढ़ी ही जिम्मेदार हो । कई बार कुछ होते हैं । उनके स्वभाव में एक चिड़चिड़ापन, हठधर्मिता, केवल अपनी ही बात मनवाने की ज़िद, हर नई बात पर आपत्ति करना नई पीढ़ी को उकसा  देता है । कुछ बुजुर्ग शारीरिक रूप से स्वस्थ होते हुए भी अपना सारा काम बच्चों से ही करवाना चाहते हैं जो उनके लिए संभव नहीं होता और फिर परिणाम उपेक्षा व अनदेखी वाले दुर्व्यवहार के रूप में  सामने आता है । कुछ बुजुर्ग बच्चों से तो यह अपेक्षा करते हैं कि वें उन्हें अपनी सारी बातें बताएं लेकिन अपनी चीजें या बातें वे बिल्कुल शेयर नहीं करते इससे भी विवाद पैदा होते हैं।

बदलें युवा, सीखें बुजुर्ग:

यदि बुजुर्गों से दुर्व्यवहार की प्रवृत्ति को रोकना है तो युवाओं एवं बुजुर्गों दोनों को ही इस बारे में आगे आना होगा । जहां युवाओं को बुजुर्गों का सम्मान करना चाहिए, उनके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, उनसे शिष्टता से बात करनी चाहिए एवं उनके सलाह मशवरा का सम्मान करना चाहिए । वहीं युवाओं की भावनाओं एवं उनके जोश तथा ऊर्जा को बुजुर्गों को भी स्वीकार करना चाहिए । हर काम के लिए दूसरों पर निर्भर रहने की प्रवृत्ति को त्याग कर बुजुर्ग जितना आत्मनिर्भर बनेंगे उतना ही उनका आत्मसम्मान एवं आत्मविश्वास भी बना रहेगा ।  समय के साथ यदि बुजुर्ग नई तकनीकी सीख लें बच्चों से टोका – टोकी कम से कम करें, अपने स्वास्थ्य का यथासंभव खुद ध्यान रखें तो कोई वजह नहीं कि बुजुर्गों से दुर्व्यवहार की आधी से ज्यादा समस्या तो स्वयं ही हल हो जाएगी।

लेखक सामाजिक सरोकारों के मोटिवेशनल चिंतक हैं.

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