नई दिल्ली । मंगलवार, 18 अगस्त 2026
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मृत्युदंड पाए दोषियों को फांसी देने की मौजूदा कानूनी व्यवस्था को बदलने की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ किया है कि भारत में फिलहाल मृत्युदंड के निष्पादन के लिए फांसी की प्रक्रिया ही लागू रहेगी।
याचिकाकर्ता की मुख्य दलीलें और मांगें
वर्ष 2017 से लंबित इस याचिका में फांसी के मानवीय प्रभावों और प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे:
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अनावश्यक पीड़ा का तर्क: याचिकाकर्ता का कहना था कि फांसी से मृत्युदंड की प्रक्रिया अत्यंत कष्टदायक हो सकती है, इसलिए दोषी की मानवीय गरिमा को ध्यान में रखते हुए कम पीड़ादायक तरीका चुना जाना चाहिए।
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वैकल्पिक तरीके: याचिका में Intravenous Lethal Injection (जहरीला इंजेक्शन), Shooting (गोली मारना), Electrocution (बिजली का झटका देना) और Gas Chamber जैसे तरीकों को अपनाने का सुझाव दिया गया था।
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दोषी को विकल्प चुनने का अवसर: याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि दोषी को फांसी और लीथल इंजेक्शन में से अपनी पसंद का विकल्प चुनने का अधिकार मिले।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मौजूदा व्यवस्था में बदलाव करने से इनकार करते हुए फैसला सुनाया:
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तत्काल बदलाव से इनकार: अदालत ने किसी विशेष वैकल्पिक तरीके को लागू करने का निर्देश देने से साफ मना कर दिया।
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भविष्य के लिए राह खुली: अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में नए वैज्ञानिक, चिकित्सकीय या अनुभवजन्य प्रमाण सामने आते हैं, जो यह साबित करें कि कोई अन्य तरीका कम पीड़ादायक और अधिक गरिमापूर्ण है, तो इस विषय पर पुनः विचार हो सकता है।
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विशेषज्ञ समिति की संभावना: केंद्र सरकार यदि चाहे तो विशेषज्ञों की समिति गठित कर मृत्युदंड के निष्पादन के तरीकों की समीक्षा करा सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. क्या भारत में अब फांसी की सजा बंद हो जाएगी?
नहीं, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भारत में मृत्युदंड के निष्पादन के लिए फांसी की मौजूदा व्यवस्था ही बरकरार रहेगी।
Q2. याचिकाकर्ता ने फांसी के विकल्प में किन तरीकों की मांग की थी?
याचिका में जहरीला इंजेक्शन (Lethal Injection), गोली मारना (Shooting), बिजली का झटका (Electrocution) और गैस चैंबर जैसे विकल्पों का उल्लेख था।
Q3. यह याचिका कब दायर की गई थी?
यह याचिका वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थी।
Disclaimer
यह समाचार आलेख उपलब्ध कानूनी घटनाक्रमों और न्यायिक जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को सूचना प्रदान करना है, यह कोई कानूनी सलाह नहीं है।
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