बुधवार, जुलाई 08 2026 | 12:59:39 AM
Breaking News
Home / राज्य / उत्तराखंड / हाई कोर्ट का फैसला: पत्नी को है पति की आर्थिक क्षमता के अनुसार गरिमा से जीने का अधिकार, सेना के जवान की याचिका खारिज

हाई कोर्ट का फैसला: पत्नी को है पति की आर्थिक क्षमता के अनुसार गरिमा से जीने का अधिकार, सेना के जवान की याचिका खारिज

Follow us on:

भारतीय कानून के तहत गुजारा भत्ता और महिला अधिकार - कानूनी न्याय की प्रतीकात्मक छवि

नैनीताल । मंगलवार, 7 जुलाई 2026

उत्तराखंड हाई कोर्ट (Nainital High Court) ने वैवाहिक विवादों और भरण-पोषण (Maintenance) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी कानूनी टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक अलग रह रही पत्नी को न केवल गरिमा के साथ जीने का अधिकार है, बल्कि उसे अपने पति की आर्थिक क्षमता और जीवन स्तर के अनुसार जीवन का आनंद लेने का भी पूरा कानूनी हक है।

न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की एकलपीठ ने पारिवारिक न्यायालय (Family Court) के आदेश को चुनौती देने वाली एक पति की याचिका को पूरी तरह से निरस्त करते हुए यह व्यवस्था दी। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि पत्नी को आर्थिक रूप से सहारा देना पति का प्राथमिक विधिक (कानूनी) दायित्व है, जिससे वह अपनी निजी कटौतियों का हवाला देकर बच नहीं सकता।

क्या था पूरा मामला? (Haldwani Family Court Case)

यह पूरा मामला हल्द्वानी के निवासी और भारतीय सेना (Indian Army) में कार्यरत एक सिपाही से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ता जवान और उसकी पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद के कारण दोनों अलग रह रहे हैं। हल्द्वानी के परिवार न्यायालय ने मामले की गंभीरता और दोनों पक्षों की स्थिति को देखते हुए पति को आदेश दिया था कि वह अपनी पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण (Interim Maintenance) के तौर पर 10,000 रुपये प्रति माह का भुगतान करे।

पारिवारिक न्यायालय के इसी आदेश को आर्थिक आधार और सीमित संसाधनों की दलील देकर जवान द्वारा हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

पति की दलील: ‘हाई-रिस्क पोस्टिंग और भारी कटौतियां’

याचिकाकर्ता जवान की ओर से कोर्ट में तर्क दिया गया कि वर्तमान में वह भारतीय सेना में एक ‘हाई-रिस्क’ (High-Risk) क्षेत्र में तैनात है, जिसके कारण उसका मासिक वेतन करीब 92,000 रुपये है। हालांकि, उसने अदालत के सामने निम्नलिखित व्यावहारिक दिक्कतें रखीं:

  1. सीमित संसाधन: अनिवार्य कटौतियों जैसे प्रोविडेंट फंड (GPF), सरकारी बीमा योजना और पहले से लिए गए ऋण (Loan) की किस्तों के बाद उसके पास खुद के लिए बहुत सीमित आर्थिक संसाधन बचते हैं।

  2. भविष्य में वेतन में कमी: हाई-रिस्क क्षेत्र से स्थानांतरण (Transfer) होने के बाद उसका मासिक वेतन घटकर लगभग 72,000 रुपये रह जाएगा।

  3. पारिवारिक जिम्मेदारियां: याचिका में यह भी कहा गया कि उस पर अपनी वृद्ध मां और भाई की आर्थिक मदद करने का भी जिम्मा है।

जवान का आरोप था कि परिवार न्यायालय ने अंतरिम आदेश जारी करते समय इन सभी वित्तीय तथ्यों और देनदारियों पर उचित विचार नहीं किया।

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: ‘लोन की किस्तें प्राथमिक दायित्व से ऊपर नहीं’

न्यायमूर्ति की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता के सभी तर्कों को दरकिनार करते हुए परिवार न्यायालय के फैसले को पूरी तरह से यथावत रखा। हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कुछ बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किए:

  • आय के अनुपात में राशि सही: कोर्ट ने माना कि यदि भविष्य में जवान का वेतन घटकर 72,000 रुपये भी हो जाता है, तो भी उसकी कुल कमाई को देखते हुए पत्नी के लिए 10,000 रुपये प्रति माह की अंतरिम भरण-पोषण राशि किसी भी तरह से अत्यधिक, अनुचित या मनमानी नहीं लगती।

  • अंतिम निर्णय तक गरिमा की सुरक्षा: अदालत ने रेखांकित किया कि अंतरिम भरण-पोषण का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जब तक मुकदमे का अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक पत्नी को आर्थिक तंगी का सामना न करना पड़े और वह सम्मानजनक जीवन जी सके।

  • कानूनी दायित्व सर्वोपरि: भारतीय कानून के तहत पति अपनी मर्जी से की गई कटौतियों (जैसे लोन या जीपीएफ निवेश) को ढाल बनाकर पत्नी को गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं कर सकता।

मित्रों,
मातृभूमि समाचार का उद्देश्य मीडिया जगत का ऐसा उपकरण बनाना है, जिसके माध्यम से हम व्यवसायिक मीडिया जगत और पत्रकारिता के सिद्धांतों में समन्वय स्थापित कर सकें। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें आपका सहयोग चाहिए है। कृपया इस हेतु हमें दान देकर सहयोग प्रदान करने की कृपा करें। हमें दान करने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें -- Click Here


* 1 माह के लिए Rs 1000.00 / 1 वर्ष के लिए Rs 10,000.00

Contact us

Check Also

रुड़की में भारी हंगामा, अस्पताल के बाहर ‘कथित लव जिहाद’ के आरोपों पर तनाव; पुलिस ने संभाला मोर्चा

रुड़की । मंगलवार, 30 जून 2026 उत्तराखंड के रुड़की शहर से एक बेहद संवेदनशील और …