प्रस्तावना: संविधान — एक जीवंत दस्तावेज या औपनिवेशिक विरासत?
भारतीय संविधान केवल एक कानूनी पोथी नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्र की सुप्त चेतना के पुनर्जागरण का घोषणापत्र है। जब 26 जनवरी 1950 को यह लागू हुआ, तो दुनिया के लिए यह केवल धाराओं और अनुच्छेदों का एक संकलन था, जिसे ‘उधार का थैला’ कहकर नकारा गया। किंतु, क्या यह सच है?
इस पुस्तक की प्रस्तावना इसी प्रश्न की गहराई में उतरती है। एक ओर 1935 के ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट’ की औपनिवेशिक छाप है, तो दूसरी ओर इसकी मूल प्रति के पन्नों पर नंदलाल बोस की कूची से उकेरे गए भगवान राम, श्रीकृष्ण, बुद्ध और छत्रपति शिवाजी के चित्र हैं। यह विरोधाभास ही इस पुस्तक का मूल आधार है।
प्रस्तावना में हम उन संघर्षों को रेखांकित करते हैं जहाँ भारत ने पश्चिम के सामाजिक अनुबंध और पूर्व के ‘धर्म-शासन’ के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया। यह पुस्तक केवल यह नहीं बताती कि संविधान क्या है, बल्कि यह बताती है कि यह ‘वही’ क्यों है। पहले संशोधन (1951) की जल्दबाजी से लेकर 2025 तक के आधुनिक संशोधनों तक, यह प्रस्तावना पाठक को यह सोचने पर विवश करती है कि क्या हम अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं या अपनी विरासत से दूर जा रहे हैं।
अध्याय 1: भारतीय राजतंत्र: एक अनकहा लोकतंत्र
भारतीय प्राचीन शासन व्यवस्था केवल निरंकुश सत्ता का प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि वह एक जटिल और संतुलित प्रणाली थी जहाँ राजा भी ‘धर्म’ के अधीन था। प्राचीन भारतीय राजनीति में सत्ता का केंद्रबिंदु ‘लोकरंजन’ और ‘न्याय’ था।
धर्म का शासन: राजा से ऊपर ‘धर्म’
प्राचीन काल में राजा सर्वेसर्वा नहीं होता था। उसे ‘धर्म’ के अनुशासन में रहना पड़ता था। यहाँ धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि ‘नैतिक नियम’ और ‘कर्तव्य’ था।
मूल अवधारणा: राजा को ‘धर्मप्रवर्तक’ कहा गया है, जिसका अर्थ है धर्म को लागू करने वाला, न कि उसे बनाने वाला। यदि राजा धर्म (संविधान) का उल्लंघन करता, तो उसे दंड का भागी माना जाता था।
“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।” ‘मनुस्मृति’ (अध्याय 8, श्लोक 15)
(अर्थ: नष्ट किया हुआ धर्म नष्ट करने वाले का नाश करता है और सुरक्षित रखा हुआ धर्म रक्षक की रक्षा करता है।)
दरबार की भूमिका: सामूहिक निर्णय और विशेषज्ञता
प्राचीन भारतीय शासन व्यवस्था में राजा को अकेले निर्णय लेने की अनुमति नहीं थी। उसे ‘मंत्रिपरिषद’ और विशेषज्ञों की सलाह लेना अनिवार्य था। कौटिल्य ने कहा है कि शासन की गाड़ी एक पहिए से नहीं चल सकती।
सामूहिक निर्णय: ‘सभा’ और ‘समिति’ जैसी संस्थाएं राजा की शक्तियों पर अंकुश लगाती थीं। परिषद में सैन्य, अर्थ, और शास्त्र के विद्वान (अमात्य) होते थे।
“सहायसाध्यं राजत्वं चक्रमेकं न वर्तते। कुर्वीत सचिवांस्तस्मात्तेषां च श्रृणुयान्मतम्॥” कौटिल्य अर्थशास्त्र (प्रथम अधिकरण, अध्याय 7, सूत्र 9)
(अर्थ: राजत्व का कार्य सहायकों के बिना संभव नहीं है, एक पहिया कभी नहीं घूमता। इसलिए राजा को सचिव नियुक्त करने चाहिए और उनके मत को सुनना चाहिए।)
न्याय की त्रि-स्तरीय व्यवस्था
प्राचीन भारत में न्याय की प्रक्रिया अत्यंत वैज्ञानिक थी। न्याय करते समय न्यायाधीश केवल कानून की किताबों पर निर्भर नहीं रहते थे, बल्कि तीन प्रमुख पहलुओं को देखते थे:
शास्त्र : धर्मशास्त्रों में वर्णित नियम।
परंपरा : उस क्षेत्र या समाज की अपनी परंपराएँ।
समकालीन परिस्थिति: तात्कालिक साक्ष्य और तर्क।
“धर्मश्च व्यवहारश्च चरितं राजशासनम्। चतुष्पाद्व्यवहारोऽयमुत्तरः पूर्वबाधकः॥” कौटिल्य अर्थशास्त्र (तृतीय अधिकरण, अध्याय 1, सूत्र 43)
(अर्थ: धर्म, व्यवहार (प्रमाण), चरित्र (परंपरा) और राजशासन—ये न्याय के चार चरण हैं। इनमें बाद वाला पहले वाले की तुलना में अधिक प्रभावी होता है।)
