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‘रणबाली’ से परे: 1876-78 का भीषण अकाल और औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों की क्रूरता

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
8 Min Read

नई दिल्ली|

हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म ‘रणबाली’ (निर्देशक: राहुल सांकृत्यायन; मुख्य भूमिका: विजय देवरकोंडा एवं रश्मिका मंदाना) ने 19वीं सदी के उस काले पन्ने को फिर से चर्चा में ला दिया है। यह फिल्म रायलसीमा की पृष्ठभूमि पर अकाल, औपनिवेशिक लगान की कड़ी मांगों और अनाज की आवाजाही के खिलाफ उपजे जन-आक्रोश को रेखांकित करती है। फिल्म में अभिनेता अर्नोल्ड वोस्लो द्वारा निभाया गया ‘सर थियोडोर हेक्टर’ का पात्र ब्रिटिश प्रशासनिक अधिकारी सर रिचर्ड टेम्पल पर आधारित है।

परंतु सिनेमा के काल्पनिक कैनवास से परे 1876 से 1878 के बीच पड़ा यह ‘मद्रास अकाल’ (या दक्षिण भारत का अकाल) एक ऐसी मानवीय त्रासदी थी, जिसे केवल प्राकृतिक सूखा कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। सूखा भले ही पर्यावरण से जुड़ा हो, पर लाखों लोगों की भुखमरी ब्रिटिश साम्राज्य के प्रशासनिक फैसलों का नतीजा थी।

 

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मानसून की विफलता और वैश्विक ‘अल नीनो’

1875 में कमजोर मानसून के बाद 1876 में भीषण सूखा पड़ा। अक्टूबर 1876 में सामान्य से 41% कम बारिश दर्ज की गई। यह जलवायु परिवर्तन वैश्विक ‘अल नीनो’ (El Niño) घटना से प्रेरित था, जिसने ब्राजील और उत्तरी चीन को भी प्रभावित किया।

दक्षिण भारत के बेल्लारी, कुरनूल, कडप्पा, नेल्लोर, सलेम, कोयंबटूर और उत्तरी अर्काट जिले इस त्रासदी से सर्वाधिक प्रभावित हुए। लगभग 1.94 करोड़ आबादी और 83,800 वर्ग मील का क्षेत्र भुखमरी की सीधी चपेट में आ गया।

 

ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियां: संकट को त्रासदी में बदला

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लेसे–फेयर (Laissez-faire) और बाजार का भ्रम

वायसराय लॉर्ड लिटन के नेतृत्व में ब्रिटिश प्रशासन ने ‘अहस्तक्षेप’ की नीति अपनाई। उनका मानना था कि अनाज वितरण में सरकार को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। परिणामस्वरूप, अनाज की कीमतें तीन गुना बढ़ गईं। अनाज बाजारों में पड़ा रहा, लेकिन आय गंवा चुके भूमिहीन मजदूरों और छोटे किसानों की क्रय-शक्ति खत्म हो जाने के कारण वे दाने-दाने को तरसते रहे।

भुखमरी के बीच अनाज का निर्यात

जब भारत में लोग भूख से दम तोड़ रहे थे, तब 1877 में इंग्लैंड में गेहूं की मांग पूरी करने के लिए भारत से निर्यात दोगुना कर दिया गया। 1877-1878 के दौरान भारत से 3.2 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक गेहूं ब्रिटेन भेजा गया।

‘दिल्ली दरबार’ पर शाही फिजूलखर्ची

जनवरी 1877 में महारानी विक्टोरिया को ‘भारत की साम्राज्ञी’ घोषित करने के लिए आयोजित भव्य दिल्ली दरबार पर 400,000 पाउंड खर्च किए गए। इसके विपरीत, मद्रास में अकाल राहत के लिए प्रांतीय बजट का मात्र 1.8% हिस्सा आवंटित हुआ।

 

‘टेम्पल वेज’ (Temple Wage): भुखमरी का राशन

बिहार अकाल (1873-74) में राहत कार्यों के दौरान हुए खर्च की ब्रिटिश सरकार द्वारा आलोचना किए जाने के बाद, सर रिचर्ड टेम्पल ने 1877 में दक्षिण भारत में राहत नियमों को कठोर बना दिया।

