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तमिलनाडु में नवोदय विद्यालय और भाषा विवाद: सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और पूरा मामला

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
5 Min Read
चेन्नई | 
तमिलनाडु में हिंदी भाषा के प्रवेश और जवाहर नवोदय विद्यालयों (JNV) की स्थापना को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद एक बार फिर देश के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पहुंचा। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने राज्य सरकार के रुख पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां करते हुए यह स्पष्ट किया कि राज्य और केंद्र को शिक्षा व भाषा नीति से जुड़े मतभेदों को संवाद और सहकारी संघवाद के जरिए हल करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को अपने दृष्टिकोण में बदलाव करने और केंद्र के साथ निरंतर बातचीत जारी रखने का सुझाव दिया।
  • भाषा नीति पर स्पष्ट रुख: पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि तमिलनाडु की धरती पर हिंदी भाषा बिल्कुल न पढ़ाई जाए।
  • सहकारी संघवाद पर जोर: कोर्ट ने कहा कि शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर केंद्र और राज्य के बीच गतिरोध के बजाय ‘सहकारी संघवाद’ (Cooperative Federalism) की भावना से समाधान निकाला जाना चाहिए।
  • शैक्षणिक विकल्पों की उपलब्धता: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी केंद्रीय योजना को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वह राज्य की मौजूदा नीति से भिन्न है। छात्रों को अतिरिक्त शैक्षणिक विकल्प देने से राज्य की शिक्षा व्यवस्था के मानकों पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ता।

क्या है पूरा विवाद?

तमिलनाडु के प्रत्येक जिले में जवाहर नवोदय विद्यालय स्थापित करने को लेकर राज्य सरकार की अपनी नीतिगत आपत्तियां रही हैं।
  1. द्वि-भाषा बनाम त्रि-भाषा नीति:
    • तमिलनाडु नीति: राज्य के सरकारी स्कूलों में मुख्य रूप से तमिल और अंग्रेजी की दो-भाषा व्यवस्था (Two-Language Formula) लागू है।
    • नवोदय विद्यालय नीति: नवोदय विद्यालयों में केंद्र सरकार की त्रि-भाषा व्यवस्था (Three-Language Formula) लागू होती है, जिसमें हिंदी भी अनिवार्य या एक विकल्प के रूप में शामिल होती है।
  2. राज्य सरकार का पक्ष: राज्य सरकार का तर्क है कि वह हिंदी विरोध के कारण नहीं, बल्कि नवोदय विद्यालयों की भाषा नीति और राज्य की स्थापित शिक्षा नीति के बीच के अंतर को लेकर असहमत है।

जमीन की पहचान के लिए मिला समय

सुप्रीम कोर्ट ने अपने दिसंबर 2025 के उस आदेश को वापस लेने से साफ इनकार कर दिया, जिसके तहत तमिलनाडु सरकार को हर जिले में नवोदय विद्यालय के लिए उपयुक्त भूमि चिह्नित करने का निर्देश दिया गया था।
हालांकि, अदालत ने व्यावहारिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार को इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए 3 महीने का अतिरिक्त समय दिया है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि वर्तमान में केवल उपयुक्त जमीन की पहचान करने को कहा गया है, न कि उसे तुरंत अधिग्रहीत करने को।

अगली सुनवाई और आगे की राह

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर 2026 को तय की है। तब तक तमिलनाडु सरकार को जमीन चिह्नित करने के निर्देश पर आगे बढ़ना होगा और केंद्र तथा राज्य के बीच भाषा नीति पर चर्चा का दौर जारी रहने की संभावना है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1: जवाहर नवोदय विद्यालय (JNV) में कौन सी भाषा नीति लागू होती है?
उत्तर: नवोदय विद्यालयों में केंद्र सरकार की त्रि-भाषा नीति (Three-Language Formula) लागू होती है, जिसमें अंग्रेजी, क्षेत्रीय भाषा और हिंदी शामिल हैं।
Q2: तमिलनाडु सरकार को नवोदय विद्यालयों से क्या आपत्ति है?
उत्तर: तमिलनाडु सरकार की मुख्य आपत्ति राज्य की दशकों पुरानी द्वि-भाषा नीति (तमिल और अंग्रेजी) और नवोदय विद्यालयों की त्रि-भाषा नीति के बीच का अंतर है।
Q3: सुप्रीम कोर्ट ने जमीन चिह्नित करने के लिए कितना समय दिया है?
उत्तर: सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नवोदय विद्यालयों के लिए जमीन की पहचान करने के हेतु 3 महीने का अतिरिक्त समय दिया है।

Disclaimer

यह लेख केवल शैक्षणिक और सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है। न्यायालय की कार्यवाहियों और आदेशों से संबंधित आधिकारिक विवरण आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड्स पर आधारित हैं।
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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।