बेरुत | बुधवार, 1 अप्रैल 2026
संयुक्त राष्ट्र के पूर्व अधिकारी और चर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता मोहम्मद सफा एक बार फिर अपने बयानों के कारण वैश्विक चर्चा के केंद्र में हैं। ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ (Axis of Resistance) के प्रति अपनी सहानुभूति को खुलकर जाहिर करते हुए सफा ने स्पष्ट किया था कि वह हमास, हिजबुल्ला और हुती जैसे समूहों को आतंकवादी संगठन नहीं, बल्कि विदेशी कब्जे के खिलाफ लड़ने वाले ‘मुक्ति योद्धा’ मानते हैं।
7 अक्टूबर की घटना: “यह हमला नहीं, दशकों के उत्पीड़न का नतीजा है”
7 अक्टूबर के हमलों पर दुनिया भर में हुई निंदा के विपरीत, मोहम्मद सफा का रुख बेहद अलग रहा है। उन्होंने सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तर्क दिया कि इन घटनाओं को ‘ऐतिहासिक संदर्भ’ (Context) में देखा जाना चाहिए।
सफा के अनुसार, “हमास की कार्रवाई दशकों से जारी गाजा की घेराबंदी और फिलिस्तीनियों पर हो रहे अत्याचारों का परिणाम है।” उन्होंने इन लड़ाकों की तुलना उन क्रांतिकारियों से की जिन्होंने इतिहास में उपनिवेशवाद (Colonialism) के खिलाफ हथियार उठाए थे।
संबंधित खबर: मध्य-पूर्व संकट: गाजा और लेबनान में जारी संघर्ष की ताजा स्थिति
हिजबुल्ला और हुती का बचाव
मूल रूप से दक्षिण लेबनान से ताल्लुक रखने वाले सफा का झुकाव हिजबुल्ला की ओर स्वाभाविक माना जाता रहा है। उन्होंने हिजबुल्ला को लेबनान की संप्रभुता का एकमात्र रक्षक बताया है।
यही नहीं, यमन के हुती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में इजरायली जहाजों को निशाना बनाए जाने पर सफा ने उन्हें ‘साहसी’ करार दिया। उन्होंने कहा कि जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय गाजा में “नरसंहार” को रोकने में विफल रहा, तब हुती समूह ने जमीनी स्तर पर कार्रवाई करके साहस दिखाया।
विवादों के बीच मार्च 2026 में इस्तीफा
मोहम्मद सफा के इन विचारों ने संयुक्त राष्ट्र के भीतर एक बड़ा कूटनीतिक संकट पैदा कर दिया था। उन पर आरोप लगे कि वह मानवीय अधिकारों की आड़ में ईरान समर्थित समूहों के एजेंडे को बढ़ावा दे रहे हैं। अंततः, मार्च 2026 में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
इस्तीफे के बाद उन्होंने कहा:
“संयुक्त राष्ट्र लेबनान और ईरान पर होने वाले हमलों को रोकने और अंतरराष्ट्रीय कानून को समान रूप से लागू करने में पूरी तरह विफल रहा है। मैं ऐसी व्यवस्था का हिस्सा नहीं बना रह सकता जो कब्जे को मौन सहमति देती हो।”
क्या कहते हैं आलोचक?
सफा के आलोचकों का तर्क है कि एक अंतरराष्ट्रीय राजनयिक का सशस्त्र समूहों की हिंसा को ‘न्यायोचित’ ठहराना खतरनाक मिसाल पेश करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सफा के इस रुख ने वैश्विक मंचों पर ‘आतंकवाद’ और ‘प्रतिरोध’ के बीच की बहस को और अधिक ध्रुवीकृत कर दिया है।
मुख्य बिंदु:
-
मोहम्मद सफा ने हमास और हिजबुल्ला की सैन्य कार्रवाई को ‘वैध प्रतिरोध’ करार दिया।
-
संयुक्त राष्ट्र (UN) की भूमिका पर सवाल उठाते हुए मार्च 2026 में दिया था इस्तीफा।
-
लाल सागर में हुती विद्रोहियों के हमलों को गाजा के समर्थन में ‘साहसी कदम’ बताया।
अस्वीकरण: यह समाचार विश्लेषण मोहम्मद सफा द्वारा व्यक्त किए गए सार्वजनिक विचारों और उनके करियर के घटनाक्रमों पर आधारित है।
Matribhumisamachar


