नई दिल्ली।
मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत प्रचलित विवाह विच्छेद की प्रक्रियाओं में निष्पक्षता, पारदर्शिता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम कदम उठाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और संबंधित प्राधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। इस याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत तलाक के सभी रूपों के लिए समान प्रक्रियात्मक सुरक्षा नियम और कानूनी दिशानिर्देश तय करने की मांग की गई है।
प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस नई याचिका पर सुनवाई करते हुए इसे ‘तलाक-ए-हसन’ की संवैधानिक वैधता से जुड़ी पहले से लंबित एक अन्य याचिका के साथ संबद्ध (tag) कर दिया है।
याचिका की मुख्य मांगें और कानूनी बिंदु
समान प्रक्रियात्मक सुरक्षा और निष्पक्षता:
याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत अदालत से बाहर होने वाले सभी एकतरफा तलाक रूपों के लिए एक स्पष्ट, पारदर्शी और लैंगिक-निरपेक्ष (gender-just) कानूनी ढांचा तैयार किया जाए। इसमें मध्यस्थता और सुलह के अनिवार्य अवसर प्रदान करने पर जोर दिया गया है।
तलाक–ए–हसन की वैधता पर सवाल:
याचिका में ‘तलाक-ए-हसन’ और मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीअत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है। तलाक-ए-हसन के तहत पति तीन लगातार महीनों (तुह्र काल) में एक-एक बार तलाक की घोषणा करता है। हालांकि इस दौरान सुलह की गुंजाइश रहती है, लेकिन याचिकाकर्ता का तर्क है कि बिना अदालत की मध्यस्थता के यह व्यवस्था भी महिलाओं के प्रति एकतरफा और अन्यायपूर्ण साबित होती है।
आर्थिक सुरक्षा और पुनर्वास:
तलाक से प्रभावित महिलाओं और उनके बच्चों के लिए आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की गई है। इसमें गुजारा भत्ता (maintenance) और रहने के अधिकारों को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने पर बल दिया गया है।
मौलिक अधिकारों का हवाला:
याचिका में दलील दी गई है कि एकतरफा और अनियंत्रित तलाक की व्यवस्थाएं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव से सुरक्षा) और अनुच्छेद 21 (जीवन एवं गरिमा का अधिकार) का उल्लंघन करती हैं।
बहुविवाह (Polygamy) पर नियंत्रण की मांग:
याचिका में बहुविवाह से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए कहा गया है कि पहली/मौजूदा पत्नी की स्वतंत्र और पूर्व लिखित सहमति के बिना दूसरा विवाह करना असंवैधानिक घोषित किया जाना चाहिए।
2017 के ‘शायरा बानो‘ फैसले का संदर्भ
यह मामला 2017 के ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट फैसले की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें अदालत ने ‘तलाक-ए-बिद्दत’ (तत्काल तीन तलाक) को असंवैधानिक और अवैध घोषित कर दिया था। 2017 के फैसले में तत्कालीन सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक को निरस्त किया था, लेकिन तलाक-ए-हसन और अन्य प्रक्रियाओं पर स्पष्ट व्यवस्था तय होना अभी बाकी था।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1: सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क्या कदम उठाया है?
Ans: सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक के विभिन्न तरीकों के लिए समान दिशानिर्देश और प्रक्रियात्मक सुरक्षा तय करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
Q2: तलाक–ए–हसन क्या है?
Ans: तलाक-ए-हसन मुस्लिम समुदाय में तलाक का एक तरीका है, जिसमें पति तीन महीने की अवधि में हर महीने (शारीरिक शुद्धता की स्थिति में) एक-एक बार तलाक शब्द बोलता है। यदि तीसरे महीने तक सुलह नहीं होती, तो विवाह समाप्त माना जाता है।
Q3: 2017 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले और इस याचिका में क्या अंतर है?
Ans: 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘तत्काल तीन तलाक’ (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक ठहराया था। वर्तमान याचिका में ‘तलाक-ए-हसन’ सहित अदालत के बाहर होने वाले अन्य एकतरफा तलाक के सभी तरीकों के लिए पारदर्शी और कानूनी सुरक्षात्मक नियम बनाने की मांग की गई है।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेख सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका और न्यायालय की कानूनी कार्यवाहियों की समसामयिक रिपोर्टिंग पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल समाचार और शैक्षणिक जानकारी प्रदान करना है, इसे किसी भी प्रकार की कानूनी सलाह (Legal Advice) न समझा जाए।

