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यूपी में 2 साल में 1 लाख लोग गायब! हाईकोर्ट की पुलिस को फटकार- “क्या कर रहे हैं अधिकारी?

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लखनऊ. उत्तर प्रदेश में लापता लोगों की लगातार बढ़ती संख्या ने न केवल आम जनता बल्कि न्यायपालिका को भी गहरी चिंता में डाल दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राज्य में पिछले दो वर्षों में 1 लाख से अधिक लोगों के लापता होने के मामले को बेहद गंभीर मानते हुए इस पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिया है और इसे औपचारिक रूप से जनहित याचिका (PIL) के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया है।

कोर्ट का मानना है कि यह मुद्दा किसी एक परिवार या व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे राज्य की कानून-व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा और पुलिस की जवाबदेही से जुड़ा एक बड़ा सवाल है।

📌 कैसे सामने आया यह मामला?

यह प्रकरण उस समय उजागर हुआ जब लखनऊ के चिनहट क्षेत्र निवासी विक्रमा प्रसाद की याचिका पर सुनवाई हो रही थी। याची ने अदालत को बताया कि उसका बेटा जुलाई 2024 में अचानक लापता हो गया था। महीनों बीत जाने के बावजूद पुलिस उसे ढूंढने में पूरी तरह विफल रही।

इस याचिका की सुनवाई जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस बबीता रानी की खंडपीठ कर रही थी। इसी दौरान कोर्ट ने राज्य सरकार से लापता लोगों से संबंधित समग्र आंकड़े प्रस्तुत करने को कहा, जिसके बाद स्थिति की भयावहता सामने आई।

📊 चौंकाने वाले सरकारी आंकड़े

(1 जनवरी 2024 से 18 जनवरी 2026 तक)

सरकार द्वारा पेश किए गए हलफनामे में जो आंकड़े सामने आए, उन्होंने न्यायालय को स्तब्ध कर दिया:

  • कुल दर्ज गुमशुदगी के मामले: 1,08,300 (करीब 1.08 लाख)
  • जिन मामलों में पुलिस ने कोई कार्रवाई शुरू की: लगभग 9,700
  • अब तक लंबित और निष्क्रिय मामले: करीब 98,600
  • यानी कुल मामलों का 9 प्रतिशत से भी कम मामलों में ही सक्रिय पुलिस कार्रवाई हुई

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि लापता व्यक्तियों के मामलों में प्रशासनिक उदासीनता कितनी गहरी है।

⚖️ हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणियाँ

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पुलिस और गृह विभाग के रवैये पर सख्त शब्दों में टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा:

  • संवेदनशीलता की भारी कमी:
    लापता लोगों के मामलों में त्वरित और संवेदनशील कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन यहां अधिकारियों का रवैया बेहद लापरवाह दिखाई देता है।
  • तात्कालिकता (Sense of Urgency) का अभाव:
    कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में हर मिनट महत्वपूर्ण होता है, लेकिन कार्रवाई में महीनों की देरी हो रही है।
  • CCTV व्यवस्था का सही इस्तेमाल नहीं:
    लखनऊ जैसे शहर में, जहां जगह-जगह CCTV कैमरे लगे हैं, वहां भी लोगों का पता न चल पाना पुलिस की कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
  • संस्थागत विफलता:
    1.08 लाख लोगों का लापता होना किसी एक अधिकारी की चूक नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता को दर्शाता है।

📝 हाईकोर्ट के प्रमुख निर्देश

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने कई अहम आदेश पारित किए:

  1. PIL का पंजीकरण
    इस पूरे मामले को “In re: Missing Persons in the State” शीर्षक से जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया जाए।
  2. वरिष्ठ अधिकारियों की अनिवार्य उपस्थिति
    अगली सुनवाई 23 फरवरी 2026 को होगी, जिसमें

    • अपर मुख्य सचिव (गृह)
    • पुलिस महानिदेशक (DGP)
      को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया है।
  3. विस्तृत और अपडेटेड डेटा रिपोर्ट
    राज्य सरकार को यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि कितने लोग बाद में मिल चुके हैं और कितने मामलों में केवल रिकॉर्ड अपडेट न होने के कारण आंकड़े लंबित दिख रहे हैं।

🔎 क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

यह आदेश केवल एक केस तक सीमित नहीं है। इसके प्रभाव से:

  • पुलिस और प्रशासन पर जवाबदेही का दबाव बढ़ेगा
  • लापता मामलों की निगरानी न्यायिक स्तर पर होगी
  • पीड़ित परिवारों को न्याय मिलने की उम्मीद मजबूत होगी
  • राज्य की पुलिसिंग और तकनीकी व्यवस्था में सुधार की दिशा तय हो सकती है

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच का यह कदम उत्तर प्रदेश में लापता लोगों के संकट को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर करने वाला माना जा रहा है। अब यह देखना अहम होगा कि सरकार और पुलिस इस न्यायिक सख्ती के बाद कितनी गंभीरता से कार्रवाई करती है और क्या हजारों परिवारों को अपने प्रियजनों के बारे में कोई ठोस जानकारी मिल पाती है या नहीं।

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