लिखित एवं मौखिक आदेशों की मर्यादा
प्राचीन शासन में पारदर्शिता और प्रमाणिकता का बड़ा महत्व था। ‘राजशासन’ (Royal Edicts) को लिखित रूप में देने की परंपरा थी ताकि भ्रम न हो।
राजा के मौखिक आदेश को भी तब तक पूर्ण मान्यता नहीं मिलती थी जब तक उसे ‘लेखक’ (Secretary) द्वारा शास्त्र सम्मत भाषा में लिपिबद्ध न कर दिया जाए। अशोक के शिलालेख इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं।
“अलेख्यं शासनं राजा यत्करोति भ्रमादपि। न तत्प्रमाणं मन्तव्यं धर्मशास्त्रविनिश्चयात्॥” (शुक्रनीति)
(अर्थ: यदि राजा भ्रमवश कोई ऐसा आदेश देता है जो लिखित नहीं है, तो धर्मशास्त्र के अनुसार उसे प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।)
प्राचीन भारतीय शासन व्यवस्था ‘चेक एंड बैलेंस’ (नियंत्रण और संतुलन) का एक उत्कृष्ट उदाहरण थी। इसमें राजा की शक्ति को मंत्रिपरिषद की सलाह, जनता की इच्छा (सभा-समिति) और धर्म के सर्वोच्च अनुशासन द्वारा सीमित किया गया था। यह व्यवस्था व्यक्ति-केंद्रित न होकर कर्तव्य-केंद्रित थी।
मौर्यकालीन शासन प्रबंध (322 ई.पू. – 185 ई.पू.)
मौर्य शासन व्यवस्था ‘कौटिल्य के अर्थशास्त्र’ पर आधारित थी। यह दुनिया की सबसे संगठित शुरुआती नौकरशाहियों में से एक थी।
सप्तांग सिद्धांत: कौटिल्य ने राज्य के 7 अंग बताए: स्वामी (राजा), अमात्य (मंत्री), जनपद (क्षेत्र), दुर्ग (किला), कोश (खजाना), दंड (सेना), और मित्र।
अत्यधिक केंद्रीकृत: सत्ता राजा के हाथ में थी, लेकिन वह ‘अमात्य’ और ‘अध्यक्षों’ (विभागाध्यक्षों) के विशाल जाल के माध्यम से शासन करता था।
गुप्तचर व्यवस्था: मौर्य प्रशासन की रीढ़ उसके जासूस थे, जिन्हें ‘गूढ़ पुरुष’ कहा जाता था।
“प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥” कौटिल्य अर्थशास्त्र (प्रथम अधिकरण, अध्याय 19, सूत्र 39)
(अर्थ: प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है और प्रजा के हित में ही उसका हित है। राजा के लिए वह प्रिय नहीं है जो उसे अच्छा लगे, बल्कि वह प्रिय है जो प्रजा को अच्छा लगे।) ‘चाणक्य नीति’ (अध्याय 1, सूत्र 39)
गुप्तकालीन शासन प्रबंध (319 ई. – 550 ई.)
गुप्त काल को भारतीय इतिहास का ‘स्वर्ण युग’ कहा जाता है क्योंकि यहाँ शासन में कठोरता कम और मानवीयता अधिक थी।
विकेंद्रीकरण (Decentralization): मौर्यों के विपरीत, गुप्त राजाओं ने स्थानीय शासन को बहुत स्वायत्तता दी। ग्राम स्तर पर ‘ग्रामिका’ और शहरों में ‘परिषद’ का बहुत प्रभाव था।
अभिलेखीय साक्ष्य: प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार, गुप्त राजाओं ने युद्ध से ज्यादा ‘धर्म विजय’ पर ध्यान दिया।
न्याय व्यवस्था: फाह्यान (चीनी यात्री) के अनुसार, गुप्त काल में दंड विधान बहुत कोमल थे। मृत्युदंड लगभग नहीं के बराबर था।
“नयहीनस्य नृपतेः परैरपि पराभवः। नीतिज्ञो नृपतिर्लोके पूज्यते नात्र संशयः॥” (चाणक्य नीति)
(अर्थ: नीति से हीन राजा का शत्रु भी तिरस्कार करते हैं, जबकि नीतिज्ञ राजा लोक में पूजा जाता है।)
अध्याय 2: ईस्ट इंडिया कंपनी और नियमों का जाल (1773 – 1857)
ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में सफर एक व्यापारिक इकाई से शुरू होकर एक संप्रभु शासक तक पहुँचने की कहानी है। 1773 से 1857 के बीच ब्रिटिश संसद ने कानूनों का एक ऐसा जाल बुना, जिसने धीरे-धीरे कंपनी की स्वायत्तता को समाप्त कर उसे ब्रिटिश क्राउन के नियंत्रण में ला खड़ा किया।
व्यापार से शासन तक: 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट
1770 के दशक तक ईस्ट इंडिया कंपनी भारी कर्ज में डूब चुकी थी, जबकि उसके अधिकारी (नवाब) अकूत संपत्ति लेकर इंग्लैंड लौट रहे थे। इस कुप्रबंधन को रोकने के लिए ब्रिटिश संसद ने ‘रेगुलेटिंग एक्ट’ पारित किया। यह भारत में केंद्रीकृत प्रशासन की पहली नींव थी।
मुख्य परिवर्तन: बंगाल के गवर्नर को ‘गवर्नर जनरल’ बना दिया गया और मद्रास एवं बॉम्बे प्रेसीडेंसी को उसके अधीन कर दिया गया।
