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सावधान! कानपुर-प्रयागराज के नीचे ‘धंस’ सकती है जमीन; IIT कानपुर की रिसर्च में लिक्विफेक्शन का बड़ा खुलासा

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कानपुर. उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख महानगरों, कानपुर और प्रयागराज पर भविष्य में आने वाले भूकंप को लेकर एक बड़ी चेतावनी सामने आई है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर के एक हालिया शोध ने खुलासा किया है कि इन शहरों की भौगोलिक संरचना भूकंप के समय ‘ताश के पत्तों’ की तरह ढह सकती है। इसका सबसे बड़ा कारण है— सॉइल लिक्विफेक्शन (Soil Liquefaction)

क्या है लिक्विफेक्शन और क्यों है यह जानलेवा?

सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर निहार रंजन पात्रा के नेतृत्व में हुई इस रिसर्च के मुताबिक, गंगा के मैदानी इलाकों की मिट्टी में महीन बालू और सिल्ट (गाद) की मात्रा बहुत अधिक है।

जब 6.5 या उससे अधिक तीव्रता का भूकंप आता है, तो जमीन के अंदर मौजूद पानी और यह रेतीली मिट्टी आपस में मिलकर एक ‘तरल’ (Liquid) का रूप ले लेते हैं। इस स्थिति में मिट्टी अपनी वहन क्षमता (Bearing Capacity) खो देती है। परिणामस्वरूप, मजबूत दिखने वाली इमारतें भी जमीन में धंस सकती हैं या एक तरफ झुककर गिर सकती हैं।

रिसर्च के चौंकाने वाले तथ्य:

  • अत्यधिक गहराई तक असर: आमतौर पर लिक्विफेक्शन का असर जमीन के 8-10 मीटर नीचे तक होता है, लेकिन कानपुर और प्रयागराज में यह 30 से 40 मीटर की गहराई तक देखा गया है।

  • गंगा बैराज का इलाका संवेदनशील: कानपुर में गंगा बैराज के पास 70-80 मीटर गहराई तक के नमूने लिए गए, जिनमें मिट्टी की पकड़ बेहद कमजोर पाई गई।

  • ऐतिहासिक संदर्भ: शोध में बताया गया कि 1803 और 1934 के बड़े भूकंपों के दौरान भी इस क्षेत्र में लिक्विफेक्शन की घटनाएं दर्ज की गई थीं।

सिस्मिक जोन 3 और 4 का खतरा

ये दोनों शहर हिमालयी बेल्ट से मात्र 300 किलोमीटर की दूरी पर हैं और भूकंपीय संवेदनशीलता के मामले में जोन 3 और 4 में आते हैं। इसका मतलब है कि यहां बड़े भूकंप की संभावना हमेशा बनी रहती है। शोध में गुजरात, हरियाणा, बिहार और उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों (लखनऊ और वाराणसी) का भी आकलन किया गया है, जहाँ जोखिम के अलग-अलग स्तर पाए गए हैं।

विशेषज्ञों की राय: अब क्या है रास्ता?

प्रोफेसर पात्रा और उनकी टीम ने सुझाव दिया है कि अब समय आ गया है जब पुराने निर्माण तरीकों को छोड़ना होगा:

  1. ग्राउंड इम्प्रूवमेंट तकनीक: किसी भी बड़े प्रोजेक्ट से पहले मिट्टी को तकनीकी रूप से ‘कंसोलिडेट’ (मजबूत) करना अनिवार्य हो।

  2. सख्त निर्माण मानक: भूकंपरोधी डिजाइन और गहरे फाउंडेशन (Deep Foundations) का पालन कड़ाई से किया जाए।

  3. शहरी नियोजन: घनी आबादी वाले क्षेत्रों में पुराने निर्माणों की सुरक्षा जांच (Safety Audit) की जाए।

निष्कर्ष: 2015 के नेपाल भूकंप के झटकों ने हमें चेतावनी दी थी, लेकिन आईआईटी कानपुर की यह रिसर्च एक ‘अलार्म’ है। यदि समय रहते शहरी नियोजन में बदलाव नहीं किए गए, तो भविष्य की आपदा भारी तबाही ला सकती है।

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