कोलकाता । बुधवार, 26 अगस्त 2026
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों की सदस्यता अयोग्यता से जुड़ा संवैधानिक विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर पहुंच गया है। TMC के राष्ट्रीय महासचिव और लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी 20 बागी सांसदों को नोटिस जारी कर उनका पक्ष मांगा है।
प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए यह कदम उठाया है। अदालत ने टिप्पणी की कि प्रश्न केवल नोटिस जारी करने का नहीं, बल्कि अयोग्यता से जुड़ी कार्यवाहियों का समयबद्ध (Time-bound) निपटारा करने का है।
मामले की मुख्य बातें और पृष्ठभूमि
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बागी सांसदों पर आरोप: TMC का आरोप है कि ये 20 सांसद पार्टी के सिंबल पर चुनाव जीतकर आए थे। इसके बाद उन्होंने पार्टी के निर्देशों और व्हिप का उल्लंघन करते हुए दूसरे राजनीतिक दल/गुट (NCPI) का रुख किया।
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दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून): संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत किसी राजनीतिक दल के टिकट पर चुने गए सदस्य का स्वेच्छा से पार्टी छोड़ना या व्हिप के खिलाफ काम करना अयोग्यता की श्रेणी में आता है।
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लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका: याचिका में लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) के समक्ष लंबित याचिकाओं पर निर्णय लेने में हो रही देरी को चुनौती दी गई है। अदालत को बताया गया कि अध्यक्ष कार्यालय द्वारा पहले ही नोटिस जारी किए जा चुके हैं।
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अगली सुनवाई: सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को आगे की सुनवाई के लिए 28 अगस्त को सूचीबद्ध किया है।
10वीं अनुसूची और सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक रुख
दल-बदल विरोधी कानून के तहत स्पीकर की शक्तियों को लेकर किहातो होलोहन केस (1992) और सुभाष देसाई केस (2023) में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यद्यपि निर्णय लेने का प्राथमिक अधिकार अध्यक्ष के पास है, परंतु याचिकाओं को अनिश्चितकाल के लिए लंबित नहीं रखा जा सकता। सामान्यत: ऐसी कार्यवाहियों को 3 से 4 महीने के भीतर निपटाना अपेक्षित होता है।
| पहलू | संवैधानिक प्रावधान / विवरण |
| कानून | संविधान की 10वीं अनुसूची (52वां संशोधन, 1985) |
| मुख्य बिंदु | स्वेच्छा से पार्टी सदस्यता त्यागना या व्हिप का उल्लंघन |
| निर्णायक authority | सदन का अध्यक्ष (Speaker / Chairman) |
| न्यायिक समीक्षा | अध्यक्ष का अंतिम फैसला न्यायिक समीक्षा के अधीन |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. क्या सुप्रीम कोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सीधे आदेश दे सकता है?
सुप्रीम कोर्ट शक्ति के पृथक्करण का सम्मान करता है, लेकिन सुभाष देसाई मामले जैसे उदाहरणों में कोर्ट ने अध्यक्ष को समयबद्ध सीमा (Time-bound structure) के अंदर अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला करने का निर्देश दिया है।
2. 28 अगस्त की सुनवाई में क्या संभव है?
28 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट बागी सांसदों के जवाबों की समीक्षा कर सकता है और लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष लंबित अयोग्यता की कार्यवाहियों को पूरा करने के लिए एक निश्चित समयसीमा तय कर सकता है।
अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख उपलब्ध कानूनी याचिकाओं, अदालती कार्यवाहियों और सार्वजनिक समाचार स्रोतों के आधार पर विश्लेषणात्मक एवं सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है।
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