नई दिल्ली । शनिवार, 23 मई 2026
लुटियंस दिल्ली के दिल में बसे और देश के सबसे रसूखदार लोगों के ठिकाने ‘दिल्ली जिमखाना क्लब’ (Delhi Gymkhana Club) को लेकर एक बेहद बड़ी खबर सामने आई है। केंद्र सरकार ने एक कड़ा रुख अपनाते हुए क्लब की लीज को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है और प्रबंधन को आगामी 5 जून तक पूरा परिसर खाली करने का अल्टीमेटम दे दिया है।
प्रधानमंत्री आवास के बेहद करीब स्थित इस 27.3 एकड़ के आलीशान परिसर को अब सरकार अपने नियंत्रण में लेने जा रही है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि सरकार ने यह कदम क्यों उठाया, क्लब का इतिहास क्या है और इस पूरे मामले में ताजा अपडेट क्या है।
सरकार ने क्यों लिया यह कड़ा फैसला?
केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय के तहत आने वाले भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) ने 22 मई को क्लब के सचिव को एक आधिकारिक पत्र भेजा। इस आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि 2, सफदरजंग रोड स्थित यह पूरी जमीन देश के रक्षा ढांचे को मजबूत करने, महत्वपूर्ण प्रशासनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण और जनहित की परियोजनाओं के लिए बेहद जरूरी है।
चूंकि यह इलाका लोक कल्याण मार्ग स्थित पीएम आवास और कई संवेदनशील रक्षा प्रतिष्ठानों से घिरा हुआ है, इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टिकोण से सरकार ने लीज डीड की धारा-4 के तहत ‘री-एंट्री’ (पुनः कब्जा लेने) का आदेश जारी किया है। अधिकारियों के मुताबिक, 5 जून 2026 को सरकारी टीम इस परिसर का नियंत्रण अपने हाथ में लेगी।
क्या है दिल्ली जिमखाना क्लब का इतिहास और इसकी खासियत?
इस क्लब का इतिहास भारत की आजादी और उससे भी पहले के दौर से जुड़ा हुआ है:
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ब्रिटिश काल में शुरुआत: इसकी स्थापना साल 1913 में ब्रिटिश शासन के दौरान ‘इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब’ के रूप में हुई थी। आजादी के बाद इसके नाम से ‘इम्पीरियल’ हटाकर इसे ‘दिल्ली जिमखाना क्लब’ कर दिया गया।
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शाही सुविधाएं: इस क्लब में खेल और ऐशो-आराम की विश्वस्तरीय सुविधाएं हैं। यहाँ देश में सबसे ज्यादा 26 ग्रास (घास वाले) टेनिस कोर्ट हैं। इसके अलावा क्ले कोर्ट, स्क्वैश कोर्ट, स्विमिंग पूल, 3 आलीशान लाउंज बार और ठहरने के लिए 43 कॉटेज मौजूद हैं।
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पावर का सेंटर: देश के शीर्ष नौकरशाह (IAS/IPS), सेना प्रमुख, जज, राजनेता और बड़े उद्योगपति इसके सदस्य रहे हैं। समाज के शीर्ष पायदान पर बैठे लोगों के लिए इसकी सदस्यता एक स्टेटस सिंबल मानी जाती है।
जरूरी सुधार और सदस्यता का ’40-40-20′ नियम
अक्सर सोशल मीडिया या शुरुआती चर्चाओं में क्लब के सदस्यों की संख्या को लेकर भ्रम रहता है कि यहाँ सिर्फ 1,200 सदस्य हैं। लेकिन वास्तविक सुधार यह है कि क्लब के कुल (स्थायी और अस्थायी) सदस्यों की संख्या करीब 12,000 से अधिक है, जिनमें से वोटिंग अधिकार वाले स्थायी सदस्य एक सीमित दायरे में आते हैं।
यहाँ सदस्यता पाना दुनिया के सबसे मुश्किल कामों में से एक माना जाता है, जिसके लिए 20 से 30 साल तक का वेटिंग पीरियड होता है। क्लब दशकों से अपनी सदस्यता के लिए एक खास नियम अपनाता आया है:
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40% सीटें: सिविल सेवकों (नौकरशाहों) के लिए।
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40% सीटें: रक्षा सेवाओं (सेना के अधिकारियों) के लिए।
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20% सीटें: ‘अन्य’ यानी देश के नामचीन नागरिकों या उद्योगपतियों के लिए।
चूंकि यहाँ पुराने सदस्यों के बच्चों को प्राथमिकता दी जाती थी, इसलिए आम लोगों या बाहरी व्यक्तियों का इसमें प्रवेश पाना लगभग नामुमकिन माना जाता रहा है।
विवादों से भी रहा है पुराना नाता
अपनी इसी अत्यधिक ‘विशिष्टता’ और आम लोगों से दूरी बनाने के नियमों के कारण यह क्लब कई बार विवादों में आया। साल 2020 में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने क्लब की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी की थी। ट्रिब्यूनल ने कहा था कि इस क्लब के तौर-तरीकों से आज भी “साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक मानसिकता की बू आती है”, जो केवल कुछ चुनिंदा विशेषाधिकार प्राप्त संभ्रांत वर्ग (Elite Class) की सेवा करता है।
अब आगे क्या होगा?
सरकार के इस अचानक आए आदेश से लुटियंस दिल्ली के रसूखदार गलियारों में खलबली मच गई है। क्लब के कुछ सदस्यों का कहना है कि वे इस आदेश के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे और अपील दायर करेंगे, क्योंकि उनका मानना है कि परिसर से किसी भी प्रकार का सुरक्षा खतरा नहीं है। हालांकि, यदि अदालत से कोई स्टे (रोक) नहीं मिलता है, तो 5 जून को इस ऐतिहासिक परिसर पर सरकार का पूरी तरह कब्जा हो जाएगा।
Matribhumisamachar