न्यायिक नियंत्रण: कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई।
“यह अधिनियम कंपनी के कार्यों को विनियमित करने का प्रथम गंभीर प्रयास था, जिसने भारत में एक लिखित संविधान की नींव रखी और कंपनी के ऊपर ब्रिटिश संसद के प्रभुत्व को स्पष्ट किया।” — अर्वाचीन भारत का इतिहास (हिंदी संस्करण), डॉ. ईश्वरी प्रसाद
सत्ता का केंद्रीकरण: पिट्स इंडिया एक्ट (1784)
1773 की कमियों को दूर करने के लिए विलियम पिट (कनिष्ठ) ने 1784 का अधिनियम पेश किया। इसने भारत में ‘दोहरी सरकार’ (Dual Government) की शुरुआत की।
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दोहरा नियंत्रण: व्यापारिक मामलों के लिए ‘कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स’ और राजनीतिक/सैन्य मामलों के लिए ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ बनाया गया।
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ब्रिटिश अधिकार: पहली बार कंपनी के अधीन क्षेत्रों को “भारत में ब्रिटिश संपत्ति” (British Possessions in India) कहा गया।
राजपत्रों (Charters) का युग (1793 – 1833)
हर 20 साल बाद आने वाले चार्टर एक्ट ने कंपनी की शक्तियों को धीरे-धीरे छीना:
1813 का चार्टर: कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त कर दिया गया (चाय और चीन के साथ व्यापार को छोड़कर)।
1833 का चार्टर: बंगाल के गवर्नर जनरल को ‘भारत का गवर्नर जनरल’ बना दिया गया। यह केंद्रीकरण का चरमोत्कर्ष था। लॉर्ड विलियम बेंटिक पहले ऐसे गवर्नर जनरल बने।
1853 का अधिनियम: वैधानिक तैयारी और अंत का प्रारंभ
1853 का चार्टर एक्ट अंतिम चार्टर था। इसने विधायी और प्रशासनिक कार्यों को अलग कर दिया, जिससे भविष्य में एक स्वतंत्र ‘संसद’ जैसी संरचना का मार्ग प्रशस्त हुआ।
सिविल सेवा: भारतीयों के लिए सिविल सेवा के द्वार खुले (मैकाले समिति)।
रियासतों का विलय: इस अधिनियम ने स्पष्ट कर दिया कि कंपनी का शासन केवल ‘ब्रिटिश क्राउन’ के ट्रस्ट के रूप में है। इसी कालखंड में लॉर्ड डलहौजी ने ‘व्यपगत का सिद्धांत’ (Doctrine of Lapse) का उपयोग कर सतारा, झाँसी और अवध जैसी रियासतों को निगल लिया।
“1853 का अधिनियम एक प्रकार से कंपनी के मृत्यु-पत्र का मसौदा था। इसने क्राउन को यह शक्ति दे दी कि वह किसी भी समय कंपनी से प्रशासन वापस ले सकता है, जिसकी परिणति 1857 के विद्रोह के बाद हुई।” — दि गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, सर कोर्टने इल्बर्ट
1773 से शुरू हुआ नियमों का यह जाल 1857 की क्रांति के साथ समाप्त हुआ। कंपनी ने व्यापार के लिए जो रास्ते खोले थे, ब्रिटिश संसद ने उन्हीं रास्तों पर कानूनों की बाधाएँ खड़ी कर अंततः भारत को सीधे ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बना लिया।
अध्याय 3: ब्रिटिश क्राउन और छलावे की घोषणाएं (1858 – 1918)
यह लेख 1858 से 1918 के बीच ब्रिटिश भारत के उस संक्रमण काल का विश्लेषण करता है, जहाँ ब्रिटिश क्राउन ने ‘सुधार’ के मुखौटे के पीछे अपने साम्राज्यवादी शिकंजे को और मजबूत किया।
ब्रिटिश क्राउन और छलावे की घोषणाएं (1858 – 1918)
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ने ब्रिटिश शासन की जड़ों को हिला दिया था। इसके परिणामस्वरूप ईस्ट इंडिया कंपनी का अंत हुआ और भारत की कमान सीधे ब्रिटिश क्राउन के हाथों में आ गई। लेकिन यह बदलाव जनहित के लिए नहीं, बल्कि साम्राज्य की लंबी उम्र सुनिश्चित करने के लिए था।
1858 का अधिनियम: कंपनी का अंत और एक नए युग का भ्रम
अगस्त 1858 में ‘भारत के बेहतर शासन के लिए अधिनियम’ (Act for the Better Government of India) पारित हुआ। इसने द्वैध शासन को समाप्त कर भारत का प्रशासन ‘सेक्रेटरी ऑफ स्टेट’ और उसकी परिषद को सौंप दिया।
बदलाव: गवर्नर-जनरल अब ‘वायसराय’ (क्राउन का प्रतिनिधि) कहलाने लगा।
