प्रयागराज।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक महकमे को स्पष्ट संदेश देते हुए न्यायिक आदेशों की अनदेखी पर कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल की एकलपीठ ने मऊ जिले के एक मदरसे को सरकारी वित्तीय सहायता (Grant-in-Aid) सूची में शामिल करने के पिछले अदालती आदेश का पालन न होने पर उत्तर प्रदेश सरकार के संबंधित प्रमुख/अपर मुख्य सचिव को सख्त चेतावनी दी है।
अदालत ने अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित 30 दिनों की अवधि में आदेश का पालन कर अनुपालन हलफनामा दाखिल नहीं किया गया, तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ अवमानना के आरोप (Framing of Charges) तय करने के लिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष पेश होना पड़ेगा।
मामले की पृष्ठभूमि और अदालती घटनाक्रम (Mau Madrasa Case)
यह प्रकरण मऊ जिले के ‘मदरसा इस्लामिया सफिनातुल हिदाया‘ से जुड़ा है।
- प्रारंभिक निर्देश: हाईकोर्ट ने 25 नवंबर 2020 को ही राज्य सरकार की नीतिगत पात्रता (27 फरवरी 2013 एवं 21 मई 2013 के शासनादेशों) के तहत इस मदरसे को 1 अप्रैल 2021 से Grant-in-Aid की सूची में शामिल करने का ‘Mandamus’ (परमादेश) जारी किया था।
- सुप्रीम कोर्ट से याचिका खारिज: राज्य सरकार ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की थी, जिसे 22 नवंबर 2021 को शीर्ष अदालत ने खारिज कर दिया।
- अवमानना याचिका (Contempt Petition): सुप्रीम कोर्ट से अपील खारिज होने के बावजूद जब मदरसे को अनुदान सूची में शामिल नहीं किया गया, तब प्रबंधक समिति ने हाईकोर्ट में अवमानना याचिका (Contempt Application No. 2725/2021) दायर की।
हाईकोर्ट की सख्त चेतावनी और समयसीमा
अदालत के समक्ष सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) ने अपनी दलीलें रखीं। हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- 30 दिनों की मोहलत: शासन को आदेश के पूर्ण अनुपालन के लिए 1 महीने की समयसीमा दी गई है।व्यक्तिगत पेशी का आदेश: यदि 16 नवंबर 2026 तक अनुपालन हलफनामा (Compliance Affidavit) दाखिल नहीं होता है, तो संबंधित सचिव को अवमानना के आरोप तय करने के लिए अदालत में उपस्थित रहना होगा।
क्या है Grant-in-Aid और इसका महत्व?
Grant-in-Aid (अनुदान सहायता) राज्य सरकार द्वारा स्वीकृत शैक्षणिक संस्थानों को दी जाने वाली वित्तीय मदद है।
- आर्थिक सहायता: इस सूची में शामिल होने के बाद संस्थान के शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन तथा रखरखाव का खर्च सरकारी खजाने (Exchequer) से प्राप्त होता है।
- पात्रता की शर्तें: किसी संस्थान का अनुदान सूची में आना राज्य सरकार के प्रशासनिक नियमों, मानकों और इंफ्रास्ट्रक्चर की जांच के अधीन होता है।
निष्कर्ष: प्रशासनिक जवाबदेही और न्यायिक बाध्यता
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह रुख दर्शाता है कि प्रशासनिक स्तर पर किसी भी कारण से न्यायिक आदेशों के अनुपालन में देरी को स्वीकार नहीं किया जा सकता। अब 16 नवंबर 2026 को होने वाली अगली सुनवाई में यह तय होगा कि संबंधित विभाग कोर्ट के निर्देशों के तहत क्या कार्रवाई करता है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
Q1. हाईकोर्ट ने किस मदरसे के मामले में अवमानना की चेतावनी दी है?
उत्तर: उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के ‘मदरसा इस्लामिया सफिनातुल हिदाया’ के मामले में यह चेतावनी जारी की गई है।
Q2. अदालत ने सरकार को कितना समय दिया है?
उत्तर: हाईकोर्ट ने संबंधित सरकारी सचिव को आदेश का पालन करने के लिए 1 महीने (16 नवंबर 2026 तक) का समय दिया है।
Q3. आदेश का पालन न करने पर अधिकारी पर क्या कानूनी असर होगा?
उत्तर: यदि निर्धारित समय में अनुपालन हलफनामा दाखिल नहीं किया जाता है, तो संबंधित सचिव के खिलाफ न्यायालय की अवमानना अधिनियम के तहत आरोप (Charges) तय किए जाएंगे।
Disclaimer (अस्वीकरण)
यह लेख केवल सूचनात्मक एवं शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है। इसमें दी गई कानूनी जानकारी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के सार्वजनिक अदालती आदेशों व समाचार रिपोर्टों पर आधारित है। किसी भी कानूनी सलाह के लिए संबंधित विशेषज्ञों या आधिकारिक पोर्टलों से परामर्श लें।
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