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भारत : 1857 से 1957 (इतिहास पर एक दृष्टि)

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कांग्रेस स्थापना और उसके प्रारंभिक कुछ वर्ष

…जब 1857 का स्वतंत्रता संग्राम हुआ तो 17 जून 1857 को ह्यूम को साड़ी पहनकर इटावा से भागना पड़ा।… वो 1858 में इटावा वापस आया। उसने आते ही सबसे पहले 131 क्रांतिकारियों को फांसी देने का काम किया।…27 दिसंबर 1885 को…28 अंग्रेजों की उपस्थिति में इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना हुई।… कांग्रेस की स्थापना के समय उसका सदस्य बनने के लिए जो शर्ते थीं… ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति निष्ठा, ब्रिटिश महारानी और उनके साम्राज्य की दीर्घायु के लिए कामना करना…

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कांग्रेस में बना नरम और गरम दल

…कांग्रेस में पहली बार स्वदेशी की बात बिपिन चन्द्र पाल ने रखी थी।… बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय के साथ मिलकर उन्होंने इसे साकार करने का काम तेज किया था।…

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सर सैयद अहमद खान ने 1886 में शुरू कर दी थी मुस्लिमों के लिए अलग संगठन की तैयारी

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में सभी देशभक्त अंग्रेजों का विरोध कर रहे थे, तो कई ऐसे लोग भी थे, जो अंग्रेजों को बचाने के लिए हर संभव प्रयास में लगे थे। इन्हीं में से एक थे सर सैयद अहमद खान।… जब उन्हें बनारस का जज बनाया गया था, उसी समय कई जगह उर्दू के स्थान पर हिन्दी के प्रयोग को प्राथमिकता देने की मांग जोर पकड़ने लगी…

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बंग भंग आंदोलन और ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना

… ऐसा प्रचारित किया जाता है कि बंग भंग का विरोध कांग्रेस और हिन्दू-मुस्लिम एकता के कारण असफल हुआ।… मुस्लिम लीग के कारण मुसलमानों का एक बड़ा गुट तो विभाजन चाहता ही था।…1901 आते-आते सर सैयद अहमद खान समर्थकों का वास्तविक एजेंडा सामने आने लगा… शिक्षण संस्थाओं के नाम पर वो अपने समर्थकों और चंदे के नाम पर रूप ये की व्यवस्था पहले ही कर चुके थे।… ईसाईयों के धर्म प्रचारक लगातार भारत आकर यहीं अपना स्थायी निवास बना रहे थे। इसके बाद भी सैयद समर्थकों को सिर्फ हिन्दुओं से ही खतरा लगता था।

…1907 में कांग्रेस का अधिवेशन नागपुर में होना था, लेकिन गरम दल के लोगों के विरोध की संभावना के कारण इसका स्थान बदलकर सूरत कर दिया गया।… इस सभा में किसी प्रतिनिधि ने जूता फेका जो सुरेंद्रनाथ बनर्जी को छूता हुआ फिरोज शाह मेहता को लगा।… इस अधिवेशन में कुर्सियां फेकी गईं और डंडे चले।…

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कांग्रेस में गांधी युग की शुरुआत

…1888 में गांधी जी बैरिस्टर की पढ़ाई करने के लिए लंदन पहुंचे… वहां की जीवनशैली और अंग्रेजों से इतने अधिक प्रभावित हो गए कि उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति की चिंता न करते हुए अंग्रेजों की तरह ही वेशभूषा और रहन-सहन शुरू कर दिया।… अंग्रेजों के लिए सिरदर्द बने चंपारण के सशस्त्र आंदोलन को गांधीजी ने अपनी वाकपटुता के सहारे समाप्त कर दिया।…

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प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय

… गांधीजी और कांग्रेस ने प्रथम विश्व युद्ध में मारे गए हजारों भारतीयों के परिवारों को यह कहकर दिलासा जरुर दिया कि सभी भारतीय सैनिक अपनी इच्छा से युद्ध में शामिल हुए हैं, उन्हें अंग्रेजों ने युद्ध में जाने के लिए मजबूर नहीं किया था।…

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कांग्रेस में गांधीजी का बढ़ता प्रभाव

…जब अब्दुल राशिद नाम के एक आतंकी ने अपनी दूषित मानसिकता के कारण स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और हिन्दू धर्म गुरु स्वामी श्रद्धानंद की हत्या कर दी, तो गांधी जी ने इसे जायज बताते हुये अब्दुल राशिद को अपना भाई और निर्दोष बताया।… गांधी जी ने 1921 में अंग्रेजी वस्त्रों को त्यागकर धोती पहन ली।… गांधी जी ने पूर्ण स्वराज्य लाने के लिये एक वर्ष का समय मांगा था। इसके लिये धन संग्रह भी पूरे देश में किया गया।… इस चंदे का हिसाब न देना पड़े इसके लिये वस्त्रों का त्याग कर लोगों को धोखा देने का प्रयास किया गया।…

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सच कहने की हिम्मत रखने वाली एनी बेसेंट बनी कांग्रेस अध्यक्ष

… एनी बेसेंट के अनुसार, “ गांधीजी के आन्दोलन अराजकतावादी तथा घृणा पैदा करने वाले हैं। गांधीजी के दर्शन एवं नेतृत्व स्वतंत्रता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हैं। गांधीजी अस्पष्ट स्वराज देखने वाले और रहस्यवादी राजनीतिज्ञ हैं। गांधीजी के सच्चे हृदय से पश्चाताप, उपवास, तपस्या आदि पर मुझे विश्वास नहीं होता है, यह संदेह पैदा करते हैं। मैं भारत की जनता को चेतावनी देती हूं कि यदि गाँधीवादी प्रणाली को अपनाया गया, तो देश पुनः अराजकता के खड्ड में जा गिरेगा।”…