सच्चाई: सत्ता का केंद्र कलकत्ता से लंदन स्थानांतरित हो गया, जिससे भारतीयों की अपनी सरकार तक पहुंच और भी मुश्किल हो गई।
महारानी की घोषणा (1858): वादे बनाम हकीकत
1 नवंबर 1858 को इलाहाबाद के दरबार में लॉर्ड कैनिंग ने महारानी विक्टोरिया की घोषणा पढ़ी। इसे भारतीय शिक्षित वर्ग ने ‘मैग्ना कार्टा’ समझा, लेकिन यह महज एक कूटनीतिक छलावा था।
वादा: “हम अपने भारतीय क्षेत्रों के विस्तार की इच्छा नहीं रखते… सभी को समान रूप से कानूनी सुरक्षा दी जाएगी।”
हकीकत: रियासतों को हड़पना तो बंद हुआ, लेकिन उन्हें ब्रिटिश हितों के “अधीनस्थ” (Subordinate) बना दिया गया। ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति आधिकारिक रूप से शुरू हुई।
“यह घोषणा पत्र ऊंची भावनाओं से भरा हुआ था, लेकिन इसका उद्देश्य भारतीयों को सुला देना था ताकि वे अपने अधिकारों के लिए दोबारा न जागें।” — कांग्रेस का इतिहास – खण्ड 1, पट्टाभि सीतारमैया
1892 और 1909 के अधिनियम: सुधारों का मृगतृष्णा
जैसे-जैसे कांग्रेस और राष्ट्रवाद का प्रभाव बढ़ा, अंग्रेजों ने किश्तों में ‘सुधार’ देना शुरू किया।
1892 का अधिनियम: इसमें सीमित चुनाव की बात की गई, लेकिन मतदान का अधिकार नगण्य था।
1909 का मार्ले-मिन्टो सुधार: यह ब्रिटिश कूटनीति का सबसे घातक प्रहार था। इसने धर्म के आधार पर सांप्रदायिक निर्वाचन (Communal Electorate) की शुरुआत की।
“याद रखना कि मार्ले-मिन्टो सुधारों द्वारा हम नाग के दांत (Dragon’s teeth) बो रहे हैं, जिसकी फसल बहुत कड़वी होगी।” — लॉर्ड मिन्टो (इंडिया, मिन्टो एंड मार्ले, मैरी मिन्टो)
1858 से 1918 के बीच के सभी अधिनियम और घोषणाएं वास्तव में भारतीयों को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने के लिए नहीं, बल्कि असंतोष को दबाने के लिए थीं। जैसा कि इतिहासकार ए.आर. देसाई ने कहा है, “ब्रिटिश संवैधानिक सुधार वास्तव में बढ़ते हुए भारतीय राष्ट्रवाद के ज्वार को रोकने के लिए बनाए गए बांध थे।”
तैयार है, यहाँ 1909 के मार्ले-मिन्टो सुधारों (Morley-Minto Reforms) का एक विस्तृत विश्लेषण और भारतीय राजनीति पर इसके दूरगामी प्रभावों पर विशेष लेख है:
1909 का अधिनियम: ‘सांप्रदायिकता का बीजारोपण’ और कूटनीतिक छलावा
1909 का ‘इंडियन काउंसिल एक्ट’, जिसे मार्ले-मिन्टो सुधारों के नाम से जाना जाता है, ब्रिटिश राज की सबसे विवादास्पद नीतियों में से एक था। ऊपर से यह उदारवादी सुधार दिखता था, लेकिन भीतर से यह भारतीय एकता को खंडित करने का एक सूक्ष्म औजार था।
सुधारों के पीछे की पृष्ठभूमि
20वीं सदी की शुरुआत में बंगाल विभाजन (1905) के विरुद्ध बढ़ते स्वदेशी आंदोलन और कांग्रेस की बढ़ती ताकत से ब्रिटिश घबरा गए थे। वायसराय लॉर्ड मिन्टो और भारत सचिव लॉर्ड मार्ले ने दोहरी चाल चली:
दमन: क्रांतिकारियों और गरम दल के नेताओं को जेल भेजना।
तुष्टीकरण: उदारवादियों और कुछ विशिष्ट वर्गों को ‘सुधारों’ का लालच देकर राष्ट्रवाद से अलग करना।
सांप्रदायिक निर्वाचन मंडल (Communal Electorate): सबसे घातक प्रहार
इस अधिनियम की सबसे विनाशकारी विशेषता मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था थी। इसका मतलब था कि मुस्लिम सदस्यों का चुनाव केवल मुस्लिम मतदाता ही करेंगे।
मकसद: हिंदू और मुसलमानों के बीच एक राजनीतिक दीवार खड़ी करना।
परिणाम: इसने भारत में ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ (Two-Nation Theory) की अनौपचारिक नींव रख दी।
“हमने नाग के दांत बो दिए हैं और इसकी फसल बहुत कड़वी होगी।” — लॉर्ड मिन्टो (इंडिया, मिन्टो एंड मार्ले, मैरी मिन्टो)
परिषद का विस्तार: प्रभावहीन भागीदारी
अधिनियम ने केंद्रीय और प्रातीय विधान परिषदों की संख्या तो बढ़ा दी, लेकिन निर्वाचित सदस्यों का बहुमत अभी भी नहीं था।
भारतीयों को बजट पर चर्चा करने और प्रश्न पूछने का अधिकार तो मिला, लेकिन वे कोई ठोस प्रस्ताव पारित नहीं कर सकते थे।
