नई दिल्ली. भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। नवीनतम रिपोर्ट्स के अनुसार, 27 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में इस ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर होने की संभावना है। यह समझौता न केवल आर्थिक बल्कि भू-राजनीतिक (Geopolitical) रूप से भी भारत के लिए एक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है।
1. डील का वर्तमान स्टेटस (जनवरी 2026)
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष अंटोनियो कोस्टा के 25-27 जनवरी के बीच भारत दौरे पर आने की उम्मीद है।
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कृषि क्षेत्र बाहर: इस समझौते में संवेदनशीलता को देखते हुए फिलहाल ‘कृषि’ (Agriculture) को दायरे से बाहर रखा गया है।
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शराब और ऑटोमोबाइल: यूरोपीय शराब (Wines & Spirits) और कारों पर लगने वाले भारी शुल्क (Tariffs) में कटौती पर सहमति बन गई है।
2. अमेरिका के लिए ‘बड़ा झटका’ क्यों?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह डील अमेरिका के लिए व्यापारिक और रणनीतिक रूप से एक बड़ी चुनौती है:
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टैरिफ वार से सुरक्षा: अमेरिका द्वारा हाल ही में लगाए गए उच्च टैरिफ (कुछ वस्तुओं पर 50% तक) के बीच भारत ने यूरोप के रूप में एक विशाल वैकल्पिक बाजार खोज लिया है।
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स्वतंत्र व्यापार नीति: यह दिखाता है कि भारत अमेरिकी दबाव (जैसे रूसी तेल आयात या टैरिफ धौंस) के बावजूद अपनी व्यापारिक नीतियों को स्वतंत्र रूप से चलाने में सक्षम है।
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बाजार विविधीकरण: भारत अब निर्यात के लिए केवल अमेरिकी बाजार पर निर्भर नहीं रहेगा, जिससे अमेरिका की ‘बार्गेनिंग पावर’ कम होगी।
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3. भारतीय निर्यात पर क्या असर होगा?
यह FTA भारत के $19.5$ ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था वाले यूरोपीय बाजार के द्वार खोल देगा:
किन सेक्टर्स को होगा सबसे ज्यादा फायदा?
| सेक्टर | संभावित लाभ |
| टेक्सटाइल (कपड़ा) | वर्तमान में 12-16% टैरिफ लगता है। FTA के बाद यह शून्य या कम होगा, जिससे हम वियतनाम और बांग्लादेश को टक्कर दे पाएंगे। |
| फार्मा (दवाएं) | जेनेरिक दवाओं के लिए नियमों में सरलता आएगी, जिससे यूरोपीय हेल्थकेयर मार्केट में भारत की पकड़ मजबूत होगी। |
| आईटी और सेवाएं | भारतीय पेशेवरों (Engineers, IT Experts) के लिए यूरोप में काम करना और वीजा पाना आसान हो सकता है। |
| इंजीनियरिंग गुड्स | स्टील, मशीनरी और ऑटो पार्ट्स के निर्यात में भारी उछाल आने की उम्मीद है। |
4. चुनौतियां और ‘कार्बन टैक्स’ (CBAM)
इतनी बड़ी डील के साथ कुछ पेच भी फंसे हैं:
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CBAM: यूरोपीय संघ का ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ भारतीय स्टील और एल्युमीनियम निर्यातकों के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि उन्हें अतिरिक्त टैक्स देना पड़ सकता है।
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मानक (Standards): यूरोप के कड़े पर्यावरणीय और श्रम मानक (Labor Laws) भारतीय कंपनियों के लिए अनुपालन (Compliance) की लागत बढ़ा सकते हैं।
विशेषज्ञ राय: “यह डील भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन में चीन के विकल्प के रूप में स्थापित करेगी और 2030 तक $1$ ट्रिलियन निर्यात के लक्ष्य को हासिल करने में मील का पत्थर साबित होगी।”
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