वाशिंगटन।
अमेरिकी सरकार द्वारा आठ प्रमुख टेक कंपनियों की ग्रीन-कार्ड (PERM) स्पॉन्सरशिप प्रक्रिया को अस्थायी रूप से निलंबित करने के फैसले के बाद वैश्विक आईटी जगत में काफी बहस छिड़ गई है। हालांकि, भारतीय आईटी उद्योग पर इसका प्रभाव बेहद सीमित रहा है। आइए, इस पूरे घटनाक्रम के तकनीकी पहलुओं, अल्पकालिक व दीर्घकालिक प्रभावों और भारतीय आईटी सेक्टर की मजबूती के कारणों को विस्तार से समझें।
असल में क्या हुआ है?
अमेरिकी श्रम विभाग (US Department of Labor) ने अपने प्रशासनिक नियमों (20 CFR 656.31) का उपयोग करते हुए आठ बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों की नई ‘लेबर-सर्टिफिकेशन’ (PERM) अर्जियों को स्वीकार करना और पुरानी लंबित अर्जियों पर काम करना 180 दिनों के लिए स्थगित कर दिया है।
- प्रभावित कंपनियां: टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), इंफोसिस, विप्रो, HCL टेक, कॉग्निजेंट, कैपजेमिनी, माइक्रोसॉफ्ट, और एडोब।
- मुख्य कारण: यह समीक्षा यह जांचने के लिए की जा रही है कि क्या कंपनियां अपने कुल कार्यबल में कटौती करने के बावजूद बड़ी संख्या में स्पॉन्सरशिप फाइल कर रही थीं।
- महत्वपूर्ण तथ्य: इस कदम से किसी भी कर्मचारी का मौजूदा वीज़ा रद्द नहीं हुआ है और न ही यह निर्णय किसी विशेष देश को लक्षित करता है।
PERM क्या है और यह H-1B से कैसे अलग है?
अक्सर PERM प्रक्रिया को H-1B वर्क वीजा समझ लिया जाता है, जबकि दोनों में महत्वपूर्ण अंतर है:
| पहलू | H-1B वीजा | PERM (प्रोग्राम इलेक्ट्रॉनिक रिव्यू मैनेजमेंट) |
| प्रकृति | अस्थायी वर्क वीजा | स्थायी निवास (ग्रीन कार्ड) का पहला चरण |
| उद्देश्य | अमेरिका में नौकरी शुरू करने की अनुमति | नियोक्ता द्वारा कर्मचारी को ग्रीन-कार्ड स्पॉन्सर करना |
| असर | पूरी तरह सुरक्षित और क्रियाशील | नए स्पॉन्सरशिप आवेदनों पर 180 दिनों की रोक |
भारत के प्रमुख व्यापार संगठन नैसकॉम (NASSCOM) ने भी स्पष्ट किया है कि कुशल प्रतिभाओं की आवाजाही (Skilled Talent Mobility) और इमिग्रेशन दो अलग-अलग विषय हैं।
भारतीय IT सेक्टर पर प्रभाव कम क्यों है?
(क) H-1B वीजा पर घटती निर्भरता
पिछले एक दशक में भारत मुख्यालय वाली प्रमुख आईटी कंपनियों ने नए H-1B वीजा आवेदनों में लगभग 70% की कमी की है। अमेरिका में स्थानीय प्रतिभाओं (Local Hiring) को प्राथमिकता दी जा रही है।
(ख) अमेरिकी कंपनियों का अधिक उपयोग
हाल के आंकड़ों के अनुसार, H-1B वीजा का सबसे बड़ा हिस्सा अब भारतीय सर्विस कंपनियों के बजाय अमेरिकी टेक दिग्गज (जैसे अमेज़न, मेटा, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल) इस्तेमाल कर रहे हैं।
(ग) ऑफशोर और ‘ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर’ (GCC) मॉडल
भारतीय कंपनियों का मुख्य कमाई मॉडल अब क्लाइंट साइट (विदेश) पर इंजीनियर भेजने के बजाय ‘भारत से ही वैश्विक सेवाएं देना’ बन चुका है।
- भारत में 1,700 से अधिक GCCs कार्यरत हैं, जो सालाना 64.6 अरब अमेरिकी डॉलर की आय दर्ज करते हैं।
- भारत में 1.02 करोड़ से अधिक छात्र STEM (विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग, गणित) पाठ्यक्रमों में नामांकित हैं, जिससे प्रतिभा का एक विशाल आधार देश में ही उपलब्ध है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. क्या अमेरिका के इस फैसले से मौजूदा H-1B वीजा धारकों पर असर पड़ेगा?
उत्तर: नहीं। भारत के विदेश मंत्रालय और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस रोक से मौजूदा H-1B वीजा की वैधता या वीजा धारकों की स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
Q2. PERM पर रोक कितने समय के लिए लगाई गई है?
उत्तर: यह निलंबन 180 दिनों के लिए लागू किया गया है। समीक्षा प्रक्रिया पूरी होने या जांच आगे बढ़ने पर इसके समय-सीमा में बदलाव हो सकता है।
Q3. भारतीय आईटी कंपनियों ने वीज़ा नियमों के प्रति अपना मॉडल कैसे बदला है?
उत्तर: भारतीय कंपनियों ने अमेरिका में स्थानीय नागरिकों को रोजगार देने, अमेरिका के कम-लागत वाले शहरों में डिलीवरी सेंटर बनाने और भारत स्थित ‘ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स’ (GCCs) के माध्यम से काम करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
यह लेख उपलब्ध आधिकारिक घोषणाओं, सार्वजनिक आंकड़ों और इमिग्रेशन दिशानिर्देशों के विश्लेषण पर आधारित है। यह किसी भी प्रकार की कानूनी या इमिग्रेशन सलाह का विकल्प नहीं है। इमिग्रेशन संबंधी किसी भी विशिष्ट निर्णय के लिए अधिकृत कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श लें।

