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नागालैंड में योग दिवस पर विवाद: रविवार के सरकारी आदेश का भारी विरोध, अब सोमवार 22 जून को होंगे कार्यक्रम

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
5 Min Read

कोहिमा । सोमवार, 22 जून 2026

नागालैंड में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (International Day of Yoga) के आयोजन की तारीख को लेकर गहरा विवाद खड़ा हो गया है। ईसाई-बहुल राज्य होने के कारण यहां के स्थानीय छात्र संगठनों, जनजातीय कौंसिलों, राजनीतिक दलों और चर्च संस्थाओं ने 21 जून को रविवार के दिन योग कार्यक्रम आयोजित करने के सरकारी निर्देश का कड़ा विरोध किया। चौतरफा दबाव के बाद, राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग (School Education Department) ने अपना पुराना सर्कुलर वापस लेते हुए आधिकारिक कार्यक्रमों को सोमवार, 22 जून 2026 तक के लिए टाल दिया है।

क्या था शिक्षा विभाग का पहला आदेश?

इससे पहले जारी किए गए सरकारी आदेश में नागालैंड के सभी सरकारी और निजी स्कूलों को 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने का सख्त निर्देश दिया गया था। इस आदेश के तहत:

  1. छात्रों और शिक्षण कर्मचारियों (Staff) की शत-प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित करनी थी।

  2. कार्यक्रम के सफल आयोजन को प्रमाणित करने के लिए स्कूलों को जीपीएस-टैग (GPS-tagged) वाली तस्वीरों के साथ अपनी रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को सौंपनी थी।

जैसे ही यह सर्कुलर जारी हुआ, पूरे राज्य में इसके खिलाफ विरोध के स्वर उठने लगे।

रविवार को योग दिवस मनाने का विरोध क्यों हुआ?

नागालैंड की अधिकांश आबादी ईसाई धर्म को मानती है। विरोध कर रहे संगठनों ने इस फैसले को स्थानीय संस्कृति और धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ बताया। विरोध के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

1. रविवार का धार्मिक महत्व और ‘फादर्स डे’ का संयोग

नागा स्टूडेंट्स फेडरेशन (NSF) ने पूर्व के निर्देश को नागालैंड की बहुसंख्यक ईसाई आबादी की धार्मिक भावनाओं के प्रति पूरी तरह से असंवेदनशील और गैर-जिम्मेदाराना करार दिया। छात्र संगठन का तर्क था कि रविवार (Sunday) ईसाई समुदाय के लिए प्रभु का दिन (Lord’s Day) होता है, जो पवित्र प्रार्थना, चर्च फेलोशिप और पारिवारिक आराधना के लिए समर्पित है। इसके अलावा, इस वर्ष 21 जून को ‘फादर्स डे’ (Father’s Day) भी था, जिससे परिवारों के सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रम पहले से तय थे। ऐसे में रविवार को स्कूल खोलकर योग कार्यक्रम के लिए मजबूर करना नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों (अनुच्छेद 25) और मान्यताओं का अनादर है।

2. सांस्कृतिक और दार्शनिक भिन्नता

सेंट्रल नागालैंड ट्राइब्स काउंसिल (CNTC) और नागालैंड बैपटिस्ट पास्टर्स यूनियन (NBPU) ने भी सरकार के कदम का तीखा विरोध किया। पास्टर्स यूनियन का कहना था कि:

“योग की जड़ें विशिष्ट धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं से जुड़ी हैं, जो ईसाई धर्म की मूल मान्यताओं और आस्था के साथ मेल नहीं खाती हैं। इसलिए चर्चों और शैक्षणिक संस्थानों को ऐसे आयोजनों का हिस्सा बनने से बचना चाहिए।”

काउंसिल ने स्पष्ट किया कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान या व्यक्ति को स्वेच्छा से योग करने से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन किसी सरकारी आदेश के जरिए इसे रविवार के दिन अनिवार्य बनाना स्वीकार्य नहीं है।

प्रशासन को झुकना पड़ा: बदला गया सरकारी आदेश

नागालैंड कांग्रेस, ऑल नागालैंड कॉलेज स्टूडेंट्स यूनियन (ANCSU), और दिमापुर अर्बन काउंसिल चेयरमेंस फेडरेशन (DUCCF) जैसे संगठनों के लगातार बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के बाद राज्य सरकार ने बीच का रास्ता निकाला। मुख्य सचिव की मंजूरी के बाद स्कूल शिक्षा विभाग के अवर सचिव यित्सुचु त्राखा ने एक संशोधित आदेश जारी किया।

इस नए आदेश के तहत स्कूल शिक्षा निदेशालय को निर्देशित किया गया है कि राज्य के सभी शिक्षण संस्थानों में अब अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का आधिकारिक अवलोकन 22 जून (सोमवार) को किया जाएगा।

स्वतंत्र रूप से हुए कुछ आयोजन

हालांकि राज्य सरकार ने स्कूलों और अपने आधिकारिक विभागों के लिए इस कार्यक्रम को सोमवार तक के लिए टाल दिया, लेकिन 21 जून (रविवार) को केंद्र सरकार के कुछ चुनिंदा उपक्रमों, राष्ट्रीय सुरक्षा बलों (Security Forces) और केंद्रीय संस्थानों ने राष्ट्रव्यापी उत्सव के हिस्से के रूप में नागालैंड में स्वतंत्र रूप से योग दिवस के सत्र आयोजित किए।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।