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दवाओं के रैपर पर अब होगा खास निशान, एंटीबायोटिक दवाओं की पहचान करना हुआ आसान

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नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने देश में एंटीबायोटिक दवाओं के बढ़ते दुरुपयोग और ‘एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस’ (AMR) के खतरे को देखते हुए एक बड़ा फैसला लिया है। अब दवाओं के रैपर (स्ट्रिप) को देखकर ही आम आदमी यह पहचान सकेगा कि वह दवा एंटीबायोटिक है या नहीं। सरकार ने दवाओं की पैकेजिंग के लिए नए नियम और खास पहचान चिन्ह अनिवार्य कर दिए हैं।

क्या है नया फैसला?

स्वास्थ्य मंत्रालय के नए निर्देशों के अनुसार, सभी एंटीबायोटिक दवाओं की पैकेजिंग पर अब एक विशिष्ट रंग की पट्टी या विशेष कोड देना अनिवार्य होगा। हाल ही में ड्रग कंसल्टेटिव कमेटी (DCC) ने एंटीबायोटिक दवाओं के लिए ‘ब्लू स्ट्रिप’ (नीली पट्टी) या बॉक्स का सुझाव दिया है, ताकि इन्हें अन्य सामान्य दवाओं से अलग पहचाना जा सके।

इससे पहले सरकार ने ‘रेड लाइन’ (लाल रेखा) अभियान शुरू किया था, जिसमें डॉक्टर के पर्चे के बिना न मिलने वाली दवाओं पर लाल पट्टी अनिवार्य की गई थी। अब इस पहचान को और अधिक स्पष्ट किया जा रहा है ताकि मरीज और फार्मासिस्ट दोनों को भ्रम न हो।

क्यों लिया गया यह निर्णय?

भारत में बिना डॉक्टरी सलाह के एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन एक गंभीर समस्या बन चुका है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • दवाओं का दुरुपयोग: लोग सर्दी-खांसी जैसे सामान्य वायरल इन्फेक्शन में भी एंटीबायोटिक ले लेते हैं, जिससे शरीर में बैक्टीरिया इन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी (resistant) हो जाते हैं।

  • AMR का खतरा: जब दवाएं असर करना बंद कर देती हैं, तो मामूली बीमारियां भी जानलेवा बन सकती हैं।

  • जागरूकता की कमी: अधिकांश मरीजों को पता ही नहीं होता कि वे जो दवा ले रहे हैं, वह एक शक्तिशाली एंटीबायोटिक है।

आम नागरिकों को कैसे होगा फायदा?

  1. तुरंत पहचान: अब रैपर देखते ही पता चल जाएगा कि यह दवा डॉक्टर के परामर्श के बिना नहीं लेनी है।

  2. सुरक्षित उपयोग: दवाओं के गलत सेवन से होने वाले साइड इफेक्ट्स में कमी आएगी।

  3. फार्मासिस्ट की जवाबदेही: दुकानदार अब अनजाने में या जानबूझकर एंटीबायोटिक दवाओं को सामान्य पेनकिलर या सप्लीमेंट बताकर नहीं बेच पाएंगे।

विशेषज्ञ की सलाह: “एंटीबायोटिक दवाएं केवल बैक्टीरिया के संक्रमण को खत्म करने के लिए होती हैं, वायरस के लिए नहीं। रैपर पर निशान देखने के बाद यह सुनिश्चित करें कि आप पूरा कोर्स करें और बिना डॉक्टर की पर्ची के इसे न खरीदें।”

भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय और औषधि महानियंत्रक (DGCI) के निर्देशों के अनुसार, उन दवाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है जिनका उपयोग सबसे अधिक होता है।

इन प्रमुख दवाओं पर लागू होगा नया नियम

श्रेणी (Class) प्रमुख दवाओं के नाम सामान्य उपयोग
Penicillins Amoxicillin, Ampicillin गले का इन्फेक्शन, टाइफाइड, दांतों का दर्द
Cephalosporins Cefixime, Ceftriaxone, Cefadroxil यूरिन इन्फेक्शन (UTI), फेफड़ों का संक्रमण
Macrolides Azithromycin, Erythromycin गले में खराश, निमोनिया, साइनस
Fluoroquinolones Ofloxacin, Ciprofloxacin, Levofloxacin दस्त (Diarrhea), पेट के इन्फेक्शन
Tetracyclines Doxycycline त्वचा के रोग (मुंहासे), बैक्टीरियल इन्फेक्शन

नियमों के तहत बदलाव के मुख्य बिंदु

  • शेड्यूल H और H1 की दवाएं: इन सभी एंटीबायोटिक्स को ‘शेड्यूल H’ या ‘H1’ श्रेणी में रखा गया है। नए नियम के अनुसार, इनके बॉक्स पर बड़े अक्षरों में “Antibiotic” लिखना या एक निर्धारित रंगीन बॉर्डर देना अनिवार्य हो सकता है।

  • फार्मासिस्ट के लिए चेतावनी: इन दवाओं के स्ट्रिप पर यह स्पष्ट लिखा होगा कि इसे केवल एक पंजीकृत चिकित्सक (Registered Medical Practitioner) के पर्चे पर ही बेचा जाए।

  • प्रतिबंधित दवाएं (FDCs): हाल ही में सरकार ने कई ऐसी ‘फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन’ (FDC) दवाओं पर भी रोक लगाई है जिनमें गैर-जरूरी एंटीबायोटिक्स का मिश्रण था। अब केवल प्रमाणित फॉर्मूले ही नए पैक में उपलब्ध होंगे।

मरीजों के लिए जरूरी सावधानियां

  1. लाल या नीली पट्टी देखें: दवा खरीदते समय स्ट्रिप के किनारे या पीछे दी गई रंगीन मार्किंग को ध्यान से देखें।

  2. कोर्स पूरा करें: यदि डॉक्टर ने 5 दिन की दवा दी है, तो बेहतर महसूस होने पर भी 2 दिन में दवा न छोड़ें। अधूरा कोर्स ही ‘सुपरबग’ को जन्म देता है।

  3. स्वयं डॉक्टर न बनें: सर्दी-जुकाम जैसे वायरल रोगों में बिना सलाह एंटीबायोटिक लेने से बचें।

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