कर्नाटक कांग्रेस में ‘पावर शेयरिंग’ का सच: क्या 2.5 साल का फॉर्मूला होगा लागू?
राहुल गांधी की मैसूर यात्रा और सिद्धारमैया-डीके शिवकुमार से मुलाकात के मायने।
बेंगलुरु. कर्नाटक की राजनीति में वर्तमान समय में “सिद्धारमैया बनाम डी.के. शिवकुमार” का संघर्ष अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर दिखाई दे रहा है। 13-14 जनवरी 2026 को मैसूर एयरपोर्ट पर राहुल गांधी के साथ दोनों नेताओं की संक्षिप्त लेकिन अलग-अलग बातचीत ने राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों को फिर से हवा दे दी है।
1. सत्ता के गलियारों में हलचल का मुख्य कारण
मई 2023 में जब कांग्रेस ने कर्नाटक में जीत दर्ज की थी, तब मीडिया और राजनीतिक हलकों में ‘2.5 साल के पावर शेयरिंग फॉर्मूले’ की चर्चा जोरों पर थी। नवंबर 2025 में इस कार्यकाल के 2.5 साल पूरे हो चुके हैं, जिसके बाद से शिवकुमार खेमा सक्रिय हो गया है।
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डी.के. शिवकुमार का पक्ष: उनके समर्थकों का दावा है कि आलाकमान ने आधे कार्यकाल के बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया था।
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सिद्धारमैया का पक्ष: वे पूरे 5 साल का कार्यकाल पूरा करने पर अड़े हैं। हाल ही में उन्होंने देवराज अर्स का रिकॉर्ड तोड़ते हुए सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले मुख्यमंत्री का गौरव भी प्राप्त किया है।
2. राहुल गांधी से मुलाकात और उसके मायने
मैसूर एयरपोर्ट पर राहुल गांधी ने दोनों नेताओं से अलग-अलग और फिर एक साथ करीब 1.5-2 मिनट बातचीत की।
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सकारात्मक संकेत या औपचारिक मुलाकात?: हालांकि आधिकारिक तौर पर इसे ‘शिष्टाचार भेंट’ और ‘मनरेगा (MGNREGA)’ अभियान पर चर्चा बताया गया, लेकिन राजनीतिक जानकारों के अनुसार, राहुल गांधी ने दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है।
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दिल्ली का बुलावा: कुछ रिपोर्ट्स और विधायक अशोक पट्टन के अनुसार, राहुल गांधी ने दोनों नेताओं को संक्रांति के बाद दिल्ली बुलाया है, जहाँ भविष्य की रूपरेखा तय हो सकती है।
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3. नेतृत्व संकट के पीछे के समीकरण
कर्नाटक में नेतृत्व का मुद्दा केवल दो व्यक्तियों की लड़ाई नहीं, बल्कि सामाजिक और रणनीतिक समीकरणों का खेल है:
| पहलू | सिद्धारमैया (CM) | डी.के. शिवकुमार (DCM) |
| समर्थन आधार | ‘अहिंदा’ (AHINDA – अल्पसंख्यक, पिछड़ा और दलित) | वोक्कालिगा समुदाय और मजबूत कैडर आधार |
| ताकत | प्रशासनिक अनुभव और जन अपील | पार्टी के ‘संकटमोचक’ और आर्थिक संसाधन |
| वर्तमान स्थिति | कैबिनेट विस्तार और फेरबदल की कोशिश | ‘पावर शेयरिंग’ वादे को लागू कराने का दबाव |
4. क्या बदलेंगे समीकरण?
नेतृत्व परिवर्तन की संभावना को लेकर तीन प्रमुख स्थितियाँ बन सकती हैं:
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कैबिनेट फेरबदल: यदि आलाकमान सिद्धारमैया को कैबिनेट फेरबदल की अनुमति देता है, तो यह संकेत होगा कि वे पूरे कार्यकाल के लिए पद पर बने रहेंगे।
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सम्मानजनक समझौता: शिवकुमार को महत्वपूर्ण मंत्रालय या पार्टी में और अधिक शक्तियाँ देकर शांत किया जा सकता है।
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नेतृत्व परिवर्तन: यदि आलाकमान को लगता है कि शिवकुमार की नाराजगी आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में भारी पड़ सकती है, तो ही मुख्यमंत्री बदलने का साहसी कदम उठाया जाएगा।
फिलहाल, गेंद कांग्रेस आलाकमान (मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी) के पाले में है। सिद्धारमैया ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि “कोई भ्रम नहीं है,” जबकि शिवकुमार की ‘रहस्यमयी चुप्पी’ और उनके समर्थकों की दिल्ली दौड़ कुछ और ही संकेत दे रही है। संक्रांति के बाद होने वाली दिल्ली की बैठक कर्नाटक की राजनीति की अगली दिशा तय करेगी।
Matribhumisamachar


