नई दिल्ली. भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में 13 मार्च 2025 (गुरुवार) का दिन एक बड़े बदलाव का गवाह बना। सुप्रीम कोर्ट ने देश की सबसे चर्चित और पुरानी पर्यावरण याचिकाओं में से एक ‘एमसी मेहता बनाम भारत संघ’ को औपचारिक रूप से निस्तारित (Dispose) कर दिया है। 1985 में शुरू हुई यह कानूनी लड़ाई अब एक नए स्वरूप और नए नाम के साथ आगे बढ़ेगी।
क्यों बदला गया 41 साल पुराना शीर्षक?
जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि 1985 की इस मूल रिट याचिका में पिछले चार दशकों में हजारों इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशन (IA) दाखिल हो चुकी थीं। इससे मामले की सुनवाई और रिकॉर्ड का प्रबंधन बेहद जटिल हो गया था। अदालत ने अब इसे स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामले के रूप में नए शीर्षक के साथ सुनने का निर्णय लिया है।
अब इस मामले का नया नाम होगा:
“Re: Issues of Air Pollution in the National Capital Region”
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क्या है ‘निरंतर परमादेश’ (Continuing Mandamus)?
इस याचिका की सबसे बड़ी खासियत इसका ‘निरंतर परमादेश’ होना था। इसका अर्थ है कि कोर्ट ने मामला बंद करने के बजाय दशकों तक समय-समय पर आदेश जारी किए ताकि सरकार प्रदूषण नियंत्रण पर काम करती रहे। इसी प्रक्रिया के तहत दिल्ली-एनसीआर की हवा सुधारने के लिए कई कड़े कदम उठाए गए।
इस याचिका से आए 4 बड़े क्रांतिकारी बदलाव
एमसी मेहता की इस याचिका ने न केवल दिल्ली बल्कि पूरे देश की पर्यावरणीय नीति को बदल दिया। इसके तहत हुए मुख्य फैसले इस प्रकार हैं:
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CNG का आगमन: दिल्ली के सार्वजनिक परिवहन (बसों और ऑटो) को डीजल से सीएनजी पर शिफ्ट करने का ऐतिहासिक आदेश इसी याचिका के तहत आया।
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पुराने वाहनों पर रोक: दिल्ली-एनसीआर में 10 साल पुराने डीजल और 15 साल पुराने पेट्रोल वाहनों पर प्रतिबंध का आधार यही केस बना।
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पटाखों पर नियंत्रण: दिवाली और अन्य त्योहारों पर पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल पर सख्त नियम इसी याचिका के माध्यम से लागू हुए।
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औद्योगिक शिफ्टिंग: रिहायशी इलाकों में चल रही प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों को शहर से बाहर करने का आदेश दिया गया।
रजिस्ट्री को सख्त निर्देश: अब कैसे होगी सुनवाई?
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को विशेष निर्देश दिए हैं ताकि भविष्य की सुनवाई अधिक व्यवस्थित हो सके:
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नया पंजीकरण: अब इस पुराने केस नंबर (13029/1985) के तहत कोई नया आवेदन स्वीकार नहीं होगा।
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स्वतंत्र सुनवाई: लंबित सभी पुराने आवेदनों को अब अलग-अलग रिट याचिकाओं के रूप में दर्ज किया जाएगा। इससे पराली, निर्माण कार्य या धूल जैसे मुद्दों पर स्वतंत्र और त्वरित सुनवाई संभव होगी।
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डिजिटल प्रबंधन: इस कदम से अदालती दस्तावेजों का बोझ कम होगा और एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) के लिए सुझाव देना आसान होगा।
पर्यावरणविद एमसी मेहता की विरासत
पर्यावरण रत्न पुरस्कार से सम्मानित वकील एमसी मेहता ने जब 1985 में यह याचिका डाली थी, तब पर्यावरण कानून भारत में अपने शुरुआती चरण में था। उनकी इस एक याचिका ने ताज महल को पीले होने से बचाने (Taj Trapezium Case) और गंगा सफाई जैसे अन्य बड़े मामलों के लिए भी रास्ता साफ किया था।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक नाम बदलना नहीं है, बल्कि यह “प्रदूषण मुक्त भारत” के अभियान को और अधिक आधुनिक और केंद्रित बनाने की कोशिश है। अब देखना यह होगा कि नए शीर्षक के तहत ‘जहरीली हवा’ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का अगला कड़ा रुख क्या होता है।
क्या आप जानते हैं? एमसी मेहता की याचिकाओं के कारण ही आज स्कूलों और कॉलेजों में पर्यावरण शिक्षा (Environmental Studies) को एक अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाता है।
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