मुंबई. भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि विदेशी निवेशकों द्वारा टैक्स बचाने के लिए बनाए गए जटिल ढांचे अब जांच के दायरे से बाहर नहीं रहेंगे। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने टाइगर ग्लोबल की उस दलील को ठुकरा दिया, जिसमें भारत-मॉरीशस टैक्स संधि (DTAA) के तहत टैक्स छूट का दावा किया गया था।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद साल 2018 का है, जब दुनिया की दिग्गज रिटेल कंपनी वॉलमार्ट (Walmart) ने भारतीय ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म फ्लिपकार्ट का अधिग्रहण किया था।
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इस डील के दौरान टाइगर ग्लोबल ने फ्लिपकार्ट में अपनी हिस्सेदारी बेची, जिससे उसे करीब $1.6 बिलियन का पूंजीगत लाभ (Capital Gains) हुआ।
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टाइगर ग्लोबल ने मॉरीशस स्थित अपनी इकाइयों के माध्यम से यह निवेश किया था और दावा किया था कि मॉरीशस के साथ भारत की टैक्स संधि के अनुसार, उन्हें भारत में टैक्स नहीं देना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मुख्य बातें
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टैक्स चोरी का जरिया: कोर्ट ने पाया कि टाइगर ग्लोबल ने मॉरीशस की कंपनियों का उपयोग केवल “कंड्यूट” (Conduit) या माध्यम के रूप में किया था ताकि टैक्स देने से बचा जा सके।
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सच्चा नियंत्रण (Control & Management): जांच में सामने आया कि इन मॉरीशस स्थित कंपनियों का वास्तविक नियंत्रण और निर्णय लेने की शक्ति अमेरिका (USA) में थी, न कि मॉरीशस में।
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TRC पर्याप्त नहीं: कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा कि केवल ‘टैक्स रेजिडेंसी सर्टिफिकेट’ (TRC) होना ही टैक्स छूट पाने के लिए काफी नहीं है। यदि लेन-देन का मुख्य उद्देश्य टैक्स चोरी है, तो विभाग उसकी गहराई से जांच कर सकता है।
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दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला पलटा: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली उच्च न्यायालय के अगस्त 2024 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें टाइगर ग्लोबल को राहत दी गई थी।
विदेशी निवेशकों पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से उन विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) और निजी इक्विटी फर्मों में हलचल मच सकती है, जो मॉरीशस या सिंगापुर जैसे देशों के रास्ते भारत में निवेश करते हैं। अब आयकर विभाग के पास ऐसी पुरानी और नई डील्स की बारीकी से जांच करने की “स्वीपिंग पावर्स” आ गई हैं।
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