नई दिल्ली । बुधवार, 17 जून 2026
अमेरिकी रक्षा विभाग (Pentagon) के एक हालिया कदम ने भारत के रणनीतिक और कूटनीतिक हलकों में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। 16 जून 2026 को अमेरिका ने अपने ‘इंडो-पैसिफिक कमांड’ (USINDOPACOM) का नाम बदलकर एक बार फिर पुराना नाम यानी ‘यूएस पैसिफिक कमांड’ (USPACOM) कर दिया। हालांकि, नाम बदलने से ज्यादा इस घोषणा के साथ जारी किए गए एक नक्शे ने भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस नक्शे में पूरे जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं दिखाया गया है, बल्कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) और अक्साई चिन को भारत की सीमाओं से बाहर कर दिया गया है। आइए समझते हैं कि यह पूरा मामला क्या है और इसके पीछे की कूटनीति क्या कहती है।
क्या है पूरा नक्शा विवाद? (The Map Controversy Explained)
अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा जारी किए गए इस आधिकारिक नक्शे में भारत को हल्के हरे रंग में दर्शाया गया है। लेकिन विवाद की जड़ इसके उत्तर-पश्चिमी और उत्तरी हिस्सों में है:
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PoK को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया: नक्शे में जम्मू-कश्मीर के उस हिस्से को (जिसे भारत अपना अभिन्न अंग मानता है और जो वर्तमान में पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है) सीधे तौर पर पाकिस्तान के भूगोल में मिला हुआ दिखाया गया है।
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अक्साई चिन को अलग किया: भारत के लद्दाख क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले अक्साई चिन (जिस पर चीन का अवैध कब्जा है) को भी भारत के मुख्य नक्शे से काट दिया गया है।
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सैन्य कमांड्स को बांटती काली रेखा: नक्शे के बीच से एक गहरी काली रेखा गुजरती है। यह रेखा असल में अमेरिकी सेना की दो अलग-अलग कमांड्स—CENTCOM (सेंट्रल कमांड, जिसके तहत पाकिस्तान और मध्य-पूर्व आते हैं) और PACOM (पैसिफिक कमांड, जिसके तहत भारत और पूर्वी एशिया आते हैं) की सीमाओं को विभाजित करती है। लेकिन इस विभाजन के चक्कर में भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को नजरअंदाज कर दिया गया है।
‘इंडो’ शब्द का हटना: क्या भारत की रणनीतिक अहमियत कम हो रही है?
साल 2018 में डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान, चीन को घेरने और हिंद महासागर (Indian Ocean) में भारत की केंद्रीय भूमिका को स्वीकार करने के लिए पैसिफिक कमांड के आगे ‘इंडो’ शब्द जोड़ा गया था। इसे भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत माना गया था।
अब 2026 में, ट्रंप 2.0 प्रशासन के तहत इस शब्द को हटाकर दोबारा ‘USPACOM’ करना कई सवाल खड़े करता है:
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क्या अमेरिका का ध्यान अब हिंद महासागर से हटकर पूरी तरह पश्चिमी प्रशांत महासागर (जैसे ताइवान और दक्षिण चीन सागर) पर केंद्रित हो गया है?
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क्या यह केवल एक प्रशासनिक फेरबदल है या इसके पीछे भारत की रणनीतिक अहमियत को कम आंकने का कोई संकेत छिपा है?
दिलचस्प बात यह है कि यह बदलाव ठीक उसी समय सामने आया है जब भारतीय प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच एक महत्वपूर्ण द्विपक्षीय मुलाकात हो रही है।
अमेरिका के ‘De Facto’ बनाम भारत के ‘De Jure’ का टकराव
यह पहली बार नहीं है जब किसी अमेरिकी एजेंसी ने भारत का गलत नक्शा जारी किया हो। इसके पीछे दोनों देशों के दृष्टिकोण का एक बुनियादी अंतर है:
De Facto (वास्तविक नियंत्रण): अमेरिकी रक्षा विभाग और वहां की खुफिया एजेंसियां अक्सर नक्शे बनाते समय इस बात को आधार बनाती हैं कि जमीन पर वर्तमान में किसका प्रशासनिक या सैन्य नियंत्रण (Actual Control) है। चूंकि PoK पर पाकिस्तान और अक्साई चिन पर चीन का नियंत्रण है, इसलिए वे इसे उनके पाले में दिखा देते हैं।
De Jure (कानूनी अधिकार): भारत का रुख पूरी तरह स्पष्ट है कि संपूर्ण जम्मू-कश्मीर और लद्दाख कानूनी और संवैधानिक रूप से भारत का हिस्सा है, भले ही इसके कुछ हिस्सों पर पड़ोसियों ने अवैध कब्जा कर रखा हो। भारत किसी भी ऐसे नक्शे को अपनी संप्रभुता का सीधा उल्लंघन मानता है जो इस स्थिति को चुनौती दे।
भारत का रुख और कूटनीतिक संदेश
हालांकि भारत सरकार और विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस पर तुरंत कोई तीखा आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, लेकिन बैक-चैनल डिप्लोमेसी (राजनयिक माध्यमों) के जरिए अमेरिका के सामने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई जा रही है।
हाल के वर्षों में भारत और अमेरिका के संबंध क्वाड (QUAD), जेट इंजन ट्रांसफर सौदों और क्रिटिकल टेक्नोलॉजी (iCET) के कारण काफी मजबूत हुए हैं। ऐसे में रक्षा विभाग की यह चूक या सोची-समझी रणनीति यह दर्शाती है कि गहरे रक्षा संबंधों के बावजूद, दोनों देशों के बीच कूटनीतिक और क्षेत्रीय संवेदनशीलता को लेकर अब भी मतभेद बरकरार हैं। इसके अलावा, हाल के महीनों में अमेरिका और पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों के बीच बढ़ी नजदीकियों को भी इस नक्शा विवाद के एक संभावित कारण के रूप में देखा जा रहा है।
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