सच्चाई: वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति अभी भी वायसराय और उसकी कार्यकारिणी के पास ही सुरक्षित थी।
“मार्ले-मिन्टो सुधारों ने हमारा सर्वनाश कर दिया।” — महात्मा गांधी (हिंद स्वराज, एम.के. गांधी)
संवैधानिक निरंकुशता का भ्रम
लॉर्ड मार्ले स्वयं स्पष्ट थे कि वे भारत को संसदीय लोकतंत्र की ओर नहीं ले जा रहे हैं। उन्होंने ब्रिटिश संसद में कहा था:
“यदि यह कहा जाए कि सुधारों के इस अध्याय से भारत में संसदीय प्रणाली की स्थापना होगी, तो मेरा इससे कोई लेना-देना नहीं होगा।” – आधुनिक भारत, सुमित सरकार
ऐतिहासिक प्रभाव और विश्लेषण
मार्ले-मिन्टो सुधारों ने भारत के भविष्य को हमेशा के लिए बदल दिया:
सांप्रदायिकता का वैधीकरण: पहली बार धर्म को राजनीति का आधार बनाकर संवैधानिक मान्यता दी गई।
राष्ट्रीय आंदोलन में फूट: अंग्रेजों ने उदारवादियों को लालच देकर कुछ समय के लिए आंदोलन की धार कुंद कर दी।
विभाजन की भूमिका: कई इतिहासकार मानते हैं कि 1947 का विभाजन इसी अधिनियम की परिणति थी।
1909 का अधिनियम ब्रिटिश साम्राज्य के उस ‘छलावे’ का उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ वे अधिकार देने का नाटक तो करते थे, लेकिन वास्तव में वे भारतीयों को आपस में लड़ाकर अपनी सत्ता की उम्र बढ़ा रहे थे। यह सुधार भारतीय लोकतंत्र की प्रगति नहीं, बल्कि साम्राज्यवादी षड्यंत्र का एक हिस्सा था।
अध्याय 4: संवैधानिक संघर्ष (1919 – 1934)
मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के रूप में आया यह अधिनियम ‘उत्तरदायी शासन’ की दिशा में एक कदम बताया गया, लेकिन इसने ‘द्वैध शासन’ (Diarchy) के माध्यम से शासन को दो भागों में बांट दिया।
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संरक्षित विषय: वित्त, पुलिस और न्याय (गवर्नर के पास)।
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हस्तांतरित विषय: शिक्षा और स्वास्थ्य (भारतीय मंत्रियों के पास, लेकिन बिना बजट के)।
प्रसिद्ध इतिहासकार पी.ई. रॉबर्ट्स ने इसके बारे में कहा था: “1919 का अधिनियम भारत को वास्तविक स्वशासन देने के बजाय केवल उसका भ्रम पैदा करने वाला एक संवैधानिक प्रयोग था।” (हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया अंडर दि कंपनी एंड दि क्राउन)
रोलेट एक्ट और साइमन कमीशन: दमनकारी नीतियां और प्रतिरोध
संवैधानिक सुधारों के साथ-साथ ब्रिटिश सरकार ने रोलेट एक्ट (1919) जैसा काला कानून पारित किया, जिसने भारतीयों के नागरिक अधिकारों को कुचल दिया। इसके बाद 1927 में साइमन कमीशन की नियुक्ति ने भारतीयों के आत्म-सम्मान को और चोट पहुंचाई, क्योंकि इसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था।
यह कहना ऐतिहासिक रूप से सत्य है कि साइमन कमीशन (1928) के बहिष्कार का मुख्य और सबसे तात्कालिक कारण इसका ‘श्वेत आयोग’ (All-White Commission) होना था। कांग्रेस और अन्य भारतीय दलों ने इसे आत्मसम्मान का मुद्दा और भारतीयों के आत्मनिर्णय के अधिकार का उल्लंघन माना था।
1919 के ‘भारत सरकार अधिनियम’ में यह प्रावधान था कि दस वर्ष बाद एक आयोग नियुक्त किया जाएगा जो भारत में संवैधानिक सुधारों की प्रगति की समीक्षा करेगा। ब्रिटिश सरकार ने समय से पहले ही 1927 में सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में सात सदस्यीय आयोग का गठन कर दिया।
“श्वेत आयोग” और भारतीय स्वाभिमान
कमीशन के सभी सात सदस्य ब्रिटिश संसद के सदस्य थे। इसमें एक भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया था। कांग्रेस का मानना था कि भारत के भविष्य का फैसला करने वाले समूह में किसी भारतीय का न होना भारत के अपमान के समान है।
आत्मनिर्णय के सिद्धांत का उल्लंघन
भारतीय नेताओं का तर्क था कि भारतीयों को अपने देश के लिए संविधान बनाने का पूरा अधिकार है। लॉर्ड बिरकेनहेड (तत्कालीन भारत सचिव) ने यह तर्क दिया था कि भारतीय आपस में एकमत नहीं हो सकते, इसलिए ब्रिटिशों को यह जिम्मेदारी लेनी पड़ी। कांग्रेस ने इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया।
