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अंगदान को धार्मिक आस्था के विरुद्ध मानने वालों को चाहिए गीता का ज्ञान

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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– डॉ. अतुल मलिकराम

अंगदान केवल चिकित्सा व्यवस्था का विषय नहीं है, यह मानवीय संवेदना, सामाजिक जिम्मेदारी और हमारी आस्थाओं से भी जुड़ा प्रश्न है। भारत जैसे विविध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं वाले देश में किसी भी सामाजिक बदलाव को सफल बनाने के लिए जरूरी है कि विज्ञान और आस्था को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय दोनों के बीच संवाद का रास्ता बनाया जाए। अंगदान के मामले में भी यही दृष्टिकोण सबसे अधिक उपयोगी हो सकता है। मध्य प्रदेश में अंगदान की स्थिति बताती है कि अभी लंबी दूरी तय करनी है। राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार 2023 में देश में कुल 16,542 डोनर्स दर्ज हुए, जिनमें 1,099 डिसीस्ड डोनर्स थे। इसी वर्ष देश में कुल 18,378 ऑर्गन ट्रांसप्लांट हुए। मध्य प्रदेश का योगदान राष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षाकृत सीमित रहा। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार राज्य में 2021 में 172, 2022 में 236 और 2023 में 281 ऑर्गन डोनेशंस दर्ज किए गए।

स्थिति को समझने के लिए एक और आंकड़ा महत्वपूर्ण है। जनवरी 2018 से जून 2023 के बीच मध्य प्रदेश में केवल 25 कैडवेरिक डोनेशन दर्ज हुए, जबकि इसी अवधि में तेलंगाना में 883 और तमिलनाडु में 713 कैडवेरिक डोनेशन हुए। यह अंतर केवल अस्पतालों और चिकित्सा सुविधाओं का सवाल नहीं है। विशेषज्ञों और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों ने जागरूकता, अस्पतालों में ब्रेन-डेथ आइडेंटिफिकेशन और ऑर्गन रिट्रीवल की व्यवस्था जैसे कई कारणों की ओर भी ध्यान दिलाया है। इसके साथ हमें सामाजिक और धार्मिक धारणाओं की भूमिका को भी समझना होगा। कई परिवारों में यह आशंका रहती है कि मृत्यु के बाद शरीर के अंग दान करने से अंतिम संस्कार की प्रक्रिया प्रभावित होगी, आत्मा की यात्रा में बाधा आएगी या अगले जन्म से जुड़ी कोई समस्या उत्पन्न होगी। इन आशंकाओं का सम्मानपूर्वक समाधान जरूरी है, क्योंकि आस्था किसी व्यक्ति के जीवन का अत्यंत निजी और संवेदनशील हिस्सा है।

भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण आत्मा और शरीर के बीच अंतर को समझाते हुए शरीर की नश्वरता और आत्मा की निरंतरता का वर्णन करते हैं। पुराने वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र धारण करने का उदाहरण इसी दर्शन को सरल रूप में सामने रखता है। गीता में आत्मा को अविनाशी बताया गया है। इस दर्शन की एक सहज व्याख्या यह हो सकती है कि मृत्यु के बाद शरीर की भौतिक अवस्था और आत्मा की आध्यात्मिक यात्रा को एक ही चीज मानना आवश्यक नहीं है। इसीलिए अंगदान को किसी धार्मिक आस्था के विरुद्ध मानने के बजाय उसे जीवन के प्रति करुणा और निःस्वार्थ सेवा के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि यह भी जरूरी है कि किसी व्यक्ति की धार्मिक मान्यता के आधार पर यह दावा न किया जाए कि अंगदान करने से उसे निश्चित रूप से मोक्ष या अगले जन्म में कोई विशेष फल प्राप्त होगा। ऐसे आध्यात्मिक निष्कर्ष व्यक्तिगत आस्था और धार्मिक व्याख्या का विषय हैं। सार्वजनिक जागरूकता का आधार मानव जीवन बचाने का स्पष्ट और सार्वभौमिक उद्देश्य होना चाहिए।

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भारत की सांस्कृतिक स्मृति में दधीचि और राजा शिवि जैसी कथाएं त्याग और परोपकार की भावना को सामने रखती हैं। इन कथाओं को आधुनिक अंगदान के साथ जोड़ते समय यह समझना महत्वपूर्ण है कि वे आज की चिकित्सा प्रक्रिया के प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं, बल्कि त्याग और दूसरों के कल्याण की सांस्कृतिक प्रेरणाएं हैं। यही प्रेरणा आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के साथ मिलकर अंगदान की भावना को मजबूत कर सकती है। अंगदान के बाद भी शरीर को सम्मानपूर्वक परिवार को सौंपा जाता है और निर्धारित चिकित्सकीय प्रक्रिया पूरी होने के बाद अंतिम संस्कार किया जा सकता है। इसलिए परिवारों तक यह तथ्य स्पष्ट रूप से पहुंचना चाहिए कि अंगदान और सम्मानजनक अंतिम संस्कार एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।

मध्य प्रदेश में इस दिशा में धर्मगुरुओं, चिकित्सकों, शिक्षकों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय प्रशासन की साझेदारी महत्वपूर्ण हो सकती है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च और अन्य सामुदायिक संस्थाएं अपने-अपने अनुयायियों के बीच करुणा, सेवा और मानव जीवन के सम्मान का संदेश देकर जागरूकता बढ़ा सकती हैं। किसी एक धर्म की व्याख्या को सार्वभौमिक सत्य के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय सभी आस्थाओं के सम्मान के साथ संवाद आगे बढ़ाना अधिक प्रभावी होगा। आखिरकार अंगदान का मूल प्रश्न यह है कि मृत्यु के बाद हमारे शरीर का क्या होगा, उससे कहीं बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हमारे जाने के बाद भी हमारे जीवन का कोई अंश किसी दूसरे व्यक्ति को जीवन दे सकता है। विज्ञान इस संभावना को वास्तविक बनाता है और हमारी मानवीय संवेदना उसे अर्थ देती है।

लेखक राजनीतिक रणनीतिकार हैं.

नोट : लेखक द्वारा व्यक्त विचारों से मातृभूमि समाचार का सहमत होना आवश्यक नहीं है.

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।