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द्वितीय गोलमेज सम्मेलन

…5 मार्च 1931 को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन से एक दिन पहले 4 मार्च को गांधी-इरविन समझौता हुआ था। इसके अनुसार हिंसा के आरोपियों (क्रांतिकारियों व उनके समर्थको) को छोड़कर अन्य सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा कर दिया जायेगा।… गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित करने के साथ ही अंग्रेजों को यह भी आश्वासन दिया कि वो ब्रिटिश सरकार का विरोध नहीं करेंगे। यह आश्चर्य की बात ही थी, क्योंकि इस समझौते के लगभग एक वर्ष पूर्व ही गांधीजी ने सभी भारतीयों को 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाने का आग्रह किया था।…

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भारत छोड़ो आंदोलन

… 9 अगस्त 1942 को यह आंदोलन शुरू किया जाना था। किन्तु इससे पूर्व ही गांधीजी सहित विभिन्न वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं को नजरबंद या गिरफ्तार कर लिया गया।… इसलिए यह आंदोलन शुरू होने से पहले ही समाप्त हो गया।… व्यक्तिगत स्तर पर विभिन्न लोगों ने पूरे देश में संघर्ष करने का प्रयास जरुर किया, लेकिन अधिकांश संघर्ष 1942 के अंत तक दबा दिए गए थे।… उन्होंने गांधीजी की नजरबंदी समाप्त कर दी।… गांधीजी पूरी तरह से भूल चुके थे कि उन्होंने अंग्रेजों भारत छोड़ो जैसा कोई नारा दिया भी था। करो या मरो जैसे वाक्य तो उनके स्वप्न में भी अब नहीं आते थे।…

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1946 का सैन्य विद्रोह

… 18 फरवरी 1946 में रायल इंडियन नेवी के सैनिकों ने अंग्रेजों के खराब व्यवहार के विरोध में हड़ताल कर दी। धीरे-धीरे यह विद्रोह कराची, कोलकाता, मद्रास और विशाखापत्तनम सहित अन्य स्थानों तक फैल गया। बाद में इसमें कोस्ट गार्ड, वायु सेना और थल सेना के जवान भी शामिल हो गए।… गांधीजी ने सैन्य विद्रोह के विरोध में वातावरण तैयार करने का प्रयास शुरू कर दिया। उन्होंने इस विद्रोह पर अपना मत प्रकट करते हुए कहा कि हिंसात्मक कार्रवाई के लिए हिन्दुओं-मुसलामानों का एक साथ आना एक अपवित्र बात है। यदि इन लोगों को कोई शिकायत है, तो वे चुपचाप अपनी नौकरी छोड़ दें।…

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गांधीजी की हत्या, आखिर कौन जिम्मेदार?

… स्वामी के अनुसार गांधीजी की मृत देह को देखकर ऐसा लग रहा था कि उन्हें 4 गोलियां लगी थीं, यदि गोडसे ने सिर्फ तीन गोलियां चलाई, तो चौथी गोली किसने मारी? … सिद्ध समाजसेवी एमजी वैद्य के अनुसार सरदार पटेल ने संघ प्रमुख गुरूजी को दो पत्र लिखे, पहला 11 सितंबर 1948 व दूसरा 26 नवंबर 1948 को। इन दोनों ही पत्रों में उन्होंने संघ को कांग्रेस के साथ मिलकर काम करने के लिए अनुरोध किया।… ऐसी संस्था जिस पर गांधीजी की हत्या का आरोप हो, सरदार पटेल उसे कांग्रेस में विलय या सहयोगी संगठन बनाने के लिए इतने प्रयासरत क्यों थे?…

… संभव है कि नेहरूजी की इच्छा का सम्मान करते हुए विवशता के कारण पटेल को संघ के साथ कड़ा व्यवहार करना पड़ा हो। क्योंकि वो संघ के द्वारा हिन्दुओं के संगठन व समाजसेवा के प्रशंसक थे, यह बात उन्होंने गांधीजी की हत्या से पहले दिसंबर 1947 में जयपुर तथा जनवरी 1948 में लखनऊ के अपने भाषणों में कही भी थी। …

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डॉ. आम्बेडकर के द्वारा संविधान निर्माण से लेकर उनकी मृत्यु तक

… डॉ. आम्बेडकर को इस बात का एहसास अपने जीवनकाल में ही हो गया था कि आरक्षण का प्रावधान करने से जातिगत भेदभाव से पीड़ित लोगों को कोई लाभ नहीं मिलेगा। इस पर सिर्फ राजनीति ही होगी।… 1952 में स्वतंत्र भारत का पहला आम चुनाव हुआ। डॉ. आम्बेडकर ने उत्तर मुंबई लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा। कांग्रेस ने उनके ही पूर्व सहयोगी एनएस कजोलकर को उतार दिया। डॉ. आम्बेडकर चुनाव हार गए। डॉ. आम्बेडकर ने 1954 में भंडारा लोकसभा का उपचुनाव लड़ा। यहां भी कांग्रेस ने उनके खिलाफ प्रत्याशी उतारकर उन्हें हरा दिया। …

… आरटीआई कार्यकर्ता आरएच बंसल ने आरटीआई के माध्यम से राष्ट्रपति सचिवालय से डॉ. आम्बेडकर की मृत्यु से सम्बंधित जानकारी मांगी थी। यह आवेदन राष्ट्रपति कार्यालय से होता हुआ गृह मंत्रालय और फिर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय भी गया, लेकिन किसी को भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। …

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