मद्रास अधिवेशन (1927) का कांग्रेस संकल्प: “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का यह मानना है कि भारत के लिए भविष्य के संविधान का निर्धारण करने का अधिकार केवल भारतीय जनता को है। यह आयोग (साइमन कमीशन) भारतीयों के आत्मनिर्णय के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है, इसलिए कांग्रेस हर स्तर पर और हर रूप में इसका बहिष्कार करने का निर्णय लेती है।” (कांग्रेस का इतिहास, खण्ड 1, डॉ. पट्टाभि सीतारमैय्या)
डॉ. अंसारी (कांग्रेस अध्यक्ष, 1927): “किसी भी देश के लिए इससे बड़ा अपमान नहीं हो सकता कि उसके भाग्य का फैसला करने के लिए गठित आयोग में उसी देश के किसी प्रतिनिधि को स्थान न दिया जाए।” (कांग्रेस का इतिहास, खण्ड 1, डॉ. पट्टाभि सीतारमैय्या)
लाला लाजपत राय : “मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की आखिरी कील साबित होगी।” (नोट: यह उद्धरण उस विरोध प्रदर्शन का है जो साइमन कमीशन के खिलाफ लाहौर में आयोजित किया गया था।) (कांग्रेस का इतिहास, खण्ड 1, डॉ. पट्टाभि सीतारमैय्या)
नेहरू रिपोर्ट (1928): भारतीयों का प्रथम संगठित प्रयास
जब लॉर्ड बर्केनहेड ने भारतीयों को चुनौती दी कि वे एक ऐसा संविधान बनाकर दिखाएं जो सभी दलों को स्वीकार्य हो, तो पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनी। नेहरू रिपोर्ट भारत के लिए संविधान निर्माण का पहला स्वदेशी और संगठित प्रयास था।
रिपोर्ट की मुख्य विशेषताएं:
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डोमेनियन स्टेटस: भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर एक स्वशासी उपनिवेश का दर्जा।
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मौलिक अधिकार: नागरिकों के लिए 19 मौलिक अधिकारों की मांग।
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धर्मनिरपेक्षता: राज्य का अपना कोई धर्म न हो।
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सांप्रदायिक निर्वाचन की समाप्ति: इसके स्थान पर संयुक्त निर्वाचन प्रणाली का प्रस्ताव।
संघर्ष का परिणाम (1930 – 1934)
नेहरू रिपोर्ट को ब्रिटिश सरकार द्वारा अस्वीकार किए जाने के बाद, 1929 के लाहौर अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज्य’ का संकल्प लिया गया। इसी के परिणामस्वरूप सविनय अवज्ञा आंदोलन और बाद में तीन गोलमेज सम्मेलनों का दौर शुरू हुआ, जिसने अंततः 1935 के अधिनियम की नींव रखी।
अध्याय 5: भारतीय संविधान की आधारशिला: 1935 का अधिनियम
भारतीय संविधान के निर्माण में भारत शासन अधिनियम 1935 की भूमिका ठीक वैसी ही है जैसी किसी भव्य इमारत के लिए उसकी नींव की होती है। इसे अक्सर भारतीय संविधान का ‘ब्लूप्रिंट’ या ‘अस्थि-पंजर’ (Skeleton) कहा जाता है।
1935 का अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा पारित अब तक का सबसे लंबा और विस्तृत दस्तावेज था। इसमें 321 अनुच्छेद और 10 अनुसूचियां शामिल थीं। वर्तमान संविधान का लगभग 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसी अधिनियम से प्रेरित है।
मुख्य विशेषताएं और संवैधानिक ढांचा
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संघीय ढांचा (Federal Structure): इस अधिनियम ने पहली बार ‘अखिल भारतीय संघ’ की स्थापना का प्रस्ताव रखा, जिसमें रियासतों और ब्रिटिश प्रांतों को एक साथ आना था।
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शक्तियों का विभाजन: केंद्र और इकाइयों के बीच शक्तियों का बंटवारा तीन सूचियों (संघीय, प्रांतीय और समवर्ती) के माध्यम से किया गया, जिसे आज भी हमारे संविधान की 7वीं अनुसूची में देखा जा सकता है।
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प्रमुख संस्थानों की उत्पत्ति: * देश की मुद्रा और साख नियंत्रण के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की स्थापना।
