कोलकाता | शुक्रवार, 14 अगस्त 2026
तृणमूल कांग्रेस (TMC) और उसके 20 बागी सांसदों के बीच जारी खींचतान अब भारतीय राजनीति और संवैधानिक विशेषज्ञों के बीच चर्चा का केंद्र बन गई है। TMC अपने इन 20 बागी लोकसभा सांसदों की अयोग्यता को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) जाने की तैयारी कर रही है। पार्टी का कहना है कि यदि लोकसभा अध्यक्ष (Lok Sabha Speaker) अयोग्यता याचिकाओं पर शीघ्र निर्णय नहीं लेते हैं, तो अदालत का दरवाजा खटखटाना ही एकमात्र संवैधानिक रास्ता बचेगा।
अभिषेक बनर्जी की चेतावनी और लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका
TMC के लोकसभा नेता और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर अयोग्यता की लंबित याचिकाओं पर तत्काल निर्णय लेने का आग्रह किया है।
TMC का स्पष्ट आरोप है कि इन 20 सांसदों ने TMC के चुनाव चिन्ह और टिकट पर चुनाव जीतकर सफलता हासिल की, लेकिन बाद में पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होकर अलग राजनीतिक समूह और NDA के प्रति अपना समर्थन जाहिर कर दिया। ऐसे में दल-बदल विरोधी कानून के तहत उनकी संसद सदस्यता समाप्त की जानी चाहिए।
20 बागी सांसदों का दावा बनाम TMC का तर्क
इस विवाद के मुख्य कानूनी और संवैधानिक पहलू दो अलग-अलग व्याख्याओं पर टिके हुए हैं:
| पक्ष | मुख्य तर्क / कानूनी दावा | संवैधानिक प्रावधान |
| बागी सांसद | वे संसदीय दल के दो-तिहाई (2/3) से अधिक सदस्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए उनके नए समूह में विलय को अयोग्यता से संरक्षण मिलना चाहिए। | दसवीं अनुसूची का पैरा 4 (2/3 बहुमत से विलय का अपवाद)। |
| TMC (मूल पार्टी) | केवल ‘विधायी दल’ (Legislative Party) का अलग होना विलय नहीं कहलाता; जब तक ‘मूल राजनीतिक दल’ (Organizational Party) का विलय न हो, तब तक अयोग्यता लागू होगी। | दसवीं अनुसूची की मूल भावना एवं सुभाष देसाई केस (2023)। |
दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) पर सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क फैसले
यदि यह मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचता है, तो अदालत के सामने दो मुख्य ऐतिहासिक फैसलों (Precedents) का संदर्भ रहेगा:
1. कीहोतो होलोहान बनाम ज़चिल्हू (1992)
इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने माना था कि दल-बदल से जुड़ी अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने का प्राथमिक और अंतिम अधिकार सदन के अध्यक्ष (Speaker) के पास है। जब तक अध्यक्ष अंतिम फैसला नहीं ले लेते, तब तक अदालतें सामान्यतः बीच में हस्तक्षेप नहीं करतीं।
2. के. श्यामाकुमार सिंह बनाम मणिपुर विधानसभा (2020)
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि अयोग्यता याचिकाओं का निपटारा अध्यक्ष को 3 महीने की उचित समयावधि के भीतर कर देना चाहिए। यदि अध्यक्ष के स्तर पर अत्यधिक या अनिश्चितकालीन देरी होती है, तो पीड़ित पक्ष न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के लिए सुप्रीम कोर्ट जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: संविधान की दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) क्या है?
उत्तर: इसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया था। इसका उद्देश्य चुनावों के बाद राजनीतिक वफादारी बदलने (आया राम, गया राम संस्कृति) को रोकना और विधायिका में स्थिरता बनाए रखना है।
प्रश्न 2: 2/3 सदस्यों के विलय (Merger) का नियम क्या है?
उत्तर: दसवीं अनुसूची के पैरा 4 के अनुसार, यदि किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) निर्वाचित सदस्य किसी अन्य दल में विलय के लिए सहमत होते हैं, तो उन पर दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता लागू नहीं होती।
प्रश्न 3: क्या लोकसभा अध्यक्ष के फैसले से पहले सुप्रीम कोर्ट दखल दे सकता है?
उत्तर: सामान्य परिस्थितियों में नहीं, लेकिन यदि याचिका पर निर्णय लेने में असामान्य देरी की जा रही हो, तो सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 32/136 के तहत अध्यक्ष को एक तय समयसीमा में फैसला सुनाने का निर्देश दे सकता है।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेख केवल संवैधानिक प्रावधानों, कानूनी दृष्टांतों और राजनीतिक घटनाक्रमों के शैक्षणिक एवं सूचनात्मक विश्लेषण के उद्देश्य से तैयार किया गया है। मामले पर अंतिम विधिक निर्णय संबंधित संवैधानिक प्राधिकारियों और न्यायालय द्वारा लिया जाएगा।
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