भगत सिंह के वैचारिक परिवर्तन और उनके संघर्ष के इस अनछुए पहलू पर एक पुस्तक का प्रारूप तैयार करना एक बहुत ही सार्थक विचार है। यह पुस्तक न केवल एक क्रांतिकारी की जीवनी होगी, बल्कि उस समय की दो अलग-अलग विचारधाराओं (गांधीवादी बनाम क्रांतिकारी) के बीच के अंतर्विरोधों का एक तटस्थ विश्लेषण भी होगी।
1. प्रस्तावना (Introduction)
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भगत सिंह के प्रारंभिक जीवन और उनके परिवार की क्रांतिकारी पृष्ठभूमि का परिचय।
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गांधी जी के असहयोग आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी और ‘स्वराज’ की शुरुआती आशा।
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पुस्तक का मुख्य उद्देश्य: यह समझना कि कैसे एक अहिंसक युवा ‘इंकलाब’ का सबसे बड़ा चेहरा बन गया।
2. अध्याय 1: मोहभंग का दौर (The Turning Point)
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जलियांवाला बाग और चौरी-चौरा: 1919 का नरसंहार और फिर 1922 में असहयोग आंदोलन की अचानक समाप्ति से युवा भगत सिंह के मन में उपजे सवाल।
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कांग्रेस की ‘शांति’ और युवाओं का असंतोष: कांग्रेस की नीतियों को ‘अनुनय-विनय’ की राजनीति के रूप में देखना।
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अंग्रेज प्रेम या कूटनीति? क्रांतिकारियों की दृष्टि में कांग्रेस और ब्रिटिश सत्ता के बीच का वह लचीलापन जिसका आपने उल्लेख किया है।
3. अध्याय 2: दो विचारधाराएं – एक लक्ष्य (Ideological Clash)
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भटके हुए युवा बनाम देशभक्त: गांधी जी द्वारा क्रांतिकारियों को दी गई संज्ञा और उससे जनमानस पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण।
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सुविधाएं बनाम शहादत: जहाँ कांग्रेस के नेता जेलों में राजनीतिक कैदी के रूप में सुरक्षित थे, वहीं क्रांतिकारियों के लिए फांसी और ‘काला पानी’ नियति थी।
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चंद्रशेखर आजाद का संघर्ष: संसाधनों का अभाव और उनके परिवार की दुर्दशा का मार्मिक चित्रण।
4. अध्याय 3: असेंबली बम कांड – गिरफ्तारी का रणनीतिक निर्णय
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हिंसा नहीं, संदेश का उद्देश्य: ‘बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत है।’
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आत्मसमर्पण क्यों? गिरफ्तारी के माध्यम से अदालत को एक मंच (Platform) की तरह उपयोग करना ताकि देश के सामने क्रांतिकारियों का असली चेहरा और उद्देश्य आ सके।
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अदालती कार्यवाही: भगत सिंह द्वारा दी गई दलीलें कि वे ‘आतंकवादी’ नहीं बल्कि ‘स्वतंत्रता सेनानी’ हैं।
5. अध्याय 4: जेल का संघर्ष और भूख हड़ताल
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अहिंसा का क्रांतिकारी प्रयोग: जेल में कैदियों के अधिकारों के लिए 116 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल।
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जतींद्रनाथ दास का बलिदान: जेल में सुविधाओं की लड़ाई और उसका लाभ बाद में कांग्रेस के नेताओं को मिलना।
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वैचारिक परिपक्वता: जेल के दौरान भगत सिंह का लेखन और उनके द्वारा रचित ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’।
6. अध्याय 5: फांसी और गांधी-इरविन समझौता
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जनता का दबाव: देश भर में ‘भगत सिंह को बचाओ’ की गूँज।
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इतिहास के पन्नों से: गांधी-इरविन समझौते के दौरान भगत सिंह की फांसी का मुद्दा।
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दिखावा या विवशता? गांधी जी द्वारा वायसराय को लिखे गए पत्रों का निष्पक्ष विश्लेषण और फांसी न रुक पाने के पीछे के राजनीतिक कारण।
7. अध्याय 6: विरासत और आज का भारत
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भगत सिंह के बलिदान का कांग्रेस की राजनीति पर प्रभाव।
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भगत सिंह आज भी युवाओं के आदर्श क्यों हैं?
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निष्कर्ष: क्या क्रांतिकारी आंदोलन के बिना 1947 की आजादी संभव थी?
पुस्तक की मुख्य विशेषताएं:
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तुलनात्मक अध्ययन: गांधीवादी ‘आश्रम संस्कृति’ और क्रांतिकारियों की ‘अंडरग्राउंड’ जिंदगी के बीच का अंतर।
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दुर्लभ दस्तावेज: उस समय के समाचार पत्रों और अदालती रिकॉर्ड्स के उद्धरण।
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भावनात्मक पहलू: क्रांतिकारियों के परिवारों के बलिदानों का उल्लेख।
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