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ईरान में बढ़ता जन आक्रोश: ‘मुल्लाओं को देश छोड़ना होगा’ के नारों से गूँजी तेहरान की सड़कें

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तेहरान. ईरान में इस्लामिक शासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों ने एक बार फिर उग्र रूप ले लिया है। देश के विभिन्न शहरों, विशेषकर राजधानी तेहरान में हज़ारों की संख्या में प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए हैं। इस बार के प्रदर्शनों में प्रदर्शनकारियों का गुस्सा सीधे तौर पर धार्मिक नेतृत्व (मजहबी सत्ता) के खिलाफ देखा जा रहा है।

मुख्य घटनाक्रम:

  • नारेबाजी: प्रदर्शनों के दौरान सबसे प्रमुख नारा “मुल्लाओं को देश छोड़ना होगा” (Mullahs must get lost) सुना गया। इसके अलावा, प्रदर्शनकारी “तानाशाह को मौत” और “महिला, जीवन, स्वतंत्रता” के नारे भी लगा रहे हैं।

  • व्यापक विस्तार: विरोध की यह लहर केवल तेहरान तक सीमित नहीं है; मशहद, इस्फहान और तबरीज़ जैसे बड़े शहरों में भी लोग सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के बावजूद सड़कों पर हैं।

  • प्रतीकात्मक विरोध: कई स्थानों पर युवाओं द्वारा मौलवियों की पगड़ी उछालने और सरकारी विज्ञापनों को जलाने की खबरें सामने आई हैं, जो शासन के प्रति गहरे असंतोष को दर्शाता है।

विरोध के मुख्य कारण:

  1. कठोर सामाजिक नियम: हिजाब कानून और नैतिकता पुलिस की सख्त कार्रवाई से युवाओं और महिलाओं में भारी आक्रोश है।

  2. आर्थिक बदहाली: लगातार बढ़ती मुद्रास्फीति, बेरोजगारी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण आम जनता का जीवन दूभर हो गया है।

  3. राजनीतिक दमन: मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि असहमति की आवाजों को दबाने और प्रदर्शनकारियों को दी जा रही सख्त सजाओं ने आग में घी डालने का काम किया है।

शासन की प्रतिक्रिया:

ईरानी अधिकारियों ने इन प्रदर्शनों को “विदेशी साजिश” करार दिया है। सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस और लाठीचार्ज का सहारा लिया है। कई क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाओं को भी बाधित कर दिया गया है ताकि प्रदर्शनकारी एकजुट न हो सकें।

विशेषज्ञों की राय: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘मुल्लाओं’ के खिलाफ सीधे नारे लगना इस बात का संकेत है कि अब विरोध केवल सुधारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर शासन परिवर्तन (Regime Change) की मांग में बदल चुका है।

मानवाधिकारों की वर्तमान स्थिति

ईरान में मानवाधिकारों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर (विशेषकर संयुक्त राष्ट्र और एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा) गंभीर चिंताएं जताई जाती रही हैं:

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक: शासन की आलोचना करने वाले पत्रकारों, लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को अक्सर जेल भेज दिया जाता है। सोशल मीडिया और इंटरनेट पर कड़ी निगरानी रखी जाती है।

  • महिलाओं के अधिकार: ‘नैतिकता पुलिस’ (Gasht-e Ershad) द्वारा हिजाब नियमों को सख्ती से लागू करना एक बड़ा मुद्दा रहा है। सितंबर 2022 में महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में मौत के बाद शुरू हुए “महिला, जीवन, स्वतंत्रता” आंदोलन ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा।

  • मृत्युदंड (Capital Punishment): ईरान दुनिया के उन देशों में शामिल है जहाँ मृत्युदंड की दर सबसे अधिक है। कई बार प्रदर्शनकारियों और राजनीतिक कैदियों को “ईश्वर के विरुद्ध युद्ध” (Moharebeh) जैसे आरोपों में फांसी दी जाती है।

  • अल्पसंख्यकों की स्थिति: बहाई समुदाय जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों और कुर्द या बलूच जैसे जातीय अल्पसंख्यकों को अक्सर भेदभाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।

वर्तमान संघर्ष का महत्व

मौजूदा प्रदर्शनों में ‘मुल्लाओं को देश छोड़ना होगा’ जैसे नारे यह दर्शाते हैं कि जनता अब केवल सुधार (Reform) नहीं, बल्कि 1979 में स्थापित धार्मिक व्यवस्था का पूरी तरह अंत चाहती है।

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यह भी पढ़ें : 1857 का स्वातंत्र्य समर : कारण से परिणाम तक

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