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अनुकंपा पर नियुक्ति कोई अधिकार नहीं है, इसका उपयोग केवल विशेष परिस्थितियों में ही होना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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नई दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि मृतक कर्मचारी का आश्रित अनुकंपा के आधार पर नौकरी के लिए हालांकि पात्र है, लेकिन इस आधार पर वह किसी भी पद पर नियुक्ति का हकदार नहीं है। न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने कहा कि ऐसी नियुक्ति, जो असाधारण परिस्थितियों में होती है, का उपयोग केवल इस आधार पर उच्च पद का दावा करके वरिष्ठता में ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ी के रूप में नहीं किया जा सकता है कि वह व्यक्ति ऐसे पद के लिए पात्र है।

अनुकंपा का इस्तेमाल उच्च पद पाने के लिए नहीं किया जा सकता

पीठ ने कहा, ‘‘यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मृतक कर्मचारी का आश्रित, भले ही पात्र हो, अनुकंपा के आधार पर किसी भी पद पर नियुक्ति का हकदार नहीं है। विशुद्ध मानवीय आधार पर की गई ऐसी नियुक्तियों को नियुक्ति के सामान्य नियमों का अपवाद माना जाना चाहिए।’’ इसने मद्रास उच्च न्यायालय के उन आदेशों को चुनौती देने वाली तमिलनाडु प्रशासन की दो अलग-अलग याचिकाओं पर फैसला सुनाया, जिनमें दो व्यक्तियों को, जो पहले सफाईकर्मी के रूप में कार्यरत थे, अनुकंपा के आधार पर कनिष्ठ सहायक के पद पर पदोन्नत करने का निर्देश दिया गया था।

उच्च पद पर नियुक्ति के उसके दावे को साकार करने के लिए पर्याप्त कारण नहीं हो सकती

पीठ ने कहा कि आवेदक की पात्रता मात्र ही उच्च पद पर नियुक्ति के उसके दावे को साकार करने के लिए पर्याप्त कारण नहीं हो सकती। इसने कहा, ‘‘मृतक कर्मचारी के परिवार के किसी सदस्य को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति की पेशकश किए जाने पर उद्देश्य पूर्ण हो जाता है। इसलिए, प्रतिवादियों का यह तर्क कि उन्हें उच्च पद पर नियुक्ति के लिए पुनर्विचार का अधिकार है, मान्य नहीं है।’’

पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए अहम टिप्पणी की

विचाराधीन मामले का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा कि प्रतिवादी मृतक कर्मचारियों के वारिस हैं, जिन्हें उनके पिताओं की मृत्यु के बाद अनुकंपा के आधार पर नियुक्त किया गया था। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए ने कहा, ‘‘उनकी नियुक्ति अपने आप में अनुकंपा नियुक्तियों के वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति के लिए पर्याप्त राहत थी। उच्च पद पर नियुक्ति की मांग का दावा केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि समान स्थिति वाले किसी अन्य व्यक्ति को ऐसा लाभ दिया गया था।’’

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इसने सक्षम प्राधिकार के उस निर्णय को बरकरार रखा जिसमें उन्हें निचले पद पर नियुक्त किए जाने के बाद उच्च पद पर नियुक्ति के उनके दावे को खारिज कर दिया गया था।

साभार : नवभारत टाइम्स

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।