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2008 दिल्ली सीरियल ब्लास्ट: हाई कोर्ट ने इंडियन मुजाहिदीन के मीडिया प्रमुख मंसूर असगर पीरभॉय की जमानत याचिका क्यों खारिज की?

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नई दिल्ली । मंगलवार, 7 जुलाई 2026

वर्ष 2008 में देश की राजधानी को दहला देने वाले दिल्ली सीरियल बम धमाकों के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बड़ा और कड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कथित प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन ‘इंडियन मुजाहिदीन’ (IM) के मीडिया सेल प्रमुख मंसूर असगर पीरभॉय को जमानत देने से साफ इनकार कर दिया है।

जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की खंडपीठ ने पीरभॉय की उस अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें उसने निचली अदालत द्वारा अपनी तीसरी जमानत याचिका नामंजूर किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी के खिलाफ लगे आरोपों की गंभीरता और रिकॉर्ड पर मौजूद पुख्ता सबूतों के सामने उसकी लंबी न्यायिक हिरासत की दलील बेहद कमजोर पड़ जाती है।

26 मासूमों की मौत: केवल लंबी हिरासत जमानत का आधार नहीं

अदालत ने सुनवाई के दौरान इस बात को रेखांकित किया कि योजनाबद्ध तरीके से किए गए ऐसे आतंकवादी हमलों के मामले में, जिसमें 26 निर्दोष लोगों की जान गई थी और 135 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे, सिर्फ इस आधार पर राहत नहीं दी जा सकती कि आरोपी लंबे समय से जेल में है।

ये आरोप बेहद गंभीर प्रकृति के हैं, जिनमें कानूनन मृत्युदंड (फांसी की सजा) या आजीवन कारावास तक का प्रावधान है। कोर्ट ने कानून और मानवाधिकारों का संतुलन समझाते हुए कहा:

“जमानत पर विचार करते समय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ-साथ आम नागरिकों के जीवन और सुरक्षा के अधिकार का संतुलन बनाना भी बेहद जरूरी है।”

क्या हैं मंसूर असगर पीरभॉय पर मुख्य आरोप?

अभियोजन पक्ष (Prosecution) के मुताबिक, मंसूर असगर पीरभॉय प्रतिबंधित संगठन इंडियन मुजाहिदीन के टेक और मीडिया सेल का नेतृत्व कर रहा था। 13 सितंबर 2008 को दिल्ली में हुए सिलसिलेवार धमाकों से ठीक कुछ मिनट पहले, पीरभॉय ने अपने सह-आरोपी मुबीन कादर शेख के साथ मिलकर मुंबई की एक कंपनी के वाई-फाई (Wi-Fi) नेटवर्क को अवैध रूप से हैक किया था।

इसके तुरंत बाद प्रमुख मीडिया संगठनों को ‘मौत का संदेश’ शीर्षक से एक धमकी भरा ईमेल भेजा गया था। इस ईमेल में न सिर्फ धमाकों की जिम्मेदारी ली गई थी, बल्कि एक अटैच की गई पीडीएफ (PDF) फाइल के जरिए देश में और भी विस्फोटों की भविष्यवाणी की गई थी।

यूएपीए (UAPA) और फॉरेंसिक रिपोर्ट ने बढ़ाई मुश्किलें

जांच एजेंसी ने कोर्ट के सामने पीरभॉय को इस बड़ी साजिश से जोड़ने वाले कई तकनीकी और पुख्ता शुरुआती सबूत (Prima Facie Evidence) पेश किए हैं। इनमें शामिल हैं:

  1. ईमेल भेजने के लिए इस्तेमाल किए गए लैपटॉप की खरीद के दस्तावेजी सबूत।

  2. आरोपी के पास से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बरामदगी।

  3. फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट, जिसमें डिलीट की गई पीडीएफ फाइलें और डेटा मिटाने वाले विशेष सॉफ्टवेयर (Data Wiping Software) की मौजूदगी पाई गई है।

इन पुख्ता सबूतों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि इस मामले में गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 43D(5) के तहत वैधानिक प्रतिबंध पूरी तरह लागू होते हैं, क्योंकि आरोपी पर लगे आरोप शुरुआती तौर पर सच प्रतीत होते हैं।

आरोपी की दलीलें क्यों हुईं नाकाम?

पीरभॉय के वकीलों ने कोर्ट में तर्क दिया था कि वह पिछले लगभग 17 सालों से एक विचाराधीन कैदी (Undertrial) के रूप में जेल में बंद है और मुकदमे में हुई देरी के लिए वह जिम्मेदार नहीं है। इसके अलावा यह भी कहा गया कि उसे अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट केस में बरी किया जा चुका है और मुंबई से जुड़े एक मामले में जमानत मिल चुकी है।

हालांकि, हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि किसी अन्य मामले में राहत मिलने से इस केस में लगे आरोपों की गंभीरता और इसकी संवेदनशीलता कम नहीं हो जाती।

दिल्ली हाई कोर्ट का निचली अदालत को सख्त निर्देश

भले ही हाई कोर्ट ने पीरभॉय को जमानत देने से इनकार कर दिया है, लेकिन अदालत ने आरोपी के त्वरित मुकदमे (Speedy Trial) के अधिकार का भी ध्यान रखा है। कोर्ट ने नोट किया कि यह मुकदमा अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है और केवल दो सरकारी गवाहों (Prosecution Witnesses) की गवाही बची है।

सुप्रीम कोर्ट के पिछले निर्देशों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने निचली अदालत को इस पूरे मामले का ट्रायल 8 महीने के भीतर पूरा करने का सख्त आदेश दिया है। साथ ही यह भी साफ किया कि जमानत याचिका खारिज करते वक्त की गई टिप्पणियां केवल इसी फैसले तक सीमित हैं और मुख्य आपराधिक मुकदमे के अंतिम फैसले पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

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