नई दिल्ली. जनवरी 2026 के ताजा घटनाक्रमों के अनुसार, रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की दिशा में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की राजधानी अबू धाबी एक ऐतिहासिक कूटनीतिक केंद्र बनकर उभरी है। लगभग चार साल से चल रहे इस युद्ध के समाधान के लिए पहली बार रूस, यूक्रेन और अमेरिका के बीच उच्च स्तरीय त्रिपक्षीय (Trilateral) बातचीत का पहला दौर शुरू हुआ है।
1. अबू धाबी वार्ता: पहले दौर की मुख्य बातें
23-24 जनवरी 2026 को अबू धाबी में आयोजित यह वार्ता दशकों के सबसे कठिन कूटनीतिक प्रयासों में से एक है।
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प्रतिनिधित्व: * रूस: डेलिगेशन का नेतृत्व जीआरयू (GRU) सैन्य खुफिया एजेंसी के निदेशक जनरल इगोर कोस्त्युकोव कर रहे हैं।
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यूक्रेन: यूक्रेन की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख रुस्तम उमेरोव और खुफिया प्रमुख किरिल बुडानोव शामिल हैं।
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अमेरिका: नवनिर्वाचित अमेरिकी प्रशासन के दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर मध्यस्थ की भूमिका में हैं।
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प्रमुख मुद्दे: बातचीत का मुख्य केंद्र ‘सुरक्षा गारंटी’ और ‘क्षेत्रीय रियायतें’ (Territorial Concessions) हैं। रूस ने यूक्रेन के कब्जे वाले क्षेत्रों (विशेषकर डोनबास के 20-25%) पर अपना दावा दोहराया है, जबकि यूक्रेन अपनी संप्रभुता पर अड़ा है।
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वर्तमान स्थिति: पहले दौर की बातचीत के दौरान ही यूक्रेन पर रूसी मिसाइल हमलों ने तनाव बढ़ा दिया है, जिससे यूक्रेन ने इसे “वार्ता की मेज पर हमला” करार दिया है।
2. शांति प्रक्रिया में भारत की भूमिका: ‘विश्वबंधु’ के रूप में
अबू धाबी की इस त्रिपक्षीय वार्ता के पीछे भारत की कूटनीति एक “साइलेंट पिलर” (मौन स्तंभ) की तरह काम कर रही है।
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बैक-चैनल कूटनीति: भारत ने पिछले महीनों में रूस और यूक्रेन दोनों के साथ निरंतर संवाद बनाए रखा है। पीएम मोदी की 2024-25 की यात्राओं और एनएसए अजीत डोभाल की सक्रियता ने इस वार्ता की जमीन तैयार करने में मदद की।
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ग्लोबल साउथ की आवाज: भारत इस वार्ता में केवल एक दर्शक नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ के हितों का प्रतिनिधित्व कर रहा है। भारत का रुख स्पष्ट है—”यह युद्ध का युग नहीं है” और समाधान केवल कूटनीति से ही संभव है।
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जेलेंस्की की भारत यात्रा (जनवरी 2026): रिपोर्ट्स के अनुसार, यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की की जनवरी 2026 के अंत में भारत यात्रा प्रस्तावित है। यह यात्रा अबू धाबी वार्ता के परिणामों को अमली जामा पहनाने में निर्णायक हो सकती है।
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मानवीय सहायता और विश्वास: भारत ने यूक्रेन को दवाएं और मानवीय सहायता भेजी है, जबकि रूस के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को भी संतुलित रखा है। इसी “तटस्थता” के कारण दोनों पक्ष भारत को एक भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में देखते हैं।
3. प्रमुख चुनौतियां और आगे की राह
यद्यपि अबू धाबी में बातचीत शुरू होना एक बड़ी जीत है, लेकिन रास्ते अभी भी कठिन हैं:
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क्षेत्रीय विवाद: रूस का ‘एंकरेज फॉर्मूला’ (Anchorage Formula) और यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता की मांग के बीच कोई बीच का रास्ता निकालना सबसे बड़ी चुनौती है।
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अमेरिकी प्रभाव: डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की नई शांति योजना इस पूरी प्रक्रिया को गति दे रही है, लेकिन यूरोपीय सहयोगियों के साथ सामंजस्य बिठाना बाकी है।
अबू धाबी की शांति वार्ता इस भीषण युद्ध के अंत की पहली वास्तविक किरण है। भारत की भूमिका यहाँ एक ‘सेतु’ (Bridge) की है, जो पश्चिम और पूर्व के बीच कूटनीतिक संवाद को संभव बना रहा है। यदि यह वार्ता सफल होती है, तो यह 21वीं सदी में भारत की सॉफ्ट पावर और कूटनीति की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
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