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शरिया अदालत और फतवों की कानून में कोई जगह नहीं : सुप्रीम कोर्ट

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
4 Min Read

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर फैसला सुनाते हुए दोहराया कि काजी की अदालत, काजियात की अदालत व शरिया कोर्ट की कानून में कोई मान्यता नहीं है. उनके द्वारा दिया गया कोई भी निर्देश कानून में लागू नहीं होता है. ना ही उनका फैसला बाध्यकारी है. शीर्ष अदालत की तरफ से यह फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली एक महिला की अपील पर दिया गया है, जिसमें फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा गया था.

‘फतवों को कानूनी मान्यता नहीं’

जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने विश्व लोचन मदन बनाम भारत सरकार के मामले में 2014 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि काजी कोर्ट’, ‘(दारुल कजा) काजियात कोर्ट’, ‘शरिया कोर्ट’ इत्यादि किसी भी नाम से पुकारे जाने वाले न्यायालयों को कानून में कोई मान्यता नहीं है. शरीयत अदालतों और फतवों को कानूनी मान्यता नहीं है. जानकारी के मुताबिक, महिला का शादी 24 सितंबर 2002 को इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी. दोनों की यह दूसरी शादी थी. 2005 में,  ‘काजी की अदालत’3, भोपाल, मध्य प्रदेश में महिला के खिलाफ ‘तलाक का मुकदमा  दायर किया गया, जो दोनों पक्षों के बीच 22 नवंबर 2005 को हुए समझौते के आधार पर खारिज हो गया.

महिला के दावे को किया था खारिज

इसके बाद 2008 में पति ने (दारुल कजा) काजियात की अदालत में तलाक के लिए एक और मुकदमा दायर किया.  उसी साल पत्नी ने भरण-पोषण की मांग करते हुए धारा 125 सीआरपीसी के तहत फैमिली कोर्ट का रुख किया. जिस पर फैमिली कोर्ट ने महिला के भरण-पोषण के दावे को इस आधार पर खारिज कर दिया कि प्रतिवादी पति ने महिला को नहीं छोड़ा था, बल्कि वह खुद ही अपने स्वभाव और आचरण के कारण विवाद व वैवाहिक घर से चले जाने का मुख्य कारण थी. इसके बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, जिस पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. बाद में महिला ने शीर्ष अदालत का रुख किया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने 4 फरवरी को आदेश दिया. हालांकि, यह आदेश अब सामने आया है. शीर्ष अदालत ने कहा कि फैमिली कोर्ट के इस तर्क की भी आलोचना की कि चूंकि यह दोनों पक्षों की दूसरी शादी थी, इसलिए पति द्वारा दहेज की मांग की कोई संभावना नहीं थी.

फैमिली कोर्ट का तर्क अनुमान आधारित

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा दिया गया तर्क कानून के सिद्धांतों से अनजान है. यह केवल अनुमान  पर आधारित है. फैमिली कोर्ट यह नहीं मान सकता था कि दोनों पक्षों के लिए दूसरी शादी में दहेज की मांग अनिवार्य रूप से नहीं होगी. शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि समझौता डीड भी फैमिली कोर्ट द्वारा किए गए किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा सकती. पीठ ने व्यक्ति को फैमिली कोर्ट के समक्ष भरण-पोषण याचिका दायर करने की तारीख से 4 हजार रुपये प्रति महीने महिला को भरण पोषण के रूप में भुगतान करने का निर्देश दिया.

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साभार : एनडीटीवी

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।