  • राशन की सीमा: राहत कार्यों (सड़क, रेलवे और नहर निर्माण) पर भारी मजदूरी करने वाले मजदूरों को रोजाना केवल 1 पाउंड (लगभग 450 ग्राम) चावल दिया जाता था।
  • कैलोरी का गणित: जैसा कि इतिहासकार माइक डेविस ने रेखांकित किया है, इस राशन से मात्र 1,627 कैलोरी मिलती थीं। यह मात्रा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाज़ी डेथ कैंप ‘बुचेनवाल्ड’ के भुखमरी राशन से भी 123 कैलोरी कम थी और एक श्रमजीवी पुरुष के लिए आवश्यक दैनिक कैलोरी से 2,200 कैलोरी कम थी।

अत्यधिक शारीरिक श्रम और कुपोषण के चलते राहत शिविरों में मौतों का आंकड़ा तेजी से बढ़ा।

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|                       कैलोरी तुलना (दैनिक राशन)                      |

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| भारतीय श्रमजीवी पुरुष (सामान्य आवश्यकता) : ~3,800+ Cal                 |

| टेम्पल वेज (1877 मद्रास अकाल राहत)      :  1,627 Cal                  |

| नाज़ी बुचेनवाल्ड डेथ कैंप ( starvation rate):  1,750 Cal              |

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जनसांख्यिकी और सामाजिक ढांचे पर दीर्घकालिक क्षति

1871 और 1881 की जनगणना के आंकड़ों का अध्ययन इस भीषण क्षति को स्पष्ट करता है:

  1. जनसंख्या में गिरावट: केवल मैसूर राज्य में आबादी में 8.74 लाख की भारी कमी आई। कई ऐतिहासिक अनुमानों के अनुसार प्रभावित क्षेत्रों में 5.5 से 10 मिलियन (55 से 100 लाख) लोग मारे गए या विस्थापित हुए।
  2. जन्म दर में भारी गिरावट: भुखमरी के कारण 1876 में दर्ज जन्म संख्या 6,32,113 से घटकर 1878 में मात्र 3,48,657 रह गई।
  3. पलायन और बंधुआ मजदूरी: भुखमरी से बचने के लिए लाखों परिवारों को अपने पुरखों के गांव छोड़कर सीलोन (श्रीलंका), मलाया और तटीय शहरों की ओर मजदूरी के लिए पलायन करना पड़ा।

 

निष्कर्ष

1876-1878 का अकाल केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक आर्थिक प्राथमिकताओं की विफलता और प्रशासनिक क्रूरता का प्रतीक था। ‘रणबाली’ जैसी ऐतिहासिक संदर्भ वाली फिल्में उस युग के मानवीय संघर्षों की याद दिलाती हैं और यह सवाल खड़ा करती हैं कि जब लाखों लोग जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब साम्राज्यवादी नीतियां किसके हितों की रक्षा कर रही थीं।

 

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. 1876-1878 के अकाल को ‘मद्रास अकाल’ क्यों कहा जाता है?

उत्तर: यद्यपि यह अकाल दक्कन के पठार, बॉम्बे, मैसूर और मध्य भारत तक फैला हुआ था, लेकिन इसका सबसे भीषण प्रभाव मद्रास प्रेसीडेंसी और रायलसीमा क्षेत्र पर पड़ा था, इसलिए इसे मद्रास अकाल भी कहा जाता है।

Q2. ‘टेम्पल वेज’ (Temple Wage) क्या था?

उत्तर: यह सर रिचर्ड टेम्पल द्वारा 1877 में लागू किया गया एक राहत राशन नियम था, जिसके तहत राहत कार्यों में लगे मजदूरों को रोजाना केवल 1,627 कैलोरी (लगभग 1 पाउंड चावल) दिया जाता था, जो कठिन शारीरिक श्रम के लिए बेहद नाकाफी था।

Q3. फिल्म ‘रणबाली’ किस विषय पर आधारित है?

उत्तर: फिल्म ‘रणबाली’ 1876-78 के भीषण अकाल के दौर में रायलसीमा की पृष्ठभूमि पर बने काल्पनिक पात्रों के माध्यम से औपनिवेशिक शासन की नीतियों, कर मांगों और अनाज की आवाजाही के खिलाफ जन-संघर्ष को दर्शाती है।

 

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख ऐतिहासिक दस्तावेजों, प्रामाणिक संदर्भों तथा हाल ही में जारी फिल्म के संदर्भों पर आधारित एक विश्लेषणात्मक विवरण है। इसमें व्यक्त विचार ऐतिहासिक तथ्यों के अध्ययन के उद्देश्य से प्रस्तुत किए गए हैं।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।