नई दिल्ली । रविवार, 28 जून 2026
देश के स्वास्थ्य क्षेत्र और चिकित्सा उपकरण उद्योग (Medical Device Industry) के लिए एक बेहद राहत भरी और सकारात्मक खबर आई है। भारत में चिकित्सा उपकरणों के घरेलू विनिर्माण (Domestic Manufacturing) और व्यापार को एक नई रफ्तार देने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। मंत्रालय ने ‘चिकित्सा उपकरण नियम, 2017’ (Medical Device Rules, 2017) में बड़े संशोधनों का एक नया ड्राफ्ट (प्रस्ताव) पेश किया है।
इस महत्वपूर्ण संशोधन का मुख्य उद्देश्य चिकित्सा उपकरणों की उच्चतम गुणवत्ता (Quality) और सुरक्षा (Safety) से बिना कोई समझौता किए, उनकी लाइसेंसिंग प्रक्रिया को पहले से कहीं अधिक सरल, पारदर्शी और तेज बनाना है। इस कदम से न केवल देश में ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ (Ease of Doing Business) को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि अत्याधुनिक और जीवन रक्षक उपकरण मरीजों तक बहुत कम समय में पहुंच सकेंगे।
जोखिम के आधार पर चिकित्सा उपकरणों का वर्गीकरण (Classification)
भारत में चिकित्सा उपकरण नियम, 2017 के तहत सभी प्रकार के मेडिकल डिवाइसेस को उनके उपयोग और जुड़े जोखिम (Risk Factor) के आधार पर चार मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
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क्लास ए (Class A): सबसे कम जोखिम वाले उपकरण (जैसे- साधारण पट्टियां, थर्मामीटर)।
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क्लास बी (Class B): कम से मध्यम जोखिम वाले उपकरण (जैसे- ब्लड प्रेशर मॉनिटर, पल्स ऑक्सीमीटर, सुइयां)।
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क्लास सी (Class C): मध्यम से उच्च जोखिम वाले उपकरण (जैसे- इंसुलिन पंप, डायलिसिस मशीन)।
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क्लास डी (Class D): सबसे उच्च जोखिम वाले और जीवन रक्षक उपकरण (जैसे- हार्ट स्टेंट, पेसमेकर, हिप और घुटने के इम्प्लांट)।
क्या होंगे बड़े बदलाव? समय-सीमा में की गई भारी कटौती
प्रस्तावित संशोधनों के तहत सरकार ने अलग-अलग श्रेणियों (Categories) के मेडिकल डिवाइसेस के लिए लाइसेंस जारी करने की अनिवार्य समय-सीमा को काफी घटा दिया है, जो इस प्रकार है:
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क्लास B मेडिकल डिवाइस: ब्लड प्रेशर मॉनिटर, पल्स ऑक्सीमीटर और हाइपोडर्मिक सुई जैसे उपकरणों के लिए लाइसेंस जारी करने की समय-सीमा को अब 140 दिन से घटाकर 115 दिन करने का प्रस्ताव है। (यानी सीधे 25 दिनों की बचत)।
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क्लास C और क्लास D मेडिकल डिवाइस: हार्ट स्टेंट, पेसमेकर, हिप और घुटने के इम्प्लांट जैसे हाई-रिस्क और क्रिटिकल उपकरणों के लिए समय-सीमा को 105 दिन से घटाकर 90 दिन करने का प्रस्ताव रखा गया है।
लाइसेंसिंग प्रक्रिया में बढ़ेगी पारदर्शिता और दक्षता
इस नए ड्राफ्ट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें केवल अंतिम लाइसेंस की समय-सीमा ही नहीं घटाई गई है, बल्कि प्रक्रिया के प्रत्येक चरण (Stage) के लिए एक स्पष्ट और कड़ा टाइमफ्रेम निर्धारित किया गया है। इसमें निम्नलिखित चरण शामिल हैं:
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आवेदनों की शुरुआती और बारीकी से जांच (Scrutiny of Applications)
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अधिसूचित निकायों (Notified Bodies) द्वारा मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स का ऑडिट
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नियमों के अनुपालन का सत्यापन (Verification of Compliance)
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अंतिम रूप से डिजिटल या भौतिक लाइसेंस जारी करना।
इस कदम से पूरी नियामक व्यवस्था (Regulatory System) में न केवल पारदर्शिता आएगी, बल्कि कंपनियों के लिए अप्रूवल की भविष्यवाणी (Predictability) करना आसान हो जाएगा, जिससे वे अपने बिजनेस और प्रोडक्शन को बेहतर ढंग से प्लान कर सकेंगी।
उद्योग और मरीजों को कैसे होगा सीधा फायदा?
इस नीतिगत बदलाव के दूरगामी परिणाम देखने को मिलेंगे:
नियोक्ताओं/कंपनियों के लिए: मेडिकल डिवाइस कंपनियों को अब सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने होंगे। तेज मंजूरी मिलने से नए और इनोवेटिव उत्पाद बहुत जल्द भारतीय बाजार में उतारे जा सकेंगे। इससे वैश्विक स्तर पर भी भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी।
मरीजों के लिए: अक्सर देखा जाता है कि नई तकनीक वाले जीवन रक्षक उपकरणों को मरीजों तक पहुंचने में महीनों लग जाते थे। अब समय-सीमा घटने से गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों को उच्च गुणवत्ता वाले उपकरण बिल्कुल सही समय पर और किफायती दामों पर उपलब्ध हो सकेंगे।
हितधारकों (Stakeholders) से मांगे गए सुझाव
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने लोकतांत्रिक और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन करते हुए इस संशोधन के मसौदे (Draft Amendment) को पूरी तरह से सार्वजनिक कर दिया है। सरकार ने चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञों, डॉक्टरों, दवा कंपनियों, विनिर्माताओं और आम जनता सहित सभी हितधारकों से एक निश्चित अवधि के भीतर अपने बहुमूल्य सुझाव, आपत्तियां और प्रतिक्रियाएं भेजने का आग्रह किया है। प्राप्त सुझावों पर गंभीरता से विचार और समीक्षा करने के बाद ही इन नियमों में अंतिम संशोधन कर इन्हें देश भर में पूर्ण रूप से लागू किया जाएगा।
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