नई दिल्ली । शनिवार, 4 जुलाई 2026
भारत सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने संसद के आगामी मानसून सत्र 2026 को अपनी आधिकारिक मंजूरी दे दी है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया के जरिए इस बात की पुष्टि की है कि दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) की बैठकें 20 जुलाई 2026 से शुरू होंगी। यह महत्वपूर्ण सत्र 13 अगस्त 2026 तक चलेगा, जिसमें देश के कई संवेदनशील और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर चर्चा और महत्वपूर्ण विधायी कार्य किए जाएंगे।
नए राजनीतिक संख्या बल के बीच शुरुआत
यह मानसून सत्र राजनीतिक रूप से बेहद दिलचस्प मोड़ पर शुरू हो रहा है। हाल ही में बंगाल, असम और पुडुचेरी में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिली जीत के बाद सत्तापक्ष के हौसले बुलंद हैं। इसके अलावा, राज्यसभा में नए और दोबारा चुने गए सदस्यों के शपथ लेने के बाद ऊपरी सदन में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग/NDA) की स्थिति पहले से कहीं अधिक मजबूत और स्पष्ट हो गई है। ऐसे में सरकार के पास कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने का बेहतर मौका होगा।
टीएमसी और शिवसेना (यूबीटी) की बगावत पर टिकी नजरें
इस सत्र के दौरान संसद के भीतर क्षेत्रीय दलों में मची उथल-पुथल का असर साफ देखने को मिलेगा। वर्तमान में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के 6 बागी सांसदों ने लोकसभा में एक अलग समूह के तौर पर मान्यता देने की मांग की है। इस बगावत और सांसदों की सदस्यता या अलग गुट की स्थिति पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के अंतिम फैसले का सभी को इंतजार है। अध्यक्ष का यह निर्णय सदन के भीतर विपक्ष के समीकरणों को बदल सकता है।
महिला आरक्षण और सीटों के परिसीमन पर नया मास्टरप्लान
संसद का पिछला सत्र सरकार के लिए कुछ मायनों में निराशाजनक रहा था क्योंकि लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक गिर गया था। उस विधेयक का मुख्य उद्देश्य 2029 के चुनावों से विधानसभाओं और संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करना और साथ ही लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाना था।
पिछली असफलताओं से सीख लेते हुए सरकार अब इस विधेयक का एक नया और संशोधित मसौदा तैयार कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, नए मसौदे के तहत सभी राज्यों में लोकसभा सीटों को एकसमान रूप से 50 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है।
दक्षिणी राज्यों की चिंताओं का समाधान
दरअसल, आबादी को आधार बनाकर सीटों में बढ़ोतरी करने के पुराने प्रस्ताव पर दक्षिणी राज्यों के राजनीतिक दलों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। उनका तर्क था कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण को सफलतापूर्वक लागू किया, उन्हें कम सीटें मिलने से राजनीतिक नुकसान होगा। अब सरकार द्वारा सभी राज्यों की सीटों में एकसमान (आनुपातिक रूप से 50%) वृद्धि का फॉर्मूला लाने से इस क्षेत्रीय असंतुलन और चिंता को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है।
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