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न्याय व्यवस्था के लिए संघीय न्यायालय (Federal Court), जिसे 1950 में ‘सुप्रीम कोर्ट’ का स्वरूप मिला।
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लोक सेवा आयोगों (संघीय और प्रांतीय) का गठन।
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पंडित जवाहरलाल नेहरू: “यह अधिनियम एक ऐसी कार के समान है जिसमें ब्रेक तो बहुत हैं, पर इंजन बिल्कुल नहीं है।” (भारत की खोज, स्वयं)
सी. राजगोपालाचारी: “यह अधिनियम नए द्वैध शासन (Diarchy) से भी बदतर है।” (कांग्रेस का इतिहास, खण्ड 2, डॉ. पट्टाभि सीतारमैय्या)
प्रोफेसर के. टी. शाह: “यह अधिनियम केवल बाहरी तौर पर संघीय है, जबकि आंतरिक रूप से यह पूरी तरह एकात्मक और दमनकारी है।” (फेडरल स्ट्रक्चर, स्वयं)
डॉ. बी. आर. अंबेडकर (बाद के संदर्भ में): “मुझे इस बात को स्वीकार करने में कोई शर्मिंदगी नहीं है कि संविधान के निर्माण में 1935 के अधिनियम को आधार बनाया गया है, क्योंकि अच्छी चीजों को उधार लेना चोरी नहीं है।” (भारत का संविधान: एक राष्ट्र की आधारशिला, ग्रैनविले ऑस्टिन)
अध्याय 6: संविधान सभा का गठन और अंतर्द्वंद्व
संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना (1946) के तहत किया गया था। इसका उद्देश्य एक ऐसे ढांचे का निर्माण करना था जो भारत की विविधता को समेट सके।
अंतर्द्वंद्व: सभा के भीतर सबसे बड़ा वैचारिक संघर्ष ‘केंद्रीकृत शक्ति’ बनाम ‘प्रांतीय स्वायत्तता’ को लेकर था। जहाँ कांग्रेस एक मजबूत केंद्र चाहती थी, वहीं मुस्लिम लीग और कुछ रियासतें प्रांतों के लिए अधिक अधिकार चाहती थीं।
ग्रेनविले ऑस्टिन ने अपनी पुस्तक ‘भारत का संविधान: एक राष्ट्र की आधारशिला‘ में लिखा है:
“संविधान सभा ‘सूक्ष्म भारत’ (Microcosm of India) थी, जहाँ वाद-विवाद केवल कानूनी नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक और राजनीतिक थे।”
अविभाज्य भारत की पहली सरकार (1946)
2 सितंबर, 1946 को अंतरिम सरकार का गठन हुआ। यह एक ऐतिहासिक मोड़ था क्योंकि पहली बार भारतीयों के हाथ में शासन की बागडोर थी।
नेतृत्व: जवाहरलाल नेहरू इसके कार्यकारी परिषद के उपाध्यक्ष बने।
चुनौती: शुरुआत में मुस्लिम लीग इसमें शामिल नहीं हुई, लेकिन बाद में सरकार को भीतर से बाधित करने के उद्देश्य से शामिल हुई। लियाकत अली खान (वित्त मंत्री) और नेहरू के बीच बजट को लेकर गंभीर मतभेद रहे।
पंडित नेहरू ने इस अवसर पर कहा था:
“हम एक कठिन यात्रा पर निकल रहे हैं, और हालांकि हमारे रास्ते में बाधाएं हैं, लेकिन हमारा लक्ष्य एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत है।” (द डिस्कवरी ऑफ इंडिया, स्वयं)
संविधान सभा की समितियां और डॉ. राजेंद्र प्रसाद का नेतृत्व
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की भूमिका: सभा के स्थायी अध्यक्ष के रूप में डॉ. प्रसाद ने एक “धैर्यवान मार्गदर्शक” की भूमिका निभाई। उन्होंने उग्र बहसों को शांत किया और यह सुनिश्चित किया कि हर अल्पसंख्यक आवाज़ को सुना जाए।
प्रमुख समितियाँ और अध्यक्ष : प्रारूप समिति (डॉ. बी.आर. अंबेडकर), संघ शक्ति समिति (जवाहरलाल नेहरू), प्रांतीय संविधान समिति (सरदार वल्लभभाई पटेल), संचालन समिति (डॉ. राजेंद्र प्रसाद)
विभाजन का प्रभाव: मुस्लिम लीग का जाना और पुनर्गठन
सदस्य संख्या में परिवर्तन: अविभाज्य भारत की सभा में 389 सदस्य होने थे। विभाजन के बाद, मुस्लिम लीग के सदस्य (जो पाकिस्तान के क्षेत्रों से थे) अलग हो गए, जिससे भारतीय संविधान सभा की सदस्य संख्या घटकर 299 रह गई।
पुनर्गठन: अब सभा केवल एक संविधान निर्मात्री निकाय नहीं थी, बल्कि यह भारत की पहली ‘पूर्ण संप्रभु’ संसद भी बन गई। विभाजन के दंगों और विस्थापन ने संविधान निर्माताओं को ‘मजबूत केंद्र’ की अवधारणा की ओर और अधिक झुका दिया ताकि देश को टूटने से बचाया जा सके।
