नई दिल्ली. पश्चिम एशिया (West Asia) में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच गहराते सैन्य संघर्ष और युद्ध जैसी स्थितियों के बीच भारत सरकार आज अपना आधिकारिक रुख स्पष्ट करने जा रही है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर (S. Jaishankar) सोमवार को संसद के बजट सत्र के दौरान एक विस्तृत वक्तव्य देंगे। माना जा रहा है कि इस बयान में न केवल भारत की कूटनीतिक दिशा, बल्कि खाड़ी देशों में फंसे लाखों भारतीयों की सुरक्षा और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर का रोडमैप भी होगा।
पश्चिम एशिया में तनाव: वैश्विक चिंता और भारत की भूमिका
पिछले कुछ दिनों में ईरान और इजरायल के बीच सीधे हमलों ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप और जवाबी कार्यवाहियों के बाद स्थिति ‘पूर्ण युद्ध’ (Full-scale War) की ओर बढ़ती दिख रही है।
विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए संसद में चर्चा की मांग की थी। कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों का कहना है कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि वह इस संकट में किसके साथ खड़ी है और संघर्ष को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या प्रयास कर रही है।
विदेश मंत्री के संबोधन के 4 मुख्य बिंदु (संभावित)
एस. जयशंकर के आज के भाषण में निम्नलिखित महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान केंद्रित रहने की उम्मीद है:
1. भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और ‘इवेक्यूएशन प्लान’
ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों में लगभग 90 लाख से 1 करोड़ भारतीय रहते हैं और काम करते हैं।
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प्राथमिकता: विदेश मंत्रालय (MEA) पहले ही यात्रा परामर्श (Travel Advisory) जारी कर चुका है।
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बचाव अभियान: यदि तनाव और बढ़ता है, तो सरकार ‘ऑपरेशन गंगा’ या ‘वंदे भारत’ की तर्ज पर एक बड़े रेस्क्यू ऑपरेशन की घोषणा कर सकती है।
2. तेल आपूर्ति और पेट्रोल-डीजल की कीमतें
भारत अपनी कच्ची तेल की जरूरतों का 80% से अधिक आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है।
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चुनौती: हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव से तेल की आपूर्ति बाधित हो सकती है।
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रणनीति: भारत अपनी रिफाइनरियों के लिए रूस, अफ्रीका और अमेरिका जैसे वैकल्पिक स्रोतों से आपूर्ति बढ़ाने पर चर्चा कर रहा है ताकि घरेलू बाजार में तेल की कीमतें स्थिर रहें।
3. कूटनीतिक संतुलन (The Diplomatic Tightrope Walk)
भारत के इजरायल और ईरान दोनों के साथ गहरे संबंध हैं।
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इजरायल: रक्षा और प्रौद्योगिकी में रणनीतिक साझेदार।
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ईरान: चाबहार पोर्ट और मध्य एशिया तक पहुँच के लिए महत्वपूर्ण।
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भारत का रुख: भारत अब तक “संयम और संवाद” की अपील करता आया है। आज जयशंकर यह स्पष्ट करेंगे कि क्या भारत इस विवाद में मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है।
4. क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक व्यापार
लाल सागर (Red Sea) और फारस की खाड़ी में सुरक्षा खतरों के कारण भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान हो रहा है। शिपिंग लागत में 30% से 50% तक की वृद्धि हुई है, जिससे व्यापारिक घाटा बढ़ने की आशंका है।
विपक्ष की मांग और राजनीतिक हलचल
संसद के गलियारों में आज इस मुद्दे पर तीखी बहस होने के आसार हैं। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” (Strategic Autonomy) की परीक्षा इस संकट में होगी। सरकार पर दबाव है कि वह मानवीय आधार पर गाजा और लेबनान जैसे क्षेत्रों में हो रही हिंसा पर भी कड़ा रुख अपनाए।
विशेषज्ञों की राय: “भारत के लिए यह संकट केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक भी है। अगर ओमान की खाड़ी या लाल सागर में तनाव बढ़ता है, तो भारत की ‘एनर्जी सिक्योरिटी’ खतरे में पड़ सकती है।”
क्या निकलेगा समाधान?
विदेश मंत्री का आज का बयान यह तय करेगा कि आने वाले हफ्तों में भारत की विदेश नीति किस दिशा में मुड़ेगी। क्या भारत एक मूकदर्शक बना रहेगा या ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज बनकर शांति बहाली की अगुवाई करेगा? पूरी दुनिया की नजरें आज भारतीय संसद पर टिकी हैं।
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