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स्वामी विवेकानंद: युगप्रवर्तक आध्यात्मिक गुरु और आधुनिक भारत के निर्माता

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विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था। बचपन से ही मेधावी नरेंद्रनाथ की जिज्ञासा ईश्वर को ‘देखने’ की थी। उनकी यह खोज रामकृष्ण परमहंस के चरणों में समाप्त हुई। गुरु के सान्निध्य में उन्होंने सीखा कि “शिव भाव से जीव सेवा” (गरीबों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है) ही धर्म का वास्तविक अर्थ है। वे केवल एक संन्यासी नहीं थे, बल्कि वे भारतीय पुनर्जागरण के पुरोधा थे। उन्होंने सोए हुए भारत को जगाया और विश्व को वेदांत के वैज्ञानिक स्वरूप से परिचित कराया।

शिकागो धर्म संसद और वैश्विक पहचान

1893 में शिकागो की विश्व धर्म संसद में उनके ऐतिहासिक भाषण ने दुनिया का भारतीय संस्कृति के प्रति दृष्टिकोण बदल दिया।

  • संबोधन: “अमेरिका के भाइयों और बहनों” के साथ उन्होंने सार्वभौमिक भाईचारे का संदेश दिया।

  • संदेश: उन्होंने सिद्ध किया कि सभी धर्म एक ही सत्य (ईश्वर) की ओर ले जाने वाले अलग-अलग मार्ग हैं।

विवेकानंद का योग दर्शन (योग चतुष्टय)

स्वामी जी ने आध्यात्मिक पूर्णता के लिए चार मुख्य मार्गों की व्याख्या की, जो व्यक्ति की अलग-अलग प्रकृति पर आधारित हैं:

  • राज योग: मन पर नियंत्रण और ध्यान का मार्ग।

  • कर्म योग: बिना फल की इच्छा के कर्तव्य पालन का मार्ग।

  • भक्ति योग: प्रेम और समर्पण के माध्यम से ईश्वर प्राप्ति।

  • ज्ञान योग: बुद्धि और विवेक द्वारा स्वयं के वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को जानना।

राज योग और ध्यान की विधि

विवेकानंद ने ध्यान को एक वैज्ञानिक प्रक्रिया माना। उनके अनुसार ध्यान के मुख्य चरण निम्नलिखित हैं:

  1. शुद्ध वातावरण: शांत और स्वच्छ स्थान का चुनाव।

  2. आसन: रीढ़ की हड्डी, गर्दन और सिर को एक सीधी रेखा में रखना।

  3. प्रत्याहार: मन को बाहरी दुनिया से हटाकर आंतरिक विचारों की ओर मोड़ना।

  4. साक्षी भाव: विचारों को बिना रोके केवल एक दर्शक की तरह देखना ताकि वे शांत हो सकें।

  5. एकाग्रता: किसी एक केंद्र (जैसे सांस या ज्योति) पर मन को स्थिर करना।

एकाग्रता और सफलता के सूत्र

विवेकानंद के अनुसार सफलता का मूल मंत्र एकाग्रता है। उन्होंने सिखाया:

  • लक्ष्य की एकाग्रता: “एक विचार लें और उसे अपना जीवन बना लें।”

  • आत्म-विश्वास: स्वयं को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है।

  • शक्ति का संचय: ऊर्जा का अपव्यय रोकने के लिए संयम और ब्रह्मचर्य अनिवार्य हैं।

सामाजिक योगदान: रामकृष्ण मिशन

1897 में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जिसका आदर्श वाक्य है— ‘आत्मनो मोक्षार्थं जगद् धिताय च’ (अपने मोक्ष और जगत के कल्याण के लिए)। यह संस्था आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य और आपदा राहत के क्षेत्रों में विश्वभर में कार्यरत है।

स्वामी विवेकानंद ने धर्म को अंधविश्वास से निकालकर कर्म और सेवा से जोड़ा। उनके विचार आज भी युवाओं को साहस, राष्ट्रप्रेम और आत्म-गौरव की प्रेरणा देते हैं। भारत सरकार उनके जन्मदिन को ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के रूप में मनाकर उनके महान योगदान को नमन करती है।

“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।”

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