विभाजन के दुख और सभा के उत्तरदायित्व पर डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने कहा था:
“हम केवल एक राजनीतिक लोकतंत्र नहीं चाहते, बल्कि एक सामाजिक लोकतंत्र भी चाहते हैं, जिसके बिना राजनीतिक लोकतंत्र टिक नहीं सकता।” (संविधान सभा वाद-विवाद, भारत सरकार)
अध्याय 7: प्रारूप समिति और डॉ. अंबेडकर का योगदान
प्रारूप समिति (Drafting Committee) का वास्तविक कार्य।
बी.एन. राव का शुरुआती मसौदा और डॉ. अंबेडकर द्वारा उसे परिष्कृत करना।
पंडित नेहरू की भूमिका: ‘जांच समिति’ के रूप में अंतिम संपादन।
अध्याय 8: भाषा और अनुवाद का संघर्ष
अंग्रेजी में लेखन और हिंदी अनुवाद की मांग।
विशेषज्ञ अनुवाद समिति और पारिभाषिक शब्दों का चयन।
26 नवंबर 1949 से 26 जनवरी 1950 तक का सफर।
अध्याय 9: चित्रांकित संविधान: कला में छिपी सांस्कृतिक आत्मा
कला और संविधान: शांति निकेतन का योगदान, नंदलाल बोस और ब्योहर राममनोहर सिन्हा की दृष्टि।
अशोक चिन्ह: एक भारत-श्रेष्ठ भारत का राजकीय प्रतीक और ‘सत्यमेव जयते’ का संकल्प।
सिंधु से वैदिक काल: मोहनजोदड़ो की मुहर (नंदी) और गुरुकुल परंपरा का शैक्षिक आदर्श।
रामायण और महाभारत: भाग 3 (मौलिक अधिकार) में श्रीराम का ‘रामराज्य’ और भाग 4 में श्रीकृष्ण का ‘गीता उपदेश’—नीति और कर्तव्य का संगम।
अध्याय 10: ऐतिहासिक गौरव और वैचारिक द्वंद्व
अहिंसा के प्रणेता: भगवान बुद्ध और भगवान महावीर का चित्रण (भाग 5-6)।
ज्ञान का शिखर: नालंदा विश्वविद्यालय और प्राचीन भारत का वैश्विक प्रभाव।
शौर्य की परंपरा: छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह और रानी लक्ष्मीबाई का संघर्ष।
विवादास्पद चित्रण और समीक्षा:
टीपू सुल्तान और अकबर के चित्रों का विश्लेषण।
स्वस्तिक और नटराज के चित्रण में हुई त्रुटियाँ: एक गंभीर विमर्श।
आधुनिक भारत के नायक: क्रांतिकारियों के सम्मान पर प्रश्न।
अध्याय 11: भौगोलिक और आध्यात्मिक अखंडता
हिमालय से सागर तक: संविधान के पन्नों पर भारत का भूगोल।
भागीरथ प्रयास: गंगा अवतरण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा।
12. भारतीय संविधान में संशोधन : 1951 से 1975 तक
13. भारतीय संविधान में संशोधन : 1976 से 2000 तक
क्या था 42वां संशोधन? प्रस्तावना में ‘समाजवाद‘ और ‘पंथनिरपेक्षता‘ जोड़ने के पीछे के असली कारण
https://matribhumisamachar.com/2026/15/01/91753/
14. भारतीय संविधान में संशोधन : 2001 से 2025 तक
उपसंहार: शाश्वत भारत और बदलता संविधान
संविधान की यात्रा का निष्कर्ष किसी ‘पूर्ण विराम’ पर नहीं, बल्कि एक ‘अल्पविराम’ पर होता है। 75 से अधिक वर्षों की इस यात्रा में संविधान ने स्वयं को बार-बार ढाला है।
उपसंहार में हम यह पाते हैं कि संविधान एक जड़ पत्थर नहीं, बल्कि एक बहती हुई नदी है। अध्याय 9 और 10 में चर्चित वे चित्र, जो संविधान की मूल प्रति में थे, हमें याद दिलाते हैं कि न्याय, स्वतंत्रता और समानता के विचार भारत के लिए विदेशी नहीं, बल्कि सहस्राब्दियों पुराने हैं।
निष्कर्ष के मुख्य बिंदु:
संशोधन की शक्ति: 1951 से 2025 तक के संशोधनों ने यह सिद्ध किया है कि राष्ट्र की आवश्यकताएं कागजों की सीमाओं से बड़ी होती हैं।
सांस्कृतिक पुनरुद्धार: उपसंहार यह तर्क देता है कि आधुनिक भारत को अपनी प्रगति के लिए पश्चिम के चश्मे की नहीं, बल्कि अपनी उसी ‘सांस्कृतिक आत्मा’ की आवश्यकता है जिसे संविधान के चित्रों में संजोया गया था।
भविष्य की राह: जब हम 2025 के भारत को देखते हैं, तो संविधान का लक्ष्य केवल शासन चलाना नहीं, बल्कि ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के उस स्वप्न को साकार करना है जो मोहनजोदड़ो से लेकर आधुनिक डिजिटल इंडिया तक विस्तृत है।
अंततः, यह पुस्तक यह संदेश छोड़ती है कि संविधान तभी तक जीवंत है जब तक नागरिक इसके मूल्यों को अपने ‘धर्म’ (कर्तव्य) के रूप में स्वीकार करते हैं।
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