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कश्मीर में बड़ा बदलाव: 36 साल बाद कश्मीरी पंडितों को वापस मिली अपनी जमीन, प्रशासन ने जारी किए आंकड़े

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श्रीनगर का ऐतिहासिक रघुनाथ मंदिर जिसे 36 वर्षों के बाद पुनर्जीवित किया गया है।

जम्मू | बुधवार, 1 अप्रैल, 2026

कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास और उनकी खोई हुई पहचान को वापस दिलाने की दिशा में एक ऐतिहासिक प्रगति देखी जा रही है। 1990 के दशक में आतंकवाद के काले साये में अपना घर-बार छोड़ने को मजबूर हुए विस्थापितों के लिए अब ‘न्याय’ की जमीन तैयार हो रही है। जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने आधिकारिक रूप से पुष्टि की है कि घाटी के 10 जिलों में अब तक 3,729 कनाल और 4 मरला (लगभग 188.75 हेक्टेयर) जमीन को भू-माफियाओं और अवैध कब्जों से मुक्त कराकर उनके मूल मालिकों को सौंप दिया गया है।

विधानसभा में गूंजा जमीन वापसी का मुद्दा

हाल ही में (मार्च 2026) जम्मू-कश्मीर विधानसभा के बजट सत्र के दौरान मुख्यमंत्री ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि “प्रवासी अचल संपत्ति अधिनियम, 1997” के तहत यह कार्रवाई तेज कर दी गई है। आंकड़ों के अनुसार, अकेले नवंबर 2024 से अब तक 844 कनाल जमीन बहाल की गई है। सबसे अधिक भूमि वापसी शोपियां (283 कनाल), बारामूला (225 कनाल) और गांदरबल (146 कनाल) में हुई है।

तकनीक से मिली ताकत: ऑनलाइन शिकायत पोर्टल

प्रशासन ने बताया कि भूमि संबंधी विवादों के निपटारे के लिए शुरू किए गए ऑनलाइन पोर्टल पर अब तक 10,173 आवेदन प्राप्त हुए। इनमें से 9,713 मामलों का निपटारा किया जा चुका है, जो प्रशासनिक सक्रियता का प्रमाण है। इसके लिए जिलाधिकारियों (DM) को प्रवासी संपत्तियों का ‘कस्टोडियन’ बनाया गया है।

“यह केवल जमीन की वापसी नहीं, बल्कि उस विश्वास की वापसी है जो तीन दशक पहले टूट गया था। हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि हर कब्जा हटाई गई इंच जमीन उसके सही वारिस को मिले।”प्रशासनिक अधिकारी, राजस्व विभाग

खंडहरों से निकलती आस्था: मंदिरों का कायाकल्प

जमीन के साथ-साथ आस्था के केंद्रों को भी पुनर्जीवित किया जा रहा है। 36 साल के लंबे अंतराल के बाद श्रीनगर का ऐतिहासिक रघुनाथ मंदिर खुलना एक मील का पत्थर साबित हुआ है। इसके अतिरिक्त:

  • 300 से अधिक मंदिरों का जीर्णोद्धार किया जा चुका है।

  • प्रतापस्वामी मंदिर (बारामूला) और अवंतीश्वर मंदिर (पुलवामा) जैसे प्राचीन स्थलों पर संरक्षण कार्य 2026 के वित्तीय वर्ष में तेजी से पूरे किए जा रहे हैं।

  • हाल ही में ‘नवरेह’ (कश्मीरी नव वर्ष) के अवसर पर विस्थापित समुदाय ने घाटी में आकर सामूहिक पूजा-अर्चना की, जो सामाजिक सद्भाव की नई तस्वीर पेश करती है।

पुनर्वास की दिशा में नए कानून की तैयारी

घाटी में कश्मीरी पंडितों की स्थायी वापसी के लिए राजनीतिक स्तर पर भी हलचल तेज है। मार्च 2026 में विधानसभा में ‘कश्मीरी पंडित एवं प्रवासी पुनर्गठन विधेयक 2026’ जैसा निजी विधेयक पेश किया गया है, जिसका उद्देश्य एक स्थायी ‘पुनर्गठन आयोग’ बनाना है। यह आयोग न केवल जमीन, बल्कि सुरक्षा, रोजगार और सामाजिक मेल-मिलाप पर भी काम करेगा।

चुनौतियां अभी भी बरकरार

सकारात्मक कदमों के बावजूद, कश्मीरी पंडित समुदायों का कहना है कि अभी भी हजारों कनाल जमीन पर बड़े व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स और अस्पताल बने हुए हैं। बीजेपी और अन्य संगठनों की मांग है कि सरकार उन लाभार्थियों की सूची सार्वजनिक करे जिन्हें जमीन मिली है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

मुख्य बिंदु:

  • भूमि बहाली: 3,729 कनाल से अधिक भूमि अतिक्रमण मुक्त कराकर असली मालिकों को सौंपी गई।

  • ऑनलाइन समाधान: 10,000 से अधिक शिकायतों में से 95% का निपटारा, पोर्टल से मिली गति।

  • धार्मिक पुनरुद्धार: अनुच्छेद 370 हटने के बाद 300+ मंदिरों का कायाकल्प; रघुनाथ मंदिर के बाद अब अन्य प्राचीन स्थलों की बारी।

  • प्रशासनिक सक्रियता: मार्च 2026 के विधानसभा सत्र में मुख्यमंत्री ने भूमि वापसी की पुष्टि की।

निष्कर्ष:

36 साल बाद कश्मीर की हवाओं में बदलाव महसूस हो रहा है। जमीन की कानूनी लड़ाई जीतना एक हिस्सा है, लेकिन ‘घर वापसी’ को पूर्ण बनाने के लिए सुरक्षा और विश्वास की बहाली ही सबसे अंतिम और निर्णायक कदम होगा।

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