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राजनीति में दोहरा मापदंड: क्या चुनाव अधिकारियों की नई पोस्टिंग सिर्फ राजनीतिक नैरेटिव का खेल है?

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तिरुवनंतपुरम । शनिवार, 23 मई 2026

राजनीति में दूसरों पर उंगली उठाना बेहद आसान है, लेकिन जब वही नियम खुद की सीमाओं पर लागू होता है, तो अक्सर राजनीतिक दलों की बोलती बंद हो जाती है। हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग के अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर उठाए गए बवंडर और उसके ठीक बाद केरल में नवगठित कांग्रेस सरकार के एक फैसले ने इस ‘दोहरे मापदंड’ को एक बार फिर देश के सामने ला दिया है।

विवाद की शुरुआत: राहुल गांधी का ‘चोर बाजार’ वाला बयान

करीब दो हफ्ते पहले पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) मनोज अग्रवाल को वहां का मुख्य सचिव और सुब्रत गुप्ता को शुभेंदु अधिकारी की टीम का हिस्सा बनाया गया था। इस प्रशासनिक बदलाव के तुरंत बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर तीखा हमला करते हुए लिखा था:

“BJP-EC के ‘चोर बाजार’ में – जितनी बड़ी चोरी, उतना बड़ा इनाम।”

उनका सीधा आरोप था कि इन अधिकारियों ने चुनाव के दौरान किसी एक दल की मदद की थी और सरकार ने उन्हें मुख्य सचिव जैसा बड़ा पद देकर इसका ‘इनाम’ दिया है। इस बयान के जरिए देश की सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था ‘चुनाव आयोग’ की निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए गए थे।

ट्विस्ट: केरल में कांग्रेस सरकार का वही कदम

इस बयान की गूंज अभी शांत भी नहीं हुई थी कि केरल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद वहां एक बड़ा उलटफेर हुआ। राज्य में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ (UDF) गठबंधन ने शानदार जीत दर्ज की और वरिष्ठ नेता वी. डी. सतीशन (V. D. Satheesan) ने राज्य के 13वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन की सरकार ने एक प्रशासनिक आदेश जारी किया, जिसके तहत डॉ. रतन यू. केलकर (Dr. Rathan U. Kelkar, IAS) को मुख्यमंत्री का सचिव नियुक्त किया गया।

चौंकाने वाली बात यह है कि डॉ. रतन यू. केलकर वही वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं, जो केरल के ‘मुख्य चुनाव अधिकारी’ (CEO) के पद पर तैनात थे और जिनके नेतृत्व में हाल ही में संपन्न हुआ विधानसभा चुनाव आयोजित किया गया था। अब राजनीतिक विश्लेषक यह सवाल पूछ रहे हैं कि यदि गैर-कांग्रेसी राज्यों में चुनाव अधिकारी को कोई पद मिलना ‘वोट चोरी का इनाम’ है, तो केरल में सिटिंग चुनाव अधिकारी को सीधे मुख्यमंत्री का करीबी सचिव बनाना ‘ईमानदार नियुक्ति’ कैसे हो गई?

प्रशासनिक हकीकत बनाम राजनीतिक नैरेटिव (सुधार और तथ्य)

राजनीतिक खेमेबाजी से अलग हटकर यदि हम भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के नियमों और सेवा शर्तों को समझें, तो इस पूरे विवाद में कुछ महत्वपूर्ण प्रशासनिक सुधारों और तथ्यों को जानना जरूरी है:

  1. कैडर और वरिष्ठता का नियम: मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) का पद कोई राजनीतिक नियुक्ति नहीं होती। यह राज्य कैडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों को सौंपा जाने वाला एक डेपुटेशन (प्रतिनियुक्ति) पद है। चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन अधिकारियों का अपने मूल राज्य कैडर में वापस आना और वरिष्ठता के अनुसार मुख्य सचिव या मुख्यमंत्री के सचिवालय में तैनात होना एक पूर्णतः सामान्य और निरंतर चलने वाली प्रशासनिक प्रक्रिया है।

  2. दलों से परे परंपरा: भारत के प्रशासनिक इतिहास में यह पहली बार नहीं हुआ है। केंद्र हो या राज्य, चाहे भाजपा की सरकार हो, कांग्रेस की हो या वामपंथियों की—योग्य और अनुभवी नौकरशाहों को उनकी प्रशासनिक क्षमता के आधार पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जाती रही हैं।

  3. बिना सबूत के आरोप और अदालती रुख: विपक्ष पिछले कई सालों से चुनावों में हार का ठीकरा ईवीएम (EVM) और चुनाव आयोग पर फोड़ता आया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर इन दावों को बिना पुख्ता सबूत के खारिज किया है। दिलचस्प बात यह है कि जब विपक्षी दल चुनाव जीत जाते हैं (जैसे हाल ही में केरल में यूडीएफ की जीत), तब चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर कोई सवाल नहीं उठाया जाता।

निष्कर्ष

केरल और पश्चिम बंगाल के इन दोनों घटनाक्रमों ने यह साफ कर दिया है कि राजनीति में प्रशासनिक फैसलों को भी अक्सर अपने फायदे के नैरेटिव में बदलने की कोशिश की जाती है। जब तक राजनीतिक दल संवैधानिक संस्थाओं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर अपने बयानों में एकरूपता और शुचिता नहीं लाएंगे, तब तक जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता पर ऐसे ही सवालिया निशान लगते रहेंगे।

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