देवेर का युद्ध (Battle of Dewair) भारतीय इतिहास में स्वतंत्रता, स्वाभिमान और दीर्घकालिक संघर्ष की निर्णायक विजय का प्रतीक है। यह युद्ध अक्टूबर 1582 ईस्वी में महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर की सेनाओं के बीच लड़ा गया।
इतिहासकारों के अनुसार, यह युद्ध केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि मुगल साम्राज्य की “अजेयता” की धारणा को तोड़ने वाला ऐतिहासिक मोड़ था।
प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने इस युद्ध को उसकी महत्ता के कारण “मेवाड़ का मैराथन” (The Marathon of Mewar) कहा।
हल्दीघाटी के बाद का संघर्ष: पृष्ठभूमि
1576 ईस्वी के हल्दीघाटी युद्ध के बाद यह माना जाने लगा कि मेवाड़ अब मुगलों के नियंत्रण में चला गया है, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग थी।
महाराणा प्रताप ने पराजय स्वीकार करने के बजाय छापामार युद्ध नीति (Guerrilla Warfare) को अपनाया और अरावली पर्वतमाला के दुर्गम क्षेत्रों को अपनी शक्ति का आधार बनाया।
देवेर (वर्तमान राजसमंद जिला, राजस्थान) मुगलों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक चौकी था। यहाँ से मेवाड़ के पर्वतीय मार्गों और आपूर्ति तंत्र पर नियंत्रण रखा जाता था। इस चौकी का नेतृत्व अकबर का निकट संबंधी सुल्तान खान कर रहा था।
यह भी पढ़ें : हल्दीघाटी युद्ध का वो सच जो 450 साल तक छुपाया गया! क्या महाराणा प्रताप ने अकबर को हराया था?
देवेर का युद्ध: रणनीति और घटनाक्रम
महाराणा प्रताप ने विजयादशमी के शुभ अवसर को युद्ध आरंभ करने के लिए चुना, जिससे सैनिकों का मनोबल चरम पर था। उनकी सेना को दो भागों में विभाजित किया गया:
- प्रथम दल: स्वयं महाराणा प्रताप के नेतृत्व में
- द्वितीय दल: उनके पुत्र कुंवर अमर सिंह के नेतृत्व में
यह रणनीति आधुनिक सैन्य सिद्धांतों के अनुसार Two-Front Assault Strategy मानी जाती है, जिससे शत्रु को संभलने का अवसर नहीं मिला।
युद्ध के अमर शौर्य प्रसंग
देवेर का युद्ध राजपूत पराक्रम के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। दो घटनाएँ आज भी इतिहास और लोकगाथाओं में जीवित हैं:
1. कुंवर अमर सिंह का प्रचंड प्रहार
युद्ध के दौरान अमर सिंह ने मुगल सेनापति सुल्तान खान पर भाले से ऐसा प्रहार किया कि वह घोड़े सहित भूमि में जा धंसा। सुल्तान खान की तत्काल मृत्यु हो गई। इससे मुगल सेना की कमान टूट गई।
2. महाराणा प्रताप की तलवार का आतंक
महाराणा प्रताप ने मुगल सेनापति बहलोल खान पर तलवार से ऐसा वार किया कि वह घोड़े सहित दो भागों में कट गया। यह दृश्य मुगल सैनिकों के मनोबल को तोड़ने वाला सिद्ध हुआ।
युद्ध के परिणाम: मेवाड़ की निर्णायक वापसी
देवेर की विजय महाराणा प्रताप के दीर्घ संघर्ष का निर्णायक मोड़ बनी:
- 36 से अधिक मुगल चौकियों का पतन: देवेर के बाद आसपास की अधिकांश मुगल चौकियाँ खाली हो गईं
- मेवाड़ की पुनः स्वतंत्रता: चित्तौड़गढ़ और मांडलगढ़ को छोड़कर लगभग पूरा मेवाड़ मुक्त हो गया
- चावंड राजधानी का उदय: महाराणा प्रताप ने चावंड को नई राजधानी बनाकर सशक्त प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की
आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार, यह विजय राज्य पुनर्निर्माण (State Revival) का उत्कृष्ट उदाहरण है।
ऐतिहासिक महत्व: क्यों कहा गया “मेवाड़ का मैराथन”
जिस प्रकार यूनानियों ने मैराथन के युद्ध में फारस की विशाल सेना को हराकर स्वतंत्रता की रक्षा की थी, उसी प्रकार देवेर में महाराणा प्रताप ने मुगलों की अपराजेय छवि को तोड़ दिया।
यह युद्ध सिद्ध करता है कि:
- दीर्घकालिक संघर्ष अंततः निर्णायक विजय में बदल सकता है
- भूगोल, जनसमर्थन और रणनीति साम्राज्य से अधिक शक्तिशाली होते हैं
- महाराणा प्रताप भारतीय इतिहास के सबसे महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे
मुख्य तथ्य (Quick Facts)
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| युद्ध का वर्ष | अक्टूबर 1582 |
| स्थान | देवेर (राजसमंद, राजस्थान) |
| मुख्य नायक | महाराणा प्रताप, कुंवर अमर सिंह |
| मुगल सेनापति | सुल्तान खान |
| परिणाम | मेवाड़ की निर्णायक विजय |
| ऐतिहासिक उपाधि | मेवाड़ का मैराथन |
देवेर का युद्ध केवल तलवारों की टकराहट नहीं था, बल्कि यह स्वतंत्रता की जिद, आत्मसम्मान और अडिग संकल्प की विजय थी। यह युद्ध आज भी भारत को यह सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत हों, दृढ़ इच्छाशक्ति इतिहास की दिशा बदल सकती है।
Matribhumisamachar


