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अमेरिका में जॉब मार्केट 2026: जून में सिर्फ 57 हजार नई नौकरियां; जानिए बेरोजगारी दर घटने के पीछे का असली सच

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वाशिंगटन । शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

अमेरिकी अर्थव्यवस्था और रोजगार के मोर्चे पर एक बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। अमेरिका में जॉब मार्केट 2026 (US Job Market 2026) की रफ्तार लगातार धीमी पड़ती दिख रही है। अमेरिकी लेबर डिपार्टमेंट (US Department of Labor) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, जून 2026 में देश में केवल 57,000 नई नौकरियां जुड़ी हैं। यह आंकड़ा न केवल बाजार और आर्थिक जानकारों की उम्मीदों से काफी कम है, बल्कि पिछले महीने यानी मई की तुलना में आधे से भी कम है।

इस गिरावट से साफ संकेत मिलता है कि अमेरिकी कंपनियां आने वाले समय और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं को लेकर बेहद सतर्क रुख अपना रही हैं।

बेरोजगारी दर 4.2% होने का हैरान करने वाला सच

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जून में अमेरिका की बेरोजगारी दर 4.3 प्रतिशत से घटकर 4.2 प्रतिशत पर आ गई है। पहली नजर में यह एक सकारात्मक और राहत देने वाला संकेत लग सकता है, लेकिन अर्थशास्त्रियों ने इसके पीछे की एक बेहद चिंताजनक वजह का खुलासा किया है।

दरअसल, जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक नौकरी की तलाश करने के बाद थक हारकर प्रयास करना बंद कर देता है, तो उसे ‘आधिकारिक बेरोजगारों’ की गिनती में शामिल नहीं किया जाता है। जून के महीने में अमेरिकी लेबर मार्केट में बड़ी संख्या में ऐसे लोगों ने नई नौकरी की तलाश ही छोड़ दी है, जिसके कारण बेरोजगारी दर में यह तकनीकी गिरावट दिखाई दे रही है, न कि नई नौकरियों के पैदा होने से।

5 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंची लेबर पार्टिसिपेशन रेट

इस मंदी का सबसे बड़ा असर लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट (Labor Force Participation Rate) पर देखने को मिला है। काम कर रहे या सक्रिय रूप से नौकरी तलाश रहे लोगों का अनुपात घटकर अब महज 61.5 प्रतिशत रह गया है, जो पिछले पांच वर्षों का सबसे निचला स्तर है।

इतना ही नहीं, सबसे उत्पादक कार्यबल माने जाने वाले 25 से 54 साल के कर्मचारियों की पार्टिसिपेशन रेट भी घटकर 83.3 प्रतिशत पर पहुंच गई है। यह स्पष्ट करता है कि अमेरिकी लेबर मार्केट में सक्रिय कार्यबल की संख्या लगातार सिकुड़ रही है।

डोनाल्ड ट्रंप की ट्रेड और टैरिफ पॉलिसियों का असर

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय से बनी हुई ऊंची महंगाई और नीतिगत फैसलों का असर अब नौकरी के बाजार पर साफ दिखने लगा है। खास तौर पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक ट्रेड और टैरिफ पॉलिसियों ने अमेरिकी बिजनेस जगत की मुश्किलें और चिंताएं बढ़ा दी हैं।

  • लागत में वृद्धि: इंपोर्ट (आयात) पर बढ़ते भारी शुल्क और वैश्विक स्तर पर चल रहे ट्रेड तनाव के कारण कंपनियों की मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स लागत काफी बढ़ गई है।

  • हायरिंग पर रोक: भविष्य की मांग और आर्थिक नीतियों को लेकर अनिश्चितता होने के कारण कंपनियां नए निवेश और बड़े स्तर पर नई भर्तियों (New Hiring) से पूरी तरह बच रही हैं। इसी वजह से अब विपक्षी दल भी ट्रंप प्रशासन की आर्थिक रणनीति पर लगातार सवाल उठा रहे हैं।

सेक्टर्स का हाल: निर्माण में थोड़ी राहत, पर टेक में भारी छंटनी

अगर अलग-अलग सेक्टर्स की बात करें तो जॉब मार्केट में एक बड़ा असंतुलन देखने को मिल रहा है:

  1. कंस्ट्रक्शन और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर: वैश्विक स्तर पर डेटा सेंटर्स के निर्माण और सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के विस्तार के चलते इस सेक्टर में कुछ नई नौकरियों के मौके जरूर बने हैं।

  2. टेक और इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी सेक्टर: दूसरी तरफ, बड़ी टेक कंपनियों में छंटनी (Layoffs) का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। मेटा (Meta), माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) और कई अन्य दिग्गज टेक कंपनियां इस समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश कर रही हैं। इन भारी-भरकम निवेशों के खर्च को संतुलित करने के लिए कंपनियां अपने मौजूदा कर्मचारियों की संख्या में कटौती कर रही हैं। सूचना और टेक्नोलॉजी सेक्टर में पिछले 18 महीनों में यह 17वीं बार रोजगार में गिरावट दर्ज की गई है।

फेडरल रिजर्व के सामने नई चुनौतियां

रोजगार के इन कमजोर और निराशाजनक आंकड़ों ने अब अमेरिकी सेंट्रल बैंक फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) के सामने एक गंभीर धर्मसंकट खड़ा कर दिया है। यदि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की गति इसी तरह धीमी पड़ती रही, तो बाजार को मंदी से बचाने के लिए फेड पर ब्याज दरों में कटौती करने का दबाव काफी बढ़ जाएगा। हालांकि, सालाना आधार पर सैलरी में 3.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि केवल वेतन वृद्धि से जॉब मार्केट की इस गहरी बुनियादी कमजोरी और मंदी के संकेतों को छिपाया नहीं जा सकता।

ग्लोबल स्तर पर बदलते इस आर्थिक परिदृश्य का असर न केवल अमेरिका बल्कि भारत जैसे विकासशील देशों के बाजारों और आईटी कंपनियों पर भी पड़ना तय माना जा